विचार: नई पीढ़ी को सक्षम बनाने की चुनौती
शासन-प्रशासन में अनुभव, समझ और संयम का महत्व तो सदैव रहेगा, मगर भारत के भविष्य को गढ़ने में भावी पीढ़ी की भूमिका तय होनी ही चाहिए।
HighLights
सरकार युवा प्रदर्शनों के बाद जेन-जी की चिंताओं पर ध्यान दे रही है।
जेन-जी को पारदर्शी भर्ती, योग्यता-आधारित चयन और आत्मसम्मान चाहिए।
शिक्षा, रोजगार, तकनीकी तालमेल और मानसिक दृढ़ता पर जोर देना होगा।
जीएन वाजपेयी। नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर युवा आंदोलनकारियों के धरना-प्रदर्शन और शिक्षा मंत्री के त्यागपत्र के बाद से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने जेन-जी को ध्यान में रखते हुए एक के बाद एक कई निर्णय लिए हैं। अगर इन फैसलों पर सही से अमल हो सका तो इस पीढ़ी की तमाम चिंताएं दूर हो सकती हैं। इस दिशा में तत्परता से काम भी शुरू हो चुका है। इसी के साथ इस विरोध-प्रदर्शन में निहित संदेश को समझने के लिए यह पड़ताल करना भी उतना ही आवश्यक है कि किसी प्रायोजक या सुनियोजित एवं संगठित समर्थन के बिना इतनी भारी भीड़ आखिर 'स्वतः स्फूर्त' ढंग से क्यों उमड़ पड़ी?
जेन-जी न केवल देश की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है, बल्कि यह पीढ़ी देश की नई आकांक्षाओं का प्रतीक भी है। जेन-जी का बचपन और जवानी इंटरनेट, स्मार्टफोन और इंटरनेट मीडिया के साए में गुजरी है। इनके लिए आभासी और वास्तविक दुनिया के बीच की दीवार बनावटी और बेमानी है। सूचनाओं तक तात्कालिक पहुंच के बल पर यह पीढ़ी दुनिया भर में संबंध जोड़ सकती है, ज्ञान हासिल कर सकती है, स्टार्टअप शुरू कर सकती है और मुख्यधारा के मीडिया या पारंपरिक तंत्र की के बिना भी अपनी बात को राष्ट्रीय मंच पर रख सकती है। जंतर-मंतर का वह जमावड़ा इसी ताकत का प्रत्यक्ष प्रमाण रहा। इन पहलुओं ने एक ऐसी पीढ़ी को आकार दिया है, जो व्यक्तिगत पहचान, प्रामाणिकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समावेशिता को सर्वोपरि मानती है।
जेन-जी पीढ़ी किसी सत्ता या व्यवस्था को महज इसलिए स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि वह पारंपरिक रूप से चली आ रही है। वह सीधे सवाल करती है कि पुरानी व्यवस्थाएं बदस्तूर क्यों बनी रहें, क्या स्थापित संस्थाएं उनकी आवाज सुन भी रही हैं और क्या मौजूदा तंत्र उन्हें न्यायसंगत एवं समान अवसर उपलब्ध करा पा रहा है? इनकी आकांक्षाएं पिछली पीढ़ियों की तुलना में बुनियादी रूप से भिन्न हैं, जिनके लिए एक सुरक्षित और स्थिर करियर ही जीवन का वास्तविक एवं अंतिम ध्येय हुआ करता था।
पुरानी पीढ़ी की तुलना में वे कोई अर्थपूर्ण अथवा रुचि का काम चाहते हैं। ऐसा काम, जिसमें न केवल आर्थिक आजादी, बल्कि अपनी शर्तों पर काम की सहूलियत के साथ ही कुछ नया रचने की छूट और आत्मविकास की गुंजाइश हो। स्टार्टअप, फ्रीलांसिंग, डिजिटल प्लेटफार्म, कंटेंट क्रिएशन और आधुनिक तकनीकी पेशों ने रोजगार को लेकर उनके सोच के क्षितिज को और व्यापक स्वरूप प्रदान किया है। हालांकि इस सिक्के का दूसरा पहलू उतना ही स्याह है और वह यह कि उत्कृष्ट शिक्षा और ढंग की नौकरियों के लिए आज भी इन्हें बेहद कड़े संघर्ष और प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। शैक्षिक डिग्रियों और आर्थिक अवसरों के बीच बढ़ता अंतर युवाओं में भारी हताशा पैदा कर सकता है। जेन-जी युवा संभवतः सरकारी नौकरियों के अभाव को स्वीकार कर भी ले, किंतु वह पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, योग्यता-आधारित चयन, भरोसेमंद बुनियादी ढांचा और ऐसे संस्थान अवश्य चाहता है, जो नागरिकों के साथ गरिमापूर्ण व्यवहार करें। वस्तुतः, उनकी सबसे मूल आकांक्षा आत्मसम्मान और गरिमा से जुड़ी है।
यदि पुरानी पीढ़ी ने इंटरनेट के नए सबक सीखे तो जेन-जी एआइ के दौर में पलने वाली पहली पीढ़ी है। एआइ इनके पठन-पाठन, सृजन, संवाद और सवालों के हल का सबसे बड़ा जरिया बनेगी। एक ऐसे डिजिटल मार्गदर्शक के बूते यह पीढ़ी नई भाषाएं और कला-कौशल सीखेगी। दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर एक-दूसरे के साथ सहजता से मिलकर काम कर सकेगी। संभावनाओं के इस अपार संसार में उन पर एक भारी नैतिक दायित्व भी होगा। स्पष्ट है कि भविष्य में में मशीनी दक्षता से कहीं ज्यादा अहमियत मानवीय फैसलों, संवेदना, सृजनशीलता, नैतिक मूल्यों, नेतृत्व-कौशल और सच तथा गढ़े गए झूठ के बारीक फर्क को पकड़ने वाली क्षमताओं की होगी।
भारत की युवा आबादी देश की ताकत तभी बन सकती है, जब इस पीढ़ी को हुनर, रोजगार, आत्मसम्मान, अपनी बात कहने का मंच और एक बेहतर भविष्य का भरोसा मिले। इसके लिए शिक्षा को रटने की परिपाटी से मुक्त कर रचनात्मक विवेक, प्रयोगधर्मिता और समस्याओं के व्यावहारिक समाधान की ओर मोड़ना होगा। साथ ही तकनीकी एवं व्यावसायिक पठन-पाठन का उद्योगों से सीधा तालमेल बैठाना, युवाओं को बाजार की मांग के अनुरूप तैयार करना और स्टार्टअप एवं नए अनुसंधानों के दरवाजे हर तबके के लिए खोलना अपरिहार्य होगा।
भारत को एआइ से लैस ऐसे कुशल कार्यबल को तैयार करना होगा जो मशीनों से महज प्रतिस्पर्धा के बजाय उनके साथ मिलकर उत्पादकता और सृजनशीलता से काम करने की सामर्थ्य विकसित कर सके। इसके साथ ही, युवाओं में मानसिक दृढ़ता, शारीरिक तंदुरुस्ती, खेलकूद, सांस्कृतिक अभिरुचि और जीवंत एवं गतिशील सामुदायिक जीवन को बढ़ावा देने पर भी पहले से कहीं अधिक बल देना होगा। सबसे अहम बात यह है कि सरकार को इन युवाओं की आवाज को संवेदनशीलता से सुनना होगा और समयानुकूल समुचित कदम उठाने होंगे। डिजिटल कनेक्टिविटी के इस दौर में सुस्त और अपारदर्शी लालफीताशाही वाली प्रक्रियाओं के प्रति इस पीढ़ी का असंतोष एवं असहिष्णुता और तीखा होता जाएगा। अतः नागरिक विमर्श और विधायी संस्थाओं में उनकी सार्थक और प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना निरंतर रूप से आवश्यक होगा।
भले ही पीएम मोदी ने सांसदों-विधायकों को नई पीढ़ी से जुड़ने की एक कवायद सौंप दी हो, लेकिन महज बातों पर सुनवाई उनके मनोभावों और आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं कर सकती। समय आ गया है कि संसद और विधानसभाओं में नौजवानों को अपनी बात रखने की असली जगह मिलनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि पुराने नेतृत्व को एकाएक दरकिनार कर दिया जाए। शासन-प्रशासन में अनुभव, समझ और संयम का महत्व तो सदैव रहेगा, मगर भारत के भविष्य को गढ़ने में भावी पीढ़ी की भूमिका तय होनी ही चाहिए।
(लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व चेयरमैन हैं)











