विचार: अराजकता करने वालों को विशेष छूट
अफसोस कि यह पहली बार नहीं, जब सरकार या फिर सुप्रीम कोर्ट या फिर दोनों, किसी समूह के अराजक व्यवहार के सामने घुटने टेकते दिखे हों। नागरिकता संशोधन कानून और तीन कृषि कानूनों के विरोध के समय भी यही हुआ था।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने सीजेपी प्रदर्शनकारियों की एफआईआर रद्द की।
घायल पुलिसकर्मियों के न्याय पर उठे गंभीर सवाल।
लेखक ने 'पूर्ण न्याय' की अवधारणा पर पुनर्विचार का आग्रह किया।
राजीव सचान। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार के आग्रह पर कॉकरोच जनता पार्टी के संसद चलो मार्च के दौरान हुई हिंसा के सिलसिले में दर्ज की गईं सभी एफआइआर रद कर दीं। केवल उन मामलों में नई एफआइआर दर्ज करने की अनुमति दी गई, जिनमें हिंसा में आपराधिक इतिहास वालों के शामिल होने का अंदेशा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से दिल्ली के साथ महाराष्ट्र, गुजरात, असम, बिहार में भी सीजेपी के उन प्रदर्शनकारियों को राहत मिल गई, जिनके खिलाफ एफआइआर दर्ज की गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इन एफआइआर को रद करने का फैसला खुद को अनुच्छेद 142 के तहत 'पूर्ण न्याय' के लिए मिली संवैधानिक शक्ति के जरिये किया, पर क्या यह सचमुच पूर्ण न्याय है?
हालांकि इस फैसले को लेकर सवाल भी उठे, लेकिन उन पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी गई। संभवतः इसलिए कि खुद सरकार ने इन एफआइआर को रद करने का निवेदन किया था और विपक्ष संग सीजेपी को तो इस फैसले में अपनी जीत ही दिख रही थी। इसके अतिरिक्त ऐसा भी लगता है कि ऐसा फैसला इसलिए आया, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस अपराधबोध से ग्रस्त था कि काकरोच जनता पार्टी का जन्म उसकी उस टिप्पणी से हुआ, जिसके सही संदर्भ को नहीं समझा गया था। जो भी हो, इस फैसले को पूर्ण न्याय की संज्ञा देना कठिन है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भले ही सत्तापक्ष-विपक्ष संतोष जता रहे हों, पर इससे दिल्ली पुलिस के सौ से अधिक वे जवान और अधिकारी क्षुब्ध होंगे, जिन्हें कथित शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों ने लहूलुहान कर दिया था-इतना अधिक कि कुछ तो मरणासन्न से हो गए थे। किसी के दांत टूटे थे तो किसी के हाथ में राड डालनी पड़ी। कुछ पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इनमें कुछ अभी तक चोटों से उबर नहीं सके हैं। क्या इन पुलिसकर्मियों को न्याय पाने का कोई अधिकार नहीं या फिर वे पूर्ण न्याय के दायरे में नहीं आते?
यह ध्यान रहे कि दिल्ली पुलिस ने खुद पर हमला करने और सार्वजनिक संपत्ति में तोड़फोड़ करने वालों के खिलाफ नामजद एफआइआर नहीं की थी। यह तो जांच का विषय था कि हिंसा किसने की? आखिर सरकार और सुप्रीम कोर्ट इस नतीजे पर कैसे पहुंचे कि सीजेपी के संसद मार्च में जिन्होंने हिंसा की, वे केवल आपराधिक अतीत वाले थे और इनके अलावा जो भी छात्र, रीलबाज, आंदोलनजीवी और राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता या समर्थक आदि थे, वे सब देवमानुष थे? प्रश्न यह भी है कि क्या न्यायशास्त्र में ऐसा कुछ लिखा है कि बिना आपराधिक अतीत वाला या फिर कोई छात्र अथवा पहली बार किसी धरने में शामिल शख्स हिंसा कर ही नहीं सकता? क्या कोई इसकी गारंटी लेने को तैयार है कि हिंसा केवल आपराधिक अतीत वालों ने ही की?
क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने पुलिसकर्मियों को उनके हाल पर छोड़ दिया? क्या ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि कुछ ऐसा नैरेटिव बना दिया गया था कि संसद मार्च के दौरान बैरिकेड तोड़कर संसद परिसर में घुसने को आमादा भीड़ शांति धुन गाते हुए आगे बढ़ रही थी और फिर भी पुलिस वाले यूं ही आपा खोकर उस पर टूट पड़े? ऐसा नैरेटिव खड़ा करने वाले आनंदित हो सकते हैं, लेकिन जिस देश में पुलिस इस तरह पीटी जाए और उसे पीटने वालों को पूर्ण न्याय के नाम पर विशेष छूट मिल जाए, वहां सीजेपी जैसे संगठनों के जरिये अराजकता के फलने-फूलने की जमीन ही तैयार होगी। क्या सरकार और सुप्रीम कोर्ट को यह भान है कि यदि सीजेपी प्रदर्शनकारी संसद परिसर में घुस जाते तो कैसा दृश्य उपस्थित होता या फिर अपेक्षा यह थी कि दिल्ली पुलिस उग्र भीड़ को खुशी-खुशी संसद परिसर घुसने देती?
यदि एक देश में दो विधान नहीं हैं तो क्या सुप्रीम कोर्ट झारखंड के उन छात्रों पर दर्ज एफआइआर रद करेगा, जिन पर विधानसभा घेराव के दौरान सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिस पर पथराव करने के आरोप में एफआइआर दर्ज की गई? ठीक यही आरोप दिल्ली पुलिस के भी थे। क्या यह विचित्र नहीं कि आरोप एक जैसे, लेकिन न्याय दो तरह का? यदि सुप्रीम कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि सीजेपी के संसद मार्च में केवल उनकी ही हिंसा किसी कार्रवाई के दायरे में आएगी, जो कथित तौर पर आपराधिक अतीत वाले थे तो फिर क्या दिल्ली पुलिस की सख्ती की जांच उसके जख्मों पर नमक छिड़कने जैसी नहीं? क्या न्याय का तकाजा यह नहीं कहता कि सीजेपी की भीड़ की हिंसा की भी जांच हो और पुलिस के बल प्रयोग की भी? पहली बार हिंसा करने वालों और विशेष रूप से छात्रों के प्रति नरमी बरतना अलग बात है और उन्हें अभयदान दे देना अलग बात।
निःसंदेह सुप्रीम कोर्ट का फैसला अंतिम होता है, लेकिन अच्छा हो कि इस फैसले पर वह पुनर्विचार करे। यह भी सही समय है कि पूर्ण न्याय को भी परिभाषित किया जाए, क्योंकि यह संविधान के मूल ढांचे वाली अवधारणा से भी अधिक गूढ़ है। अफसोस कि यह पहली बार नहीं, जब सरकार या फिर सुप्रीम कोर्ट या फिर दोनों, किसी समूह के अराजक व्यवहार के सामने घुटने टेकते दिखे हों। नागरिकता संशोधन कानून और तीन कृषि कानूनों के विरोध के समय भी यही हुआ था।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)











