विचार: संसद के सामने नई चुनौती
यह डर विपक्ष को फिर से मानसून सत्र की तरह ही व्यवहार करने को मजबूर कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र की असफलता होगी।
HighLights
मानसून सत्र विपक्ष की अवरोधक रणनीति के कारण बाधित हुआ।
परिसीमन विधेयक का डर कांग्रेस की रणनीति का मुख्य आधार।
सरकार और विपक्ष दोनों संसद चलाने में विफल रहे, लोकतंत्र को नुकसान।
आशुतोष झा। बड़े दिनों बाद विपक्ष और खासकर कांग्रेस को एक सफलता मिलने का अहसास हो रहा है। उसकी जो चाहत थी, वह पूरी हो गई। मानसून सत्र करीब-करीब धुल गया और परिसीमन विधेयक भी नहीं आ पाया। द्रमुक के विपक्षी खेमे से बाहर जाने और कांग्रेस के खिलाफ तीखे तेवर अपनाने, शरद पवार गुट की एनसीपी के बदले सुर, तृणमूल में टूट जैसी कई घटनाओं ने कांग्रेस को आशंकित कर रखा था। ऐसे में छात्र आंदोलन के रूप में उसके हाथ बटेर आ गया।
कुछ सत्तापक्ष की रणनीति भी मात खा गई और विपक्ष की मंशा पूरी हो गई, लेकिन विपक्ष को यह सोचना होगा कि लंबी राजनीति में ऐसे अवरोध की रणनीति बहुत काम नहीं आती। परिसीमन तो संवैधानिक व्यवस्था है और वह होगी ही। वह कांग्रेस नहीं रोक पाएगी और उसमें अभी विपक्षी खेमे में खड़े कई दल भी साथ देंगे। लिहाजा सफलता को स्थायी बनाना है तो शोर-शराबे की राजनीति से आगे जाकर विमर्श की ऐसी राजनीति सीखनी और करनी होगी, जिससे जनता उसके नैरेटिव को समझ सके। विपक्ष ने रणनीति के तहत सत्र को नहीं चलने देने का मन बना लिया था, फिर भी यदि सत्तापक्ष सदन चलाने की सार्थक पहल करता तो विमर्श में शायद आगे दिखता। जिस तरह पूरा सत्र हठधर्मिता के कारण बाधित हुआ, वह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। विपक्ष अगर सार्थक मुद्दों पर सकारात्मक जीत हासिल करे तभी लोकतंत्र की सफलता है।
वैसे तो 2014 के बाद से कई बार और 2024 के बाद से अधिकतर यही देखा गया है कि संसद सत्र से ठीक पहले कुछ ऐसे मुद्दे उभरते हैं, जिन्हें विपक्ष लपक लेता है। जंतर-मंतर पर सीजेपी का आंदोलन ऐसा ही एक मुद्दा था। इससे पहले उस भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर किसान आंदोलन खड़ा करने की तैयारी थी, जो वस्तुतः अभी फाइनल ही नहीं हुआ है। ऐसे आंदोलनों के पीछे कौन सी ताकत काम करती है, यह समझा जा सकता है। मानसून सत्र की शुरुआत में भी जब अवरोध उत्पन्न हुआ तो किसी को हैरत नहीं हुई, क्योंकि पहला हफ्ता शोर-शराबे में ही जाने की एक परंपरा सी बन गई है, लेकिन यह सत्र थोड़ा अलग रहा। विपक्ष ने इसका चलना अपने लिए अस्तित्व की लड़ाई बना लिया और डर था पसिसीमन विधेयक का। सरकार की ओर से संकेत था कि संविधान संशोधन के लिए जरूरी नंबर से कुछ अधिक उसके पास हैं। इसके चलते अलग-अलग मुद्दों को तूल देकर सत्र ही नहीं चलने दिया गया। बार-बार मुद्दे बदले गए, पर ध्येय एक था-संसद रोको। न रहे बांस, न बजे बासुंरी।
कांग्रेस को पता है कि परिसीमन तो होगा, लेकिन अभी रोक लिया तो 2029 के चुनाव तक एक बाजी और लगाने का बल बचा रहेगा। अगर लोकसभा सदस्यों की संख्या 543 से बढ़कर 816 हो गई तो बचे हुए दो-ढाई साल में ज्यादा मशक्कत न हो पाएगी। सीटों का बदला हुआ स्वरूप अलग रंग दिखाएगा और 2029 गंवाने का अर्थ है 20 साल सत्ता से बाहर रहना, जो जाहिर तौर पर कांग्रेस और उसके कई नेताओं के लिए अस्तित्व बचाने की बात होगी, लेकिन क्या कांग्रेस को इसकी याद दिलानी होगी कि देश के बहुत बड़े हिस्से से वह 30-40 वर्षों से भी ज्यादा वक्त से सत्ता से बाहर है। अगर संविधान के अनुच्छेद 81 और 170 के तहत 2027 की जनगणना के आधार पर परिसीमन पर हुआ तो कांग्रेस के सामने संकट होगा। कांग्रेस फिलहाल हिमाचल के साथ दक्षिण के तीन राज्यों में सत्ता में है। क्या तब कांग्रेस संविधान को चुनौती देगी, क्योंकि वैसी स्थिति में तो सपा भी परिसीमन के समर्थन में खड़ी होगी और राजद एवं उत्तर भारत के अन्य दल भी। कांग्रेस को यह समझना होगा कि अकेला परिसीमन चुनावी जीत-हार का कारण नहीं हो सकता। विजय के लिए परिश्रम और धैर्य की जरूरत होती है और वर्तमान कांग्रेस में यह गुण थोड़ा कम ही है।
मानसून सत्र जिस तरह गुजरा, उसका पूरा दोष विपक्ष पर ही नहीं डाला जा सकता। सरकार से भी चूक हुई और वह उसे समय रहते ठीक भी नहीं कर सकी। छात्र आंदोलन का मुद्दा वाजिब था। सरकार इसका आकलन नहीं कर पाई कि इतनी बड़ी संख्या में लोग जंतर-मंतर पर पहुंचेगे। इस समझने में भी देर हुई कि इस आंदोलन का विपक्षी दलों ने साथ दिया। यही कारण है कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद आंदोलन तो खत्म हो गया, लेकिन विवाद नहीं थमा। छात्र तो झारखंड में भी उद्वेलित हैं। वहां आंदोलन का स्वरूप वैसा नहीं रहा, जैसा दिल्ली के जंतर-मंतर पर था। जंतर-मंतर जैसी हिंसा रांची में नहीं हुई। सत्तापक्ष को समय रहते हुए दिल्ली में उन राजनीतिक ताकतों को बेनकाब करना चाहिए था, लेकिन उससे चूक हो गई। संसद में तीन हफ्ते तक विपक्ष मुद्दे बदल-बदल कर शोर करता रहा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सदन में आकर जवाब देने की पेशकश की, लेकिन कुछ नहीं बदला। यदि सरकार प्रस्ताव देने के बजाय चर्चा की शुरुआत करा देती तो शायद विपक्ष भी हारकर चर्चा में हिस्सा लेने को मजबूर होता या बेनकाब हो जाता। विपक्ष अपने हठ पर अड़ा रहा और सरकार की ओर से इसे तोड़ने की बहुत कोशिश नहीं हुई।
बात सिर्फ इस मानसून सत्र की दशा से चिंतित होने की नहीं है। संसद का चलना सिर्फ सरकार और विपक्ष के हित-अहित की बात नहीं है। यह जनता के हित की बात है, क्योंकि इस शोर में भी कई विधेयक बिना चर्चा के पारित हुए। सरकार चाहती तो विदेशी चंदे से जुड़े एफसीआरए को भी इसी तरह पारित करा सकती थी, लेकिन व्यापक विचार-विमर्श के लिए संयुक्त समिति को भेज दिया गया। चिंता की बात यह है कि जनता के मन में उठ रहे सवाल संसद में पूछे ही नहीं जा रहे।
परिसीमन का भूत पूरी तरह नहीं भागा है। यह अटकल है कि तेजी से बदलते तकनीक के युग में जब एसआइआर का काम लगभग पूरा हो चुका है और जनगणना का मोटा स्वरूप आंका जा सकता है तो भावी परिसीमन से जुड़ा काफी काम कम समय में किया जा सकता है। जो काम सामान्यत: ढाई से तीन वर्ष का होता है, वह डेढ़ साल में भी हो सकता है तो सरकार शीतकालीन सत्र तक भी एक बार फिर से बिसात बिछा सकती है। यह डर विपक्ष को फिर से मानसून सत्र की तरह ही व्यवहार करने को मजबूर कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह लोकतंत्र की असफलता होगी।
(लेखक दैनिक जागरण के राजनीतिक संपादक हैं)
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