विचार: शिक्षकों की राह तकते शिक्षा संस्थान
शिक्षकों की कमी का पहला असर कक्षा पर पड़ता है। उपलब्ध शिक्षकों को अधिक कक्षाएं और अधिक प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं।
HighLights
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 25% शिक्षकीय पद खाली।
IITs में 38% और IIMs में 32% फैकल्टी रिक्त।
स्थायी नेतृत्व की कमी से शोध व गुणवत्ता प्रभावित।
ब्रजेश कुमार तिवारी। अब यह केवल एक प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय भी बनना चाहिए कि आखिर जब देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों, आइआइटी और आइआइएम में भी सैकड़ों स्वीकृत शिक्षकीय पद खाली हों और कई केंद्रीय विश्वविद्यालय नियमित कुलपति की प्रतीक्षा कर रहे हों, तब क्या हम वास्तव में उच्च शिक्षा को राष्ट्र निर्माण की प्राथमिकता मान रहे हैं? भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है। हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम टेक्नोलाजी, स्टार्टअप, पेटेंट, नवाचार और विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की बात कर रहे हैं, लेकिन इन सभी आकांक्षाओं की वास्तविक बुनियाद विश्वविद्यालय की कक्षा, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और शोध केंद्र हैं। यदि इन्हीं संस्थानों में शिक्षक और स्थायी नेतृत्व की कमी बनी रहे, तो विकसित भारत की यात्रा में यह गंभीर संस्थागत बाधा बन सकती है।
कुलपति केवल विश्वविद्यालय का प्रशासनिक प्रमुख नहीं होता। शिक्षक नियुक्ति, नए विभाग, अकादमिक प्राथमिकताएं, शोध केंद्र, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वित्तीय निर्णय और संस्थान की दीर्घकालीन दिशा काफी हद तक कुलपति रूपी स्थायी नेतृत्व पर निर्भर करती है। 57 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 18 केंद्रीय विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जहां नए नियमित कुलपति की नियुक्ति की प्रतीक्षा है। इनमें लगभग 11 संस्थान कार्यवाहक अथवा प्रभारी कुलपति के नेतृत्व में चल रहे हैं, जबकि कम से कम सात जगह निवर्तमान कुलपति का सामान्य कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें निर्धारित अतिरिक्त अवधि अथवा नए कुलपति की नियुक्ति तक पद पर बनाए रखा गया है।
कार्यकाल विस्तार कई बार आवश्यक प्रशासनिक उपाय हो सकता है, लेकिन उसे नियमित नियुक्ति का विकल्प नहीं बनना चाहिए। विश्वविद्यालयों को केवल दैनिक फाइलें निपटाने वाला प्रशासक नहीं, बल्कि अगले पांच से दस वर्षों की अकादमिक दिशा तय करने वाला नेतृत्व चाहिए होता है। कुछ विश्वविद्यालयों में नियमित नेतृत्व की प्रतीक्षा अब महीनों नहीं, वर्षों में मापी जाने लगी है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय में नए कुलपति की तलाश जून 2024 में शुरू हुई, जो अब तक जारी है। वहीं केंद्रीय विश्वविद्यालय ओडिशा मई 2025 से, केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश अगस्त 2025 से और हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर सितंबर 2025 से कार्यवाहक नेतृत्व में चल रहे हैं। राज्य विश्वविद्यालयों में भी कुलपतियों के चयन और शिक्षकों की भर्ती में इसी तरह देरी हो रही है।
कुलपतियों की खाली कुर्सी के मुकाबले शिक्षकों की खाली कुर्सी का प्रभाव विद्यार्थी प्रतिदिन महसूस करता है। दिसंबर 2025 में राज्यसभा में शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि एक जुलाई, 2025 तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 18,951 स्वीकृत शिक्षकीय पदों में 4,889 पद खाली थे। अर्थात लगभग 25 प्रतिशत पद रिक्त थे। यह सही है कि सुधार हुआ है। स्वीकृत शिक्षकीय पदों की संख्या 2014 के 16,324 से बढ़कर 2025 में 18,951 हुई। सितंबर 2022 से चलाए गए विशेष भर्ती अभियानों के माध्यम से 8,320 से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति हुई, फिर भी यदि एक चौथाई पद खाली हैं तो समस्या को समाप्त नहीं माना जा सकता।
आइआइटी में स्थिति और गंभीर है। 30 जनवरी 2026 तक देश के 23 आइआइटी में 12,498 स्वीकृत फैकल्टी पदों में 4,804 पद खाली थे यानी लगभग 38 प्रतिशत। आइआइटी पटना में रिक्ति लगभग 54.6 प्रतिशत और आइआइटी खड़गपुर में लगभग 51.3 प्रतिशत दर्ज की गई। यह तब और चिंताजनक है, जब सरकार आइआइटी में सीटें बढ़ाने जा रही है। सीटें बढ़ाना जरूरी है, लेकिन विद्यार्थी बढ़ें और शिक्षक उसी अनुपात में न बढ़ें तो विस्तार केवल संख्या में होगा, गुणवत्ता में नहीं। आइआइएम में भी स्थिति बहुत अलग नहीं है। जनवरी 2026 में आरटीआइ से प्राप्त आंकड़ों में 18 आइइएम में 1,741 स्वीकृत फैकल्टी पदों में लगभग 32 प्रतिशत पद रिक्त पाए गए।
शिक्षकों की कमी का पहला असर कक्षा पर पड़ता है। उपलब्ध शिक्षकों को अधिक कक्षाएं और अधिक प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालनी पड़ती हैं। इसका सीधा असर शोध के लिए उपलब्ध समय पर पड़ता है। दूसरा प्रभाव शोधार्थियों पर पड़ता है। पीएचडी निर्देशन, प्रयोगशाला अनुसंधान, प्रकाशन और नए शोध समूह विकसित करने की क्षमता सीमित होती है। वरिष्ठ शिक्षकों की कमी युवा फैकल्टी के मार्गदर्शन, नए विभागों के विकास और संस्थान की बौद्धिक संस्कृति को भी कमजोर करती है। प्रत्येक कुलपति का कार्यकाल समाप्त होने से कम से कम छह महीने पहले चयन प्रक्रिया शुरू करना अनिवार्य हो। लक्ष्य यह होना चाहिए कि निवर्तमान कुलपति के जाने से पहले उत्तराधिकारी तय हो जाए। केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आइआइटी और आइआइएम के लिए राष्ट्रीय उच्च शिक्षा रिक्ति डैशबोर्ड बने। इसमें स्वीकृत पद, भरे पद, खाली पद, रिक्ति की अवधि, विज्ञापन तिथि और चयन प्रक्रिया की स्थिति हर तीन महीने में सार्वजनिक की जाए। फैकल्टी भर्ती के लिए पूरे वर्ष रोलिंग विज्ञापन और निश्चित त्रैमासिक चयन कैलेंडर लागू किया जा सकता है। गुणवत्ता के मानक कम नहीं होने चाहिए,पर गुणवत्ता के नाम पर वर्षों पद खाली रहना भी स्वीकार्य नहीं है।
(लेखक जेएनयू के अटल स्कूल ऑफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर हैं)











