विचार: ब्रिक्स को नए आयाम देता भारत
भारत की अध्यक्षता ब्रिक्स को संप्रभु राष्ट्रों के एक स्वतंत्र मंच के रूप में अक्षुण्ण रखते हुए व्यावहारिक सहयोग के एक अधिक प्रभावी माध्यम के तौर पर स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है।
HighLights
भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स को मिले नए आयाम, मजबूत सहयोग।
डॉलर पर निर्भरता घटाने और स्थानीय मुद्रा व्यापार को बढ़ावा।
न्यू डेवलपमेंट बैंक में सुधारों पर भारत का विशेष ध्यान।
अजय मल्होत्रा। नई दिल्ली में 12 से 13 सितंबर के बीच ब्रिक्स का शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। इस साल अपनी स्थापना की 20वीं वर्षगांठ मना रहे इस संगठन की यह शिखर बैठक उस कसौटी को निर्धारित करेगी कि तमाम भिन्नताओं के बावजूद यह मंच सदस्य देशों के बीच जमीनी सहयोग और व्यावहारिक समन्वय का माध्यम बन पाया है या नहीं? न्यूयार्क में 20 सितंबर, 2006 को संयुक्त राष्ट्र की बैठकों के बीच स्थापना के दौरान भले ही इसे लेकर बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं, लेकिन एक नई शुरुआत का रोमांच साफ महसूस हो रहा था। तब से लेकर अब तक इस संगठन का निरंतर विस्तारित हो रहा दायरा वास्तव में चकित करने वाला है।
विश्व की लगभग आधी-आबादी और जीडीपी में करीब 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ ब्रिक्स एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठन बन चुका है। हालांकि, इसके सदस्य देशों के बीच न तो कोई साझा भू-राजनीतिक एजेंडा है और न ही मौद्रिक या सुरक्षा से जुड़ा कोई एकीकृत दृष्टिकोण। यहां भारत और चीन की प्रतिद्वंद्विता के बीच उनका सहयोग भी जारी है। जबकि ईरान, सऊदी अरब और यूएई भी अपनी गहरी क्षेत्रीय रंजिशों के बावजूद ब्रिक्स के मंच पर साथ आते हैं। यह आंतरिक विविधता ब्रिक्स को किसी अड़ियल संगठन बनने से रोकने के साथ ही उसे एक लचीले मंच के रूप में और अधिक मजबूती भी प्रदान करती है।
ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान भारत ने देश के 30 शहरों में 35 अलग-अलग मुद्दों पर 350 से अधिक बैठकें आयोजित कीं। इस क्रम में 'संपूर्ण भारत' के साझा संकल्प की झलक दिखाई दी, जिसमें केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें, उद्योग, शोध संस्थान और समाज का हर वर्ग साथ खड़ा दिखा। इनमें कागजी घोषणाओं पर जोर के बजाय ठोस नतीजों को प्राथमिकता दी गई। बैठकों का यह व्यापक दायरा यही दर्शाता है कि भारत ने नए सदस्यों से लैस ब्रिक्स को कहीं अधिक एकजुट, कार्यकुशल और असरदार बनाने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
भारत की अध्यक्षता का मूल मंत्र सक्षमता, नवाचार, परस्पर तालमेल और टिकाऊ भविष्य पर केंद्रित है। यह प्रधानमंत्री मोदी के 'मानवता सर्वोपरि' की जन-केंद्रित सोच का ही प्रतिबिंब है। इस दौरान भारत ने लाजिस्टिक्स नेटवर्क, बैट्री एवं ऊर्जा स्टोरेज, नए उद्यमों के लिए पूंजी, छोटे उद्योगों की वैश्विक पहुंच, आसान कस्टम प्रक्रिया और जलवायु संकट से निपटने के उपायों पर कार्य को आगे बढ़ाया है। साथ ही, आयुष एवं पारंपरिक चिकित्सा और मानसिक स्वास्थ्य को ब्रिक्स के विमर्श में शामिल कर भारत ने इस मंच को पारंपरिक आर्थिक सहयोग के एजेंडे से इतर नया आयाम प्रदान किया है। इस शिखर सम्मेलन के दौरान स्वाभाविक रूप से सबका ध्यान डालर से इतर विकल्पों पर जाएगा। यह चर्चा किसी मुद्रा के वर्चस्व को समाप्त या सीमित करने से अधिक उस पर निर्भरता घटाने की अधिक है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आइएमएफ के अनुसार विश्व के विदेशी मुद्रा भंडार में डालर का हिस्सा 1999 के 72 प्रतिशत से घटकर 2026 की शुरुआत में 57.1 प्रतिशत रह गया है। इसके बावजूद डालर के रुतबे पर संदेह नहीं, क्योंकि उसकी जैसी साख, बाजार विस्तार और बेहिसाब नकदी किसी और मुद्रा के पास नहीं है। चीनी युआन पर अब भी बंदिशें हैं और ब्रिक्स की साझा मुद्रा बनाने के लिए जिस आर्थिक सहमति और संप्रभुता के समझौते की जरूरत है, उसके लिए कोई देश तैयार नहीं। इसलिए व्यावहारिक रास्ता यही निकाला जा रहा है कि चुनिंदा द्विपक्षीय व्यापार में अपनी-अपनी मुद्राओं का उपयोग हो, डिजिटल पेमेंट सिस्टम आपस में जुड़ें और स्थानीय स्तर पर कर्ज एवं वित्तीय संसाधन जुटाए जाएं। टैरिफ के जरिये व्यापारिक प्रतिबंधों के विरोध में भी ब्रिक्स देश एकमत हैं। असल में टैरिफ को लेकर मनमानेपन के बीच प्रभावित देश अपने व्यापार, भुगतान प्रणाली और आपूर्ति शृंखलाओं को किसी एक बाजार पर निर्भर बनाए रखने के बजाय उसके विविधीकरण पर अधिक ध्यान देते हैं।
ब्रिक्स से जुड़ी आकांक्षाओं की पूर्ति की एक परीक्षा न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी एनडीबी की व्यावहारिकता को लेकर भी होनी है। 2015 से अब तक इसने केवल भारत के लिए ही इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास हेतु करीब 10 अरब डालर तो मंजूर किए हैं, लेकिन अपनी गतिशीलता, वित्तीय आकार और पहुंच के लिहाज से यह आज भी विश्व बैंक या एशियाई विकास बैंक यानी एडीबी से कोसों पीछे है। इस मंच पर भारत की छाप इससे तय होगी कि वह बैंक के कर्ज देने के तौर-तरीकों, परियोजनाओं की तैयारी और अपनी मुद्राओं में फंडिंग को बढ़ावा देने वाले सुधारों को कितनी मजबूती से लागू करा पाता है।
भारत की अध्यक्षता ब्रिक्स को संप्रभु राष्ट्रों के एक स्वतंत्र मंच के रूप में अक्षुण्ण रखते हुए व्यावहारिक सहयोग के एक अधिक प्रभावी माध्यम के तौर पर स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है। नई दिल्ली शिखर सम्मेलन की सफलता का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि इसने धरातल पर क्या परिणाम दिए। इस समूह की परिपक्वता की वास्तविक परीक्षा उन पहलुओं पर निर्भर करेगी कि भारत द्वारा आरंभ की गईं पहल अगले वर्ष चीन को अध्यक्षता सौंपे जाने के बाद भी निरंतर रहते हुए स्थायी संस्थागत ढांचे का रूप ले पाती हैं या नहीं?
(रूस में भारत के राजदूत रहे लेखक टेरी में फेलो हैं)











