विचार: आसान नहीं साइबर अपराधों पर अंकुश
डाटा सिक्योरिटी काउंसिल आफ इंडिया यानी डीएससीआइ द्वारा समय-समय पर साइबर क्राइम की जांच-पड़ताल से संबंधित पुस्तक प्रकाशित की गई है, जो काफी उपयोगी है।
HighLights
डिजिटल अरेस्ट और डीप-फेक को पृथक अपराध बनाने पर विचार।
साइबर अपराध जांच में पुलिस प्रशिक्षण और विशेषज्ञता की कमी।
आरके विज। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ‘डिजिटल अरेस्ट’ को एक पृथक अपराध के रूप में अधिसूचित करने पर विचार करे। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि वह ‘डिजिटल अरेस्ट’ और ‘डीप-फेक’ को पृथक अपराध अधिसूचित करने पर विचार कर रही है। यद्यपि डिजिटल अरेस्ट के जितने भी तत्व हैं, वे पहले से ही अपराध की श्रेणी में है। फिर भी डिजिटल अरेस्ट को एक नया अपराध मानकर उसके लिए सजा में वृद्धि का प्रविधान किया जा सकता है।
डीप-फेक को सरकार ने आइटी नियमों के तहत फरवरी 2026 में ‘कृत्रिम रूप से जुटाई गई जानकारी’ के रूप में परिभाषित किया है। इसे आइटी अधिनियम में सम्मिलित किया जा सकता है। इससे पहले 2021 और 2023 में आइटी नियमों में कुछ संशोधन कर इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म्स की जिम्मेदारी बढ़ाने का प्रयास किया गया था। केंद्र सरकार द्वारा साइबर क्राइम को किसी भी स्थान से रिपोर्ट करने के लिए एक पोर्टल भी संचालित किया जा रहा है, जो थानों के क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम्स यानी सीसीटीएनएस सिस्टम से जुड़ा है।
करीब दो वर्ष पहले आइपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट की जगह भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम अधिसूचित किए गए थे। यद्यपि नए कानून पुराने कानून से अधिक भिन्न नहीं, फिर भी इलेक्ट्रानिक एविडेंस को नए कानून में अधिक तवज्जो दी गई है और प्राइमरी डाक्यूमेंट एविडेंस की बेहतर ढंग से व्याख्या की गई है।
जहां तक सेकेंडरी डाक्यूमेंट एविडेंस को कोर्ट में मान्य करने का प्रश्न है, उसका फार्मेट तय कर एविडेंस को सुरक्षित रखने के एल्गोरिदम स्पष्ट किए गए हैं। बावजूद इसके, इलेक्ट्रानिक एविडेंस एकत्रित करने, एक से दूसरे स्थान पर सुरक्षित ट्रांसपोर्ट करने और सुरक्षित रखने जैसे पहलुओं की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से भी कोई महत्वपूर्ण निर्देश नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इतना जरूर तय किया है कि इलेक्ट्रानिक एविडेंस कोर्ट में मान्य करने के लिए क्या शर्तें रहेंगी? 2020 में ‘अर्जुन पंडित राव खोटकर’ प्रकरण में उसने कहा था कि जहां तक सेकेंडरी इलेक्ट्रानिक एविडेंस का प्रश्न है, वह एविडेंस एक्ट की धारा 65-बी(4) के तहत जारी सर्टिफिकेट के बिना कोर्ट में मान्य नहीं किया जाएगा। अर्थात यदि सीसीटीवी कैमरे की मूल स्टोरेज, कंप्यूटर-लैपटाप की मेमोरी में जानकारी प्रस्तुत नहीं की जाती या की जा सकती है तो उसकी सच्ची प्रति तभी मान्य होगी, जब उसके साथ धारा 65-बी(4) का सर्टिफिकेट संलग्न हो।
इसके कुछ अपवाद हैं, पर सर्टिफिकेट प्रस्तुत करना अनिवार्य है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम में लगभग यही प्रविधान धारा 63(4) के अंतर्गत किया गया है। नए अधिनियम में सीन आफ क्राइम और सर्च-सीजर के दौरान फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी को अनिवार्य किया गया है। ये कुछ ऐसे प्रविधान हैं, जिनसे मौके पर की गई कार्रवाई की पुष्टि होती है और एविडेंस को अधिक बल मिलता है। इसके लिए सरकार द्वारा ई-साक्ष्य एप्लीकेशन भी तैयार किया गया है, जो उपयोगी है।
2016 में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रानिक एविडेंस को एक माध्यम से प्राप्त करने के लिए एक मार्गदर्शिका तैयार करने के लिए पांच जजों की समिति बनाई थी। इस समिति ने नवंबर 2018 में सरकार को नियमों का ड्राफ्ट तैयार कर एक रिपोर्ट भी सौंपी, लेकिन उस पर क्या निर्णय लिया गया, इसकी कोई जानकारी नहीं। 2018 में भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा एक भारतीय मानक-आइएस/आइएसओ/आइईसी 27037: 2012 जारी किया गया था, जिसमें इलेक्ट्रानिक एविडेंस की पहचान करने, उसे संग्रहित करने, उसे प्राप्त करने और सुरक्षित रखने के सुझाव दिए गए। यह मानक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, पर इसके अनिवार्य रूप से पालन करने के लिए इसे कानूनी रूप देना जरूरी है।
डाटा सिक्योरिटी काउंसिल आफ इंडिया यानी डीएससीआइ द्वारा समय-समय पर साइबर क्राइम की जांच-पड़ताल से संबंधित पुस्तक प्रकाशित की गई है, जो काफी उपयोगी है। हालांकि डीएससीआइ कोई सरकारी संस्था नहीं है। आइटी एक्ट की धारा 70-बी के तहत ‘इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम’ भारत सरकार की ऐसी संस्था है, जो साइबर सिक्योरिटी के संबंध में समय-समय पर राज्यों को अलर्ट जारी करती है। डीएससीआइ के सहयोग से या भारत की कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम को जांच के मानक तय करने की जिम्मेदारी देकर यह कार्य किसी अन्य एक्सपर्ट कमेटी को सौंपा जाए तो यह साइबर क्राइम की जांच में एकरूपता और गुणवत्ता लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
इसके अलावा जो भी थाने साइबर क्राइम की जांच के लिए स्थापित किए जा रहे हैं, उनमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कंप्यूटर साइंस की जानकारी वाले ही उपनिरीक्षक और डीएसपी के रूप में तैनात हों। एक सामान्य ग्रेजुएट को कितना भी प्रशिक्षण दे दिया जाए, अपवादों को छोड़कर, वह साइबर क्राइम जांच की पेचीदगी नहीं समझ सकता। माओवादी गतिविधियों से संबंधित जीएन साईंबाबा प्रकरण में बांबे हाई कोर्ट ने कहा था कि आरोपित से जब्त की गई सामग्री विधिवत जब्ती नहीं है। आरोपितों को दोषमुक्त करने का यह भी एक कारण था।
अभी राज्यों की साइबर फोरेंसिक लैब में भी विशेषज्ञों की संख्या बहुत सीमित है, जबकि सेकेंडरी एविडेंस के सभी सर्टिफिकेट की उनके द्वारा पुष्टि किया जाना जरूरी है। इसीलिए बिना संसाधनों को बढ़ाए, केवल नए कानून परिभाषित करने से अपराधियों को सजा दिलाना मुश्किल है। इसके लिए जरूरी है कि जांच के मानक तय हों, ताकि प्रक्रिया में एकरूपता हो, मजिस्ट्रेट को भी उनका ज्ञान हो, कोर्ट में इलेक्ट्रानिक साक्ष्य मान्य हों और पुलिस अधिकारी पूरी प्रक्रिया कोर्ट को समझा पाएं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआइ ने डिजिटल अरेस्ट के कुछ महत्वपूर्ण मामले अपने हाथ में जरूर लिए हैं, पर जरूरी है कि राज्यों की पुलिस ऐसे अपराधों की जांच के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित हो।
(लेखक छत्तीसगढ़ के पूर्व डीजीपी हैं)











