विचार: आसान नहीं शेख हसीना की वतन वापसी
पिछले दो वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में जो खटास आई है, उसकी शुरुआत ढाका से हुई। भारत ने बातचीत और कूटनीति को बराबर महत्व दिया और मित्रता का हाथ बढ़ाया।
HighLights
शेख हसीना ने दिल्ली में 2024 की घटनाओं को सुनियोजित बताया।
बांग्लादेश ने प्रेस वार्ता पर आपत्ति जताई, भारत पर निशाना साधा।
हसीना की वापसी मुश्किल, उन पर सैकड़ों मामले दर्ज हैं।
ऋषि गुप्ता। बांग्लादेश में वर्ष 2024 में हुआ ‘जुलाई आंदोलन’ ऐसा घटनाक्रम था, जिसके नतीजे में एक निर्वाचित प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़कर भारत आना पड़ा। इस घटना के दो वर्ष पूरे होने पर शेख हसीना ने दिल्ली में एक प्रेस वार्ता की, जहां तीन प्रमुख बातें रखीं। पहली, 2024 की घटनाएं सुनियोजित थीं, जिनका इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया के बिना सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाने के लिए किया गया। दूसरी, अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यकों पर निशाना साधा गया और तीसरी यह कि वह बांग्लादेश लौटेंगी।
इस प्रेस वार्ता में शेख हसीना के बेटे सजीब वाजेद भी अमेरिका से आनलाइन माध्यम से जुड़े। यह पूरी वार्ता बांग्लादेश सरकार को पसंद नहीं आई और उसके विदेश मंत्रालय ने कड़े शब्दों में निंदा करते हुए प्रेस वक्तव्य जारी किया। वक्तव्य में प्रेस वार्ता को ‘अत्यंत आक्रोश’ का विषय बताते हुए बांग्लादेश ने भारत पर निशाना साधा कि क्यों किसी ऐसे कार्यक्रम की अनुमति दी गई, जिससे संबंधों पर असर पड़ सकता है।
चूंकि बीते दो वर्षों में शेख हसीना ने पहली बार लाइव प्रेस वार्ता की, इसलिए बांग्लादेश की प्रतिक्रिया आना स्वभाविक थी, लेकिन क्या यह प्रेस वार्ता बांग्लादेश और भारत के बीच संबंधों के विकास के लिए हानिकारक है? पिछले दो वर्षों में बांग्लादेश में व्यापक बदलाव आए हैं। जहां 2024 के आंदोलन के तुरंत बाद मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी, वहीं इस वर्ष चुनावों के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की जीत के साथ तारिक रहमान प्रधामंत्री बने।
इतना ही नहीं, नए राजनीतिक समीकरण उभरे। इनमें पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी पार्टी चुनाव लड़ी और विपक्ष में बैठी। यदि वह सब एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा था तो शेख हसीना पर तोहमत क्यों, खासकर तब जब वे बांग्लादेश में नहीं, बल्कि भारत में हैं?
क्या ऐसा ही दबाव शेख हसीना ने अपने शासनकाल में ब्रिटेन पर तब बनाया था, जब मौजूदा प्रधानमंत्री तारिक रहमान तमाम कानूनी और राजनीतिक विवादों से घिरे होने के बावजूद इंग्लैंड में रह रहे थे और वहीं से अपनी राजनीतिक गतिविधियां संचालित करते थे? ऐसा उन्होंने 17 वर्षों तक किया। निर्वासन और राजनीतिक शरण की परंपरा दुनिया की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में नई नहीं है और यह चलन अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करता है।
यदि किसी समय तारिक रहमान के ब्रिटेन में रहने को राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम माना गया, तो आज शेख हसीना के भारत में रहने को अपराध के रूप में क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है? यह तो दोहरे मानदंडों का संकेत है। क्या लोकतंत्र का असली पैमाना यह नहीं कि प्रत्येक सिद्धांत सभी लोगों पर समान रूप से लागू हो?
बांग्लादेश की मंशा ‘भारत विरोध’ के सहारे राजनीतिक रोटियां सेंकने की है। आज ‘भारत-विरोध’ कई पड़ोसी देशों में विभिन्न दलों की राजनीतिक साख बनाने का ट्रेंड बन गया है। इसी कारण भारत को केंद्र में रखकर राजनीतिक बयानबाजी आम हो गई है। यह न्यायसंगत नहीं कि बांग्लादेश सरकार शेख हसीना के भारत में शरण लेने को मुद्दा बनाए रखे। यह संभव नहीं कि भारत उन्हें कूटनीतिक सुविधा के आधार पर बांग्लादेश के हवाले कर दे और वह भी यह जानते हुए कि हुए कि वहां न्याय एकतरफा है।
प्रत्यर्पण का प्रश्न केवल दो देशों के संबंधों का मामला नहीं, बल्कि यह तमाम प्रक्रियाओं, निष्पक्ष सुनवाई और मानवाधिकारों से भी जुड़ा हुआ है। बांग्लादेश की विदेश नीति में दूरदर्शिता की कमी दिखती है, खासकर ऐसे पड़ोसी देश के प्रति जो न केवल व्यापार, लोगों के बीच संबंधों, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी उसका मित्र है। जो यह कह रहे हैं कि भारत शेख हसीना को बांग्लादेश को सौंपकर उससे रिश्ते सुधार ले, उनसे प्रश्न है कि भारत ने उससे संबंध बिगाड़े ही कब? और फिर इसकी क्या गारंटी कि शेख हसीना के प्रत्यर्पण से सारे मसले हल हो जाएंगे?
पिछले दो वर्षों में दोनों देशों के संबंधों में जो खटास आई है, उसकी शुरुआत ढाका से हुई। भारत ने बातचीत और कूटनीति को बराबर महत्व दिया और मित्रता का हाथ बढ़ाया। बांग्लादेश को यह समझना जरूरी है कि भारत से संबंध किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द नहीं घूम सकते। दोनों देशों के रिश्तों की बुनियाद साझा इतिहास, भूगोल, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता पर टिकी है। यदि संबंधों की दिशा केवल शेख हसीना के प्रत्यर्पण से तय होने लगी, तो फिर कूटनीतिक और पारस्परिक हित व्यर्थ के विषय हो जाएंगे। शेख हसीना को अपने हवाले करने की मांग के बीच उन्होंने स्वयं ही वापस जाने की मंशा जताई है।
उन्होंने कहा कि जो भी हो, मैं अपने लोगों के पास जाऊंगी, लेकिन उनका वापस जाना आसान नहीं, खासकर तब जब उनके खिलाफ सैकड़ों मामले बदले की भावना से दर्ज हैं और कुछ में तो उन्हें मौत की सजा भी सुनाई गई है। ये सभी मामले ऐसे हैं, जिनमें शेख हसीना का पक्ष नहीं लिया गया, फिर भी उनकी वापसी एक नए आंदोलन का रास्ता फिर खोल सकता है। ऐसे आंदोलन बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास सच्चाई रहे हैं, लेकिन मौजूदा स्थिति में एक नया आंदोलन संभव नहीं दिखता, क्योंकि अवामी लीग अब लगभग भूमिगत हो गई है। ऐसे में अब शायद एक पीढ़ीगत इंतजार के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है।
(लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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