विचार: एक बड़ा उद्यम बना मिलावटखोरी
देश में ऐसे सरकारी विभागों की कमी नहीं, जो जिस काम के लिए बने हैं, वही कर पाने में बुरी तरह नाकाम हैं। परिणाम यह है कि गुणवत्ता के मानकों की हर कहीं अनदेखी हो रही है।
HighLights
बेंगलुरु के नामी होटलों में मिला बासी, सड़ा-गला खाना
महाराष्ट्र में एफडीए ने मिलावटखोरी पर की कड़ी कार्रवाई
खाद्य सुरक्षा नियामक एफएसएसएआई की विफलता उजागर हुई
राजीव सचान। बेंगलुरु को भारत की सिलिकॉन वैली कहा जाता है। यह शहर अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान स्थापित करने में सफल रहा है, लेकिन एक लंबे समय से ट्रैफिक जाम के लिए कुख्यात भी है। बीते दिनों यह इसलिए भी कुख्यात हुआ कि यहां के कई होटलों, रेस्त्रां, पब आदि में सड़ा-गला और बासी खाना पाया गया। ये प्रीमियम कहे जाने वाले नामी होटल, रेस्त्रां, पब हैं। फूड सेफ्टी विभाग ने कई होटलों, रेस्त्रां और पब में छापेमारी के दौरान दोयम दर्जे का जो खराब खाना पाया, वह अच्छी-खासी मात्रा में था। इसमें मांस, सब्जियां, तेल, बेकरी एवं डेरी उत्पाद आदि थे।
कुछ खाद्य सामग्री तो इतनी खराब थी कि उसे नष्ट करना पड़ा। जब नामी यानी महंगे होटलों, रेस्त्रा, पब में खराब और बासी खाद्य सामग्री का उपयोग किया जा रहा हो तो आम होटलों, रेस्त्रां और फुटपाथ किनारे की दुकानों में खाने-पीने की सामग्री की गुणवत्ता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। ऐसे किसी निष्कर्ष पर पहुंचना खुद को धोखे में रखना होगा कि बेंगलुरु के होटलों, रेस्त्रां आदि में अस्वास्थ्यकर खाने-पीने की सामग्री मिलना एक अपवाद हो सकता है। प्रबल आसार यही हैं कि जैसी खराब खाद्य सामग्री बेंगलुरु के होटलों, रेस्त्रां, पब में मिली, वैसी ही देश के अन्य शहरों के ऐसे ही ठिकानों में मिल सकती है। ऐसा तभी होगा, जब इन ठिकानों पर खाद्य सामग्री की परख करने के लिए छापेमारी की जाएगी। अभी तो यह रस्मी तौर पर ही होती है।
खाने-पीने की सामग्री में मिलावटखोरी के मामले में बेंगलुरु जैसा हाल शेष देश में भी है, इसका अनुमान उन खबरों से लगाया जा सकता है, जो यह बताती हैं कि महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए आयुक्त तुकाराम मेंढे ने मिलावटखोरी के अपने अभियान के दौरान बड़ी संख्या में होटल, रेस्त्रां, कैंटीन आदि सील किए। इसलिए किए, क्योंकि उनमें मिलावटी या घटिया खाने-पीने की सामग्री बन और बिक रही थी। किसी को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि बेंगलुरु और महाराष्ट्र में एफडीए की कार्रवाई के बाद हालात सुधर जाएंगे।
ऐसा होने की संभावना इसलिए नहीं, क्योंकि देश में मिलावटी और दोयम दर्जे की खाद्य सामग्री के खिलाफ कभी-कभार ही अभियान छिड़ता है। ऐसे अभियान तो सतत चलने चाहिए, न कि शिकायत मिलने पर या फिर बड़े त्योहारों के पहले। बेंगलुरु और महाराष्ट्र के मामलों को छोड़ दिया जाए तो अपने देश में एफडीए जैसे विभाग त्योहारों के पहले चेतते हैं। वे इन दिनों मिलावटी खाद्य सामग्री के खिलाफ जब अपना अभियान चलाते हैं तो उन्हें बड़ी मात्रा में घटिया या नकली मिठाई, खोया, दूध, पनीर आदि न जाने क्या-क्या मिलता है।
अब वह जमाना नहीं रहा कि कोई घर के बने खाने को शुद्ध बताकर संतुष्टि का आभास कर सके, क्योंकि इसका कोई ठिकाना नहीं कि बाजार में मिलने वाला पैकेटबंद-सीलबंद घी, तेल, दूध, पनीर, मसाला आदि शुद्ध ही हो। इन सबमें मिलावट की आशंका रहती है और प्रायः वह सही साबित होती है। ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि देश में मिलावटखोरी एक बड़ा उद्यम बन गया है। पहले यह कुटीर उद्योग जैसा था, लेकिन पिछले कुछ समय में इसने एक बड़े उद्योग का रूप ले लिया है। क्या यह किसी से छिपा है कि नकली-घटिया घी, खाद्य तेल, पनीर, खोया, मसाले आदि बनाने वाली फैक्ट्रियों का भंडाफोड़ होता ही रहता है?
अब तो स्थिति यह है कि अपने देश में नकली या फिर घटिया दवाएं भी बड़ी मात्रा में बन और बिक रही हैं। अपने यहां हर तरह के नियम-कानून बने हुए हैं और उनमें संशोधन-परिवर्तन भी होता रहता है, लेकिन या तो उन पर सही तरह अमल नहीं होता या फिर अधिकतर मामलों में कुछ ले-देकर लीपापोती कर दी जाती है। इसका कारण यह है कि यदि एफडीए जैसे विभाग भ्रष्टाचार के अड्डे बन गए हैं तो भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआइ भारत सरकार के नाकारा निकायों में से एक है। यह केंद्र सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है। इसका काम देश में बिकने वाले खाद्य पदार्थों की सुरक्षा और गुणवत्ता तय करना है, लेकिन यह यही काम नहीं कर पा रहा है।
देश में ऐसे सरकारी विभागों की कमी नहीं, जो जिस काम के लिए बने हैं, वही कर पाने में बुरी तरह नाकाम हैं। परिणाम यह है कि गुणवत्ता के मानकों की हर कहीं अनदेखी हो रही है। सरकारी विभागों की अक्षमता और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार लोगों के लिए जानलेवा सिद्ध हो रहा है, लेकिन सरकारें चेतने से इन्कार कर रही हैं। एक बार को मिलावटी या नकली अखाद्य पदार्थों को बनाना और बेचना अक्षम्य कहा जा सकता है, लेकिन खाद्य पदार्थों और दवाओं में मिलावट तो जघन्य अपराध है। यह एक तरह से लोगों को धीमा जहर देने जैसा है।
इसके बाद भी देश में खाद्य सामग्री और औषधियों में मिलावट करने वाले बेलगाम-बेखौफ हैं। उन्हे पता है कि वे अपने किए की सजा नहीं पाएंगे। जिस देश में दोयम दर्जे की गुणवत्ता वाली या नकली खाने-पीने की सामग्री और यहां तक दवाएं भी धड़ल्ले से बन और बिक रही हों, वहां इस पर किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए कि बुनियादी ढांचे का निर्माण भी दोयम दर्जे का हो रहा है।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)











