विचार: राहत से आगे की चुनौती
ऐसे में अर्थव्यवस्था की गति बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि निजी निवेश और नई नौकरियां विकास के इंजन बनें। भारत ने साबित किया कि वह वैश्विक संकट के बीच भी अपनी विकास दर को तेज बनाए रख सकता है, लेकिन असली कसौटी इस संकट के छंटने के बाद भी इस रफ्तार को बरकरार रखने की है।
HighLights
वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद भारत की 7.8% जीडीपी वृद्धि।
उपभोक्ता खर्च, निवेश और निर्यात ने विकास को गति दी।
कच्चे तेल, मानसून, टैरिफ, रोजगार प्रमुख आगामी चुनौतियां।
आदित्य सिन्हा। पूरी दुनिया पिछले कुछ समय से भारी अनिश्चितता एवं अस्थिरता से जूझ रही है। इस साल ये परिस्थितियां और विकराल हो गईं। पश्चिम एशिया में एक नए युद्ध की चिंगारी भड़क गई। होर्मुज जलमार्ग से तेल एवं गैस की आपूर्ति करने वाले जहाजों की आवाजाही थम गई थी। रुपया भी हिचकोले खाकर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ रही-सही कसर पूरी कर रहे थे। अप्रैल से जून तक के इस पूरे परिदृश्य पर गौर करें तो यह ऐसी पृष्ठभूमि थी, जिसने मानो भारत की विकास की गति के पहिए थामने की जमीन तैयार कर दी थी।
इन प्रतिकूल परिस्थितियों को धता बताते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था अप्रैल से जून के बीच 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करने में सफल रही। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान 7 सात प्रतिशत था। इसी अवधि में अमेरिकी अर्थव्यवस्था 1.5 प्रतिशत और ब्रिटिश आर्थिकी 0.4 प्रतिशत की वृद्धि ही दर्ज कर पाई। चीनी अर्थव्यवस्था में भी 4.3 प्रतिशत की तेजी आई। इस दौरान भारत ने न केवल विश्व की सबसे तेजी से वृद्धि करती हुई बड़ी अर्थव्यवस्था का अपना तमगा कायम रखा, बल्कि वैश्विक झंझावातों के बीच भी अपनी भरपूर दृढ़ता दिखाई। मानसून की बेरुखी और देरी के बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र ने अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन किया।
इन चमचमाते आंकड़ों के पीछे तीन बुनियादी कारक हैं, जिनका सरोकार जमीनी पहलुओं से है। सबसे पहला है आम लोगों द्वारा जारी खरीद का सिलसिला। दूसरा, नए संयंत्रों, मशीनरी और बुनियादी ढांचे में भारी निवेश। तीसरा, टैरिफ की चुनौतियों के बाद भी निर्यात में 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी। सूचीबद्ध कंपनियों के लाभ में 20 प्रतिशत का उछाल और बैंक कर्ज में 19 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। यह सब अकस्मात नहीं है। सरकार और रिजर्व बैंक के समवेत प्रयास अब असर दिखा रहे हैं। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही थीं तो पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों में एकाएक बढ़ोतरी नहीं की गई। पेट्रोल और डीजल की कीमतें एक दायरे में ही रहीं। इस मोर्चे पर होने वाले घाटे को खुद सरकार ने वहन किया, ताकि आम लोगों की आवाजाही और ढुलाई के लिए ट्रकों की लागत न बढ़े। यह भी एक कारण है कि तेल की कीमतों में 58 प्रतिशत की बढ़ोतरी के बावजूद जुलाई में मुद्रास्फीति की दर 4.45 प्रतिशत के स्तर पर रही।
इससे पहले गत वर्ष के बजट में इनकम टैक्स में दी गई राहत और जीएसटी परिषद द्वारा दैनिक उपभोग की तमाम वस्तुओं पर करों की दरों में कटौती ने लोगों के हाथों में खर्च के लिए अतिरिक्त राशि बढ़ाई। हाईवे, रेलवे और बिजली ग्रिड पर हुए सरकारी निवेश ने वह जमीन तैयार कर दी, जिस पर आज निजी कंपनियां डाटा सेंटर, पावर प्लांट और नई फैक्ट्रियां खड़ी कर रही हैं। केंद्र सरकार का पूंजीगत खर्च भी इस तिमाही में 24 प्रतिशत की तेजी से बढ़ा। आरबीआइ ने भी मोर्चे पर डटकर जिम्मेदारी बखूबी निभाई। विदेशी पूंजी के पलायन और रुपये के लुढ़कने के बीच रिजर्व बैंक ने अनिवासी भारतीयों से डालर जुटाने के लिए विशेष डिपाजिट स्कीम पेश की। तीन महीनों में 65 अरब डालर से अधिक के प्रवाह ने रुपये की गिरावट की रफ्तार को थामा। खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकारी भंडारों में आवश्यकता से पांच गुना अधिक चावल और दोगुने गेहूं का दोगुना बफर रहा, जिसके चलते बारिश की सुस्ती के बावजूद खाद्यान्न कीमतें बेकाबू नहीं हुईं।
किसी भी संकट के समय एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था इसी तरह काम करती है। हालांकि आगे की राह उतनी भी आसान नहीं है। अगर भारत को आर्थिक परिदृश्य पर अपना शानदार प्रदर्शन इसी तरह जारी रखना है तो उसे चार पहलुओं पर ध्यान देना होगा। पहला जोखिम जुड़ा है कच्चे तेल की कीमतों से, जो अब भी 90 डालर प्रति बैरल के आसपास है और उसकी दरों में तुरंत राहत के आसार भी नहीं दिखते। घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखने की मियाद जितनी खिंचेगी, वित्तीय घाटा उतना ही बढ़ेगा। इस बढ़े हुए खर्च की भरपाई के दो ही रास्ते हैं। पहला कच्चे तेल में नरमी आते ही खुदरा दाम धीरे-धीरे बढ़ाए जाएं या फिर विकास कार्यों के बजट में कुछ कटौती की जाए।
दूसरी बड़ी चुनौती मानसून की अनिश्चितता से जुड़ी है। जुलाई में अच्छी बारिश से फसलों का रकबा सामान्य की तुलना में 92 प्रतिशत तक तो पहुंच गया, लेकिन सितंबर में सूखे जैसे हालात की आशंका है। पर्याप्त बफर स्टाक की वजह से गेहूं और चावल का मामला तो सुलझा हुआ लगता है, लेकिन दलहन, तिलहन, फल-सब्जियों और पोल्ट्री उत्पादों के लिए ऐसा कोई सुरक्षा आवरण नहीं दिखता। यदि खाद्य पदार्थों की महंगाई ने तेजी का रुझान कायम रखा तो आरबीआइ को ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ेगी। इसका सीधा असर आम आदमी के लिए ईएमआइ के बढ़ते बोझ के रूप में दिखेगा। तीसरी चुनौती रुपये की सेहत और अमेरिकी आयात शुल्कों की है। अमेरिका ने जुलाई से जो 10 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगाया है, उससे मोबाइल, फार्मा और रिफाइंड तेल जैसे उत्पाद तो बच गए, लेकिन परिधान, चमड़ा और रत्न एवं आभूषण निर्यातकों के आर्डर घटने लगे हैं। ये उद्योग बड़े पैमाने पर रोजगार मुहैया कराते हैं। इन्हें सुरक्षा चक्र प्रदान करने के लिए न केवल सरकार को सस्ता निर्यात कर्ज उपलब्ध कराना होगा, बल्कि ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों के साथ व्यापार समझौतों को जल्द मूर्त रूप भी देना होगा।
चौथा पहलू आजीविका और रोजगार का है। 7.8 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि से रोजगार के अवसर बढ़ने चाहिए थे, मगर जून तिमाही में बेरोजगारी का आंकड़ा थोड़ा ऊपर गया। निजी क्षेत्र के निवेश में तेजी जरूर आई है, लेकिन यह नई भर्तियों में रूपांतरित होती नहीं दिख रही। पिछले बजट में टैक्स छूट से उपभोग को मिली तात्कालिक ऊर्जा साल के आखिर तक पस्त पड़ सकती है। ऐसे में अर्थव्यवस्था की गति बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि निजी निवेश और नई नौकरियां विकास के इंजन बनें। भारत ने साबित किया कि वह वैश्विक संकट के बीच भी अपनी विकास दर को तेज बनाए रख सकता है, लेकिन असली कसौटी इस संकट के छंटने के बाद भी इस रफ्तार को बरकरार रखने की है।
(लेखक लोक-नीति विश्लेषक हैं)












