जागरण संपादकीय: संसद में सड़क की राजनीति
यह ठीक नहीं कि संसद में विधेयक बिना चर्चा के पारित हो जाए, लेकिन ऐसा हो रहा है। इसके लिए विपक्ष ही अधिक जिम्मेदार है।
HighLights
विपक्ष ने गृह मंत्री के जवाब पर आनाकानी कर हंगामा किया।
संसद में सड़क जैसी राजनीति से गंभीर चर्चा बाधित हुई।
महत्वपूर्ण विधेयक बिना बहस के पारित, विपक्ष की भूमिका पर सवाल।
यह हास्यास्पद है कि जो विपक्ष और विशेष रूप से कांग्रेस जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ के संसद मार्च में हुई हिंसा पर गृह मंत्री अमित शाह के जवाब की जिद पकड़े थी, वह अचानक उनका जवाब सुनने में आनाकानी करती हुई दिखाई देने लगी। इसके लिए राहुल गांधी यहां तक कहने लगे कि इस मामले में उसे गृह मंत्री से यह जानना है कि कथित तौर पर गोली चलाने के आदेश यदि उन्होंने नहीं दिए थे तो क्या वे इससे अनजान हैं कि किसने दिए थे?
क्या इससे बेतुकी बात और कोई हो सकती है? क्या राहुल गांधी यह कहने की कोशिश करते नहीं दिखते कि इस मसले पर गृह मंत्री वही जवाब दें, जो वे सुनना चाहते हैं? हैरानी नहीं कि कल को वे यह कहते दिखाई दें कि सरकार को विपक्ष के सवालों के जवाब में जो कुछ बोलना है, वह इसका निर्धारण खुद करेंगे। उनके इसी विचित्र रवैये के कारण सत्तापक्ष के सांसद संसद परिसर में ऐसे बैनरों के साथ दिखे कि राहुल गांधी भागो मत।
उनसे झारखंड में छात्रों पर लाठीचार्ज के मामले में भी जवाब मांगा गया। यह स्थिति यही रेखांकित करने वाली है कि संसद में किसी भी विषय पर गंभीर चर्चा के लिए स्थान किस तरह लगातार कम होता जा रहा है। संसद में सड़क जैसी राजनीति होना दुर्भाग्यपूर्ण है। विपक्ष यह साधारण सी बात समझने के लिए तैयार नहीं कि संसद में हंगामा करने से वह केवल अपना अहित ही नहीं करता, बल्कि सत्तापक्ष का काम आसान करता है और उसे जवाबदेह बनाने के अवसर भी गंवाता है।
विपक्षी दलों को यह नजर आना चाहिए कि उनके हंगामे के बाद भी कई विधेयक पारित होते जा रहे हैं। क्या इसका सीधा मतलब यह नहीं कि विपक्ष की दिलचस्पी यह जानने-समझने में कतई नहीं कि किसी प्रस्तावित कानून में क्या प्रविधान किए जा रहे हैं?
यह ठीक नहीं कि संसद में विधेयक बिना चर्चा के पारित हो जाए, लेकिन ऐसा हो रहा है। इसके लिए विपक्ष ही अधिक जिम्मेदार है। वह संसद को बंधक बनाकर आवश्यक कामों में अड़ंगा लगाने के साथ जिम्मेदार विपक्ष की अपनी भूमिका का एक तरह से जानबूझकर परित्याग भी कर रहा है। ऐसा उसके हंगामा प्रेम के चलते हो रहा है।
इस पर संदेह है कि विपक्ष सचमुच यह जानना चाहता है कि संसद मार्च में हिंसा किन परिस्थितियों में हुई या फिर राम मंदिर में चढ़ावा चोरी किन कारणों से हुई और उनके लिए कौन उत्तरदायी है? वह यह दिखावा करने को तो तत्पर है कि इन मुद्दों पर वह अत्यंत संवेदनशील है, लेकिन जिसे वह अपनी संवेदनशीलता के रूप में प्रचारित करना चाहता है, वह वस्तुतः उसकी सस्ती राजनीति है। सत्तापक्ष को विपक्ष को उसी की शैली में जवाब देने के बजाय इस सस्ती राजनीति का उचित तरीके से प्रतिकार करना सीखना होगा।











