स्वतंत्रता दिवस का आगमन केवल उत्साह और उमंग के क्षण ही उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि आजादी की लड़ाई लड़ने वालों के संघर्ष और बलिदान की भी याद दिलाता है। उनके सपनों के भारत का निर्माण करना हम सबका साझा लक्ष्य होना चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति आसानी से तब संभव हो पाएगी, जब अनुशासन, एकजुटता और देश के प्रति कर्तव्य की भावना से लैस रहा जाएगा।

अब जब विकसित भारत के लक्ष्य का संधान किया जा रहा है और पिछले कुछ दशकों में हासिल की गई उपलब्धियों से यह दिख रहा है कि इस लक्ष्य की प्राप्ति संभव है, तब यह और भी आवश्यक हो जाता है कि एक नागरिक के तौर पर हर कोई अपने हिस्से के कर्तव्य को भी समझे।

ऐसा करते हुए इस पर चिंतन-मनन किया ही जाना चाहिए कि देश को मिलकर तेजी के साथ आगे कैसे बढ़ाया जा सकता है? इसके लिए हर पहल, हर विचार का विरोध करने की आदत का परित्याग करना होगा। हमें असहमति के बीच सहमति के रास्ते तलाशने होंगे। इसके लिए नकारात्मकता का परित्याग करना होगा, क्योंकि यह स्पष्ट दिख रहा है कि बीते कुछ समय से विरोध के लिए विरोध का भाव बढ़ा है। इसके नतीजे में सकारात्मकता के लिए स्थान घटा है। इसका प्रमाण असहमति प्रकट करने के उग्र तरीकों और भाषा की मर्यादा में गिरावट के रूप में देखने को मिल रहा है।

यह चिंता की बात है कि सकारात्मकता का ह्रास उस राजनीति में अधिक हुआ है, जिस पर देश का नेतृत्व करने और उसे दिशा दिखाने की जिम्मेदारी होती है। आखिर ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व देश को विकसित बनाने का खाका मिलकर तैयार करे और इसके लिए किसी न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर भी सहमत हो? यह शुभ नहीं कि वर्तमान में पक्ष-विपक्ष राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर सहमत नहीं होते।

स्थिति यह है कि वे ऐसे विषय़ों पर दलगत राजनीति से परे हटकर नीर-क्षीर ढंग से विचार-विमर्श करने के लिए भी आगे नहीं आते। अब जो लोग जहां कहीं भी शासन में हैं, उनका चयन हम स्वयं करते हैं। ऐसे में हम उनके प्रति वह रवैया नहीं अपना सकते, जो अंग्रेजी सत्ता के लिए अपनाते थे। हमें शासन-प्रशासन का सहयोग और समर्थन भी करना सीखना होगा।

यह ठीक नहीं कि हम इसकी चाह तो रखें कि शासन और प्रशासन अपने कार्य-व्यवहार में बदलाव लाएं, लेकिन स्वयं में कोई परिवर्तन लाने के लिए आगे न आएं। इसकी अनदेखी न की जाए कि देश में अनेक कार्य इसलिए सही तरह आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, क्योंकि इस पर मतभेद हैं कि उन्हें कैसे किया जाना है। यह स्थिति अस्पष्टता के साथ भ्रम को भी जन्म दे रही है।

समाज को इस स्थिति से बाहर निकलना होगा और इस मूल मंत्र को सभी को आत्मसात करना होगा कि सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सशक्त भारत का सपना सभी के सहयोग की मांग करता है। यह सहयोग भाव ही समरस और समर्थ भारत के निर्माण की कुंजी है।