डॉ. विशेष गुप्ता। दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले आंदोलन के बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा होते ही कथित जेन-जी का आंदोलन तो समाप्त हो गया, मगर लोकतांत्रिक प्रतिरोध के प्रतीक स्थल पर देश के प्रधानमंत्री तथा अन्य पदधारक व्यक्तियों के लिए जिस अशोभनीय, अपमानजनक और गाली-प्रधान भाषा का सार्वजनिक प्रयोग हुआ, वह भारतीय समाज की भाषिक संस्कृति और लोकतांत्रिक मर्यादा के तार-तार होने का संकेत भी दे गया।

चिंता यह नहीं है कि गालियां जेन-जी अथवा जेन-एल्फा द्वारा दी गईं। चिंता के मूल में यह है कि क्या सार्वजनिक स्थल पर उठीं गालियां जेन-जी तक में अब प्रतिरोध की नई भाषा बन रही हैं? क्या अपशब्दों को अब साहस, आजादी, क्रांति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नया पर्याय बनाया जा रहा है? इसके दूरगामी परिणामों पर परिवार, समाज और देश को चिंता होना चाहिए।

लोकतंत्र में विरोध केवल अधिकार नहीं है, बल्कि वह सामाजिक चेतना का एक सशक्त माध्यम भी है। हर कालखंड के आंदोलनों की पहचान केवल उनके उद्देश्यों से नहीं, बल्कि उनकी भाषा और अभिव्यक्ति से भी होती रही है। समाजशास्त्र बताता है कि भाषा केवल संवाद का ही माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज के मूल्यों, सत्ता संबंधों और सांस्कृतिक परिवर्तनों का आईना भी होती है।

शब्द केवल विचार ही व्यक्त नहीं करते, वे सामाजिक शक्ति, पहचान और संघर्ष का प्रदर्शन भी करते हैं। इसलिए जब किसी आंदोलन की भाषा बदलती है तो वह केवल शब्दों का ही परिवर्तन नहीं होता, वह सामाजिक संस्कृति में आए परिवर्तनों का संकेत भी होता है। आज की जेन-जी एक ऐसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जो डिजिटल दुनिया में पैदा हुई है।

इंस्टाग्राम, एक्स, यू-ट्यूब पर रील संस्कृति ने इस पीढ़ी से जुड़े संवाद को संक्षिप्त, तीव्र और बिना देरी की प्रतिक्रिया वाला बना दिया है। ध्यान रहे कि डिजिटल एल्गोरिदम सामान्यतया उसी सामग्री को बार-बार दिखाता है, जो चौंकाने के साथ-साथ उत्तेजना अथवा विवाद भी पैदा करता है। यही वजह है कि उसके द्वारा संयमित भाषा की तुलना में आक्रामक एवं बेतुकी भाषा ही अधिक वायरल होती है। अब यह प्रवृत्ति धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन में भी अनुभव की जा रही है।

इतिहास गवाह है कि प्रतिरोध की नैतिक शक्ति उसकी भाषा की गरिमा से कम नहीं होती। महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी, मगर अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया। डा. भीमराव आंबेडकर ने व्यवस्था की कठोरतम आलोचना की, परंतु भाषा की मर्यादा नहीं छोड़ी। डा. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेताओं ने विचारों का तीखा संघर्ष किया, लेकिन संवाद को कभी भी गाली में नहीं बदला। इतिहास यह भी बताता है कि शब्द जब अपनी मर्यादा खो देते हैं तो आंदोलन भी अपनी नैतिक ऊंचाई खो देता है।

विडंबना यह है कि आज भाषा का स्तर सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ राजनीतिक मंचों पर ही नहीं गिर रहा, बल्कि परिवार, विद्यालय, विश्वविद्यालय, मनोरंजन उद्योग एवं इंटरनेट मीडिया और यहां तक कि संसद तक सभी इससे प्रभावित हैं। यदि सार्वजनिक मंचों पर गालियों का प्रवाह बढ़ेगा तो कल वही भाषा शिक्षा के मंदिरों से लेकर घर तक की यात्रा तय करेगी। भाषा का पतन कभी सीमित नहीं रहता, वह सामाजिक संस्कृति का अंग भी बन जाता है।

निःसंदेह भारतीय संविधान ने प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है, पर स्वतंत्रता और उच्छृंखलता में भारी अंतर है। स्वतंत्रता यह अर्थ कतई नहीं कि भाषा की सारी मर्यादाएं तोड़ दी जाएं। यहां अभिव्यक्ति का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण सार्वजनिक संवाद की गरिमा का संरक्षण है। आज सार्वजनिक जीवन के लिए एक साझा भाषाई आचार संहिता विकसित करने की आवश्यकता है।

राजनीतिक दलों को अपने समर्थकों को यह साफ संदेश देना चाहिए कि उनके यहां विचारों का संघर्ष स्वीकार्य है, मगर किसी भी दशा में व्यक्तियों का अपमान स्वीकार्य नहीं है। शिक्षण संस्थानों को भी सार्थक संवाद करने की संस्कृति विकसित करनी होगी। मीडिया को भाषा और संवाद की गुणवत्ता का सजग प्रहरी बनना होगा। साथ ही बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों तथा सांस्कृतिक नेतृत्व को यह संदेश देना चाहिए कि भाषिक संवाद से जुड़ा संयम हमारी कमजोरी का प्रतीक न होकर, हमारी भारतीय सभ्यता की परिपक्वता है।


संविधान केवल शब्दों का पुंज नहीं है। संवाद की संस्कृति इसका आत्मा है। संस्कृति की सबसे पहली अभिव्यक्ति भाषा ही होती है। आंदोलनों या राजनीतिक विमर्श में यदि भाषा की मर्यादा ही समाप्त हो जाएगी तो लोकतंत्र का आत्मा भी धीरे-धीरे क्षीरण होता जाएगा। इतिहास ने सदैव ही यह सिद्ध किया है कि सभ्यताएं तलवार की तुलना में असंयमित शब्दों के प्रयोग से अधिक बिगड़ती रही हैं।

जेन-जी से जुड़ा जंतर-मंतर का आंदोलन अभिभावकों को भी सीख देता है कि वे अपने इन बच्चों को हर वस्तु देकर केवल खुश रखना ही न सिखाएं, बल्कि उनके जीवन को ऐसे तैयार करें, ताकि वे समय रहते असफलता भी सह सकें। आलोचना स्वीकार करने के साथ अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए दूसरों का सम्मान करना भी सीख सकें। शायद तभी यह पीढ़ी ऐसे आंदोलनों में खुद को भाषिक मर्यादा से जुड़ा संयम रखने में सफल हो सकेगी।

(लेखक समाजशास्त्री हैं)