संसद का मानसून सत्र जिस तरह समाप्त हुआ, वह लोकतंत्र के लिए एक शोकांतिका है। संसद के इस सत्र में अधिकतर समय हंगामा हुआ और जो विधेयक पारित भी हुए, उनमें से अधिकांश बिना चर्चा के पारित हो गए। केवल पेपरलीक विरोधी कानून में संशोधन वाले विधेयक पर चर्चा हो सकी, लेकिन इसका श्रेय विपक्ष को नहीं, नीट मामले में धरना-प्रदर्शन करने वाली काकरोच जनता पार्टी को जाता है।

तथ्य यह भी है कि विपक्ष ने इस विधेयक पर चर्चा के समय पेपरलीक कानून के प्रविधानों पर कुछ कहने के बजाय अन्य मुद्दों को तूल दिया। सत्तापक्ष इससे संतुष्ट हो सकता है कि उसके एजेंडे के अधिकांश विधेयक पारित हो गए, लेकिन संसद इसलिए नहीं होती कि विधेयक बिना किसी चर्चा के पारित हो जाएं। जब कोई विधेयक बिना किसी चर्चा के पारित होता है तो उसके गुण-दोष से जनता अवगत नहीं हो पाती।

गुण-दोष का उल्लेख करने की जिम्मेदारी जिस विपक्ष पर होती है, उसने अपने ही हाथों उसे गंवाना बेहतर समझा। बिना चर्चा के विधेयक पारित होने का एक दुष्परिणाम यह भी होता है कि जो कानून बनते हैं, वे कसौटी पर खरे नहीं उतरते। इसीलिए उनमें बार-बार संशोधन करने की नौबत आती है। इसका कारण संसद के विमर्श में आई गिरावट है।

संसद इसलिए होती है कि विधेयकों के साथ महत्वपूर्ण विषयों पर सार्थक चर्चा हो सके, लेकिन अब संसद में यही काम नहीं होता, क्योंकि विपक्ष की हंगामा करने में दिलचस्पी रहती है तो सत्तापक्ष की हंगामे के बीच जैसे-तैसे अपना काम पूरा करने की। एक तरह से राजनीतिक दल ही संसद की महत्ता कम करने का काम कर रहे हैं। यह वह स्थिति है, जो संसद के प्रति जनता की आस्था को डिगाने वाली है।

संसद लोकतंत्र का एक अनिवार्य एवं महत्वपूर्ण मंच है। इस मंच का निरतंर क्षरण लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं हो सकती कि लोकतंत्र को कमजोर करने का काम संसद के अंदर से हो। विपक्ष इससे संतुष्ट हो सकता है कि उसने संसद के भीतर-बाहर हंगामा करके सदन नहीं चलने दिए, लेकिन इससे उसे कोई लाभ नहीं मिलने वाला, क्योंकि जनता को उसके नारे और पोस्टर नहीं याद रहने वाले।

उसे तो यह याद रहेगा कि उसके मुद्दों पर कोई बात ही नहीं हुई। चिंताजनक केवल यह नहीं कि अब संसद में शोर-शराबा ही होता रहता है और हंगामा करने के लिए सांसद अतिरिक्त परिश्रम करते हैं, बल्कि यह भी है कि आरोप-प्रत्यारोप की भाषा का स्तर गिरता जा रहा है। वह छिछली और अशोभनीय होती जा रही है। इसके चलते संसद और सड़क की राजनीति का अंतर खत्म हो रहा है। यदि पक्ष-विपक्ष जनहित के मुद्दों पर चर्चा करने पर सहमत नहीं हो सकते तो फिर वे जन अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सकते।