विचार: फिर सवालों के घेरे में न्यायपालिका
मुख्य न्यायाधीश बनने की वरिष्ठता-परंपरा में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ का नाम है। उनके बाद बीवी नागरत्ना का नाम है।
HighLights
न्यायपालिका पर लगे आरोपों से जनता का विश्वास कमजोर।
राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश पर गंभीर आरोप।
न्यायिक सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही की तत्काल आवश्यकता।
राजीव शुक्ला। न्यायपालिका लोकतंत्र का वह हिस्सा है, जिससे आम आदमी सबसे मुश्किल समय में न्याय की उम्मीद करता है। इसलिए अदालतों के फैसले केवल कानूनी नहीं होते, वे समाज में न्याय के प्रति विश्वास को भी मजबूत करते हैं। यदि उच्चतर अदालतों में भी भ्रष्टाचार सामने आएगा तो लोगों का विश्वास कमजोर होगा। इस समय न्यायपालिका फिर से विवादों के घेरे में है। जज ही जज पर आरोप लगा रहे हैं। न्यायपालिका की स्वतंत्रता जितनी जरूरी है, उसकी प्रतिष्ठा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत का कहना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के अनुरूप ही है कि किसी जज के खिलाफ लगाए गए आरोपों को तब तक आखिरी नहीं माना जा सकता, जब तक संबंधित जज को अपना पक्ष रखने का मौका न मिले।
राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति संदीप मेहता द्वारा लिखे गए पत्रों के मामले में भी उन्होंने नियमों के सही पालन पर जोर दिया। किसी जज के खिलाफ आरोप कितने ही गंभीर क्यों न हों, यदि न्यायपालिका खुद आरोप और निष्कर्ष के बीच का अंतर मिटा दे, तो वह उस ढांचे को ही कमजोर करेगी, जिसकी रक्षा उसे करनी है। आरोपों की जांच और तथ्यों की पड़ताल होनी चाहिए, लेकिन यह सब निर्धारित नियमों के भीतर होना चाहिए।
राजस्थान का मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है कि शिकायत करने वाले खुद सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हैं। जस्टिस संदीप मेहता ने 2, 10 और 17 अगस्त को लिखे पत्रों में राजस्थान हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश पर प्रशासनिक अधिकारों के कथित दुरुपयोग, मामलों की सूची में हस्तक्षेप और पक्षपात जैसे गंभीर आरोप लगाए। इन आरोपों की सच्चाई का फैसला तो जांच के बाद ही हो सकता है, लेकिन आखिर ये पत्र सार्वजनिक कैसे हुए? यदि किसी जज के खिलाफ शिकायत भेजी जाती है तो उसकी गोपनीयता का भी अपना महत्व है। शिकायत सार्वजनिक होना और शिकायत पर कार्रवाई होना दो अलग-अलग बातें हैं। कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन यह भी पता लगना चाहिए कि पत्र सार्वजनिक कैसे हुए। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी गंभीर शिकायत को दबा दिया जाए, बल्कि इसके उलट शिकायत की निष्पक्ष जांच और उसकी प्रक्रिया की गोपनीयता, दोनों साथ-साथ चलनी चाहिए।
न्यायपालिका के भीतर जवाबदेही का अर्थ यह नहीं हो सकता कि संस्थागत प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही पूरा विवाद सार्वजनिक बहस का जरिया बन जाए। आज न्यायपालिका के सामने एक और चुनौती है कि उसकी टिप्पणियों और फैसलों को देखने का तरीका बदल रहा है। अदालत में सुनवाई के दौरान जज कई बार सवाल पूछते हैं, टिप्पणी करते हैं या किसी विषय पर अपनी चिंता व्यक्त करते हैं। ये टिप्पणियां हमेशा अंतिम निर्णय का हिस्सा नहीं होतीं। किसी टिप्पणी का छोटा सा वीडियो कुछ ही मिनटों में डिजिटल मीडिया पर पहुंच सकता है। इसके बाद लोग अपने-अपने हिसाब से उस पर टिप्पणी करने लगते हैं, जबकि संभव है कि अंतिम फैसले में अदालत ने बिल्कुल अलग नजरिया अपनाया हो। कई बार अदालत की टिप्पणियों के कारण नेताओं को भी ऐसे शब्द सुनने पड़ते हैं, जिनकी शायद आवश्यकता नहीं होती। इसी तरह कई बार एक पक्ष फैसला आने से पहले ही न्यायाधीश की प्रशंसा करने लगता है और दूसरा उस पर सवाल खड़े करने लगता है। लोकतांत्रिक समाज के लिए यह स्थिति शुभ नहीं है।
फैसले से असहमति लोकतंत्र में स्वाभाविक है। सत्तापक्ष, विपक्ष से लेकर आम नागरिक किसी फैसले से असहमत हो सकता है। कानून के दायरे में फैसले की आलोचना का अधिकार होना चाहिए, लेकिन आलोचना और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली भाषा के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। समाज, राजनीतिक दलों, मीडिया और डिजिटल मीडिया को अपनी भूमिका समझनी होगी, लेकिन इसी के साथ न्यायपालिका को भी अपनी कार्यप्रणाली पर गंभीरता से विचार करना होगा। समय आ गया है कि न्यायिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा बचाने के लिए व्यापक विचार-विमर्श हो। वर्चुअल-हाइब्रिड सुनवाई की व्यवस्था आज न्याय तक पहुंच आसान बनाने का माध्यम है। इसलिए इसे पीछे नहीं ले जाया जा सकता, लेकिन यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणियों और अंतिम न्यायिक निर्णय के बीच का अंतर आम लोगों तक स्पष्ट रूप से पहुंचे।
आम नागरिक का न्यायपालिका से पहला सामना निचली अदालत में होता है। यहीं से न्यायपालिका के प्रति उसकी राय बनती है। दुर्भाग्य से यह विचार काफी मजबूत हो चुका है कि न्यायपालिका के निचले स्तर पर भ्रष्टाचार है। यह कहना गलत होगा कि हर निचली अदालत या हर न्यायिक अधिकारी भ्रष्ट है, लेकिन शिकायतों और धारणा को नजरअंदाज करना भी सही नहीं होगा। न्यायपालिका की प्रतिष्ठा सुप्रीम कोर्ट के बड़े संवैधानिक फैसलों से जितनी बनती है, उतनी ही उस व्यक्ति के अनुभव से भी बनती है, जो वर्षों तक अपनी तारीख का इंतजार करता है। इसलिए न्यायिक सुधार की चर्चा केवल शीर्ष अदालतों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे व्यापक स्तर पर ले जाया जाना आवश्यक है।
मुख्य न्यायाधीश बनने की वरिष्ठता-परंपरा में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ का नाम है। उनके बाद बीवी नागरत्ना का नाम है। नाथ का कार्यकाल सितंबर 2027 तक और नागरत्ना का अक्टूबर 2027 तक है। न्यायमूर्ति नागरत्ना के संभावित कार्यकाल का महत्व इसलिए होगा कि वे भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनेंगी, लेकिन किसी के महिला होने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि न्यायपालिका अपने संस्थागत चरित्र को किस तरह मजबूत करती है। न्यायपालिका को न तो आलोचना से डरना चाहिए और न ही अपनी प्रतिष्ठा के प्रति लापरवाह होना चाहिए। आज लोग अदालती फैसले केवल अखबार में ही नहीं पढ़ते, बल्कि उसे वीडियो में भी देखते हैं, डिजिटल मीडिया पर चर्चा करते हैं और तुरंत प्रतिक्रिया भी देते हैं। ऐसे में न्यायपालिका के लिए सबसे जरूरी चीज है कि वह विश्वसनीयता बनाकर कैसे रखे? न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा आंतरिक पारदर्शिता, जवाबदेही, मर्यादा और संस्थागत अनुशासन से भी होती है।
(लेखक कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य हैं)











