देश की राजधानी के सत्य निकेतन क्षेत्र में जिस तरह एक बहुमंजिला इमारत ढह गई, उसने उस तंत्र की पोल फिर से खोल दी, जो न तो जर्जर भवनों की निगरानी कर पा रहा है और न ही ऐसे भवनों में होने वाले निर्माण को रोक पा रहा है। सत्य निकेतन इलाके में जो जर्जर बहुमंजिला भवन गिरा, उसके बेसमेंट में काम चल रहा था। इसका अर्थ है कि कोई यह देखने वाला नहीं था कि बरसात के इस मौसम में एक जर्जर इमारत में निर्माण जोखिम भरा हो सकता है।

चूंकि इस भवन के पिलर के साथ नींव भी कमजोर थी, इसलिए वह नाजुक स्थिति में था। बरसात ने स्थिति और नाजुक कर दी। दिल्ली में ऐसे भवनों की कमी नहीं, जो जर्जर हालत में हैं और जिनमें नियमों के विरुद्ध काम भी होता रहता है। कुछ ही महीने पहले साकेत मेट्रो स्टेशन के निकट एक पांच मंजिला अवैध इमारत उस समय गिर गई थी, जब उसमें निर्माण हो रहा था। इसमें छह छात्रों की जान गई थी। सत्य निकेतन इलाके में गिरी इमारत में भी जनहानि हुई है। दुर्योग से यहां भी मरने और घायल होने वाले छात्र ही हैं, जो पेइंग गेस्ट के रूप में रह रहे थे।

दिल्ली में एक और जर्जर भवन गिरने के बाद शोक संवेदनाओं के साथ दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की बातें खूब सुनाई दे रही हैं। दिल्ली सरकार के मत्रियों के साथ नगर निगम के अधिकारी दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की बातें कर रहे हैं, लेकिन इस तरह के हादसों के बाद सदैव ही ऐसा सुनने को मिलता है और फिर पता चलता है कि एक और हादसा हो गया। दिल्ली में जर्जर भवन इसके बाद भी गिरते हैं कि नगर निगम समय-समय पर और खास तौर पर बरसात के पहले ऐसे भवनों का सर्वेक्षण करता है। कोई भी समझ सकता है कि ऐसे सर्वेक्षण महज खानापूरी होते हैं।

जर्जर भवनों के खड़े रहने या उनमें नया निर्माण कार्य होने देने के लिए जितना दोष शासन-प्रशासन का है, उतना ही लालची भवन स्वामियों का। भवन स्वामी नियमों के विरुद्ध जाकर निर्माण करने में इसलिए समर्थ रहते हैं, क्योंकि शासन इसके विरुद्ध सख्त नहीं और प्रशासन में भ्रष्ट तत्वों का बोलबाला है। आम तौर पर ये तत्व कुछ ले-देकर न केवल हर तरह का निर्माण होने देते हैं, बल्कि गिराए जा सकने वाले जर्जर भवनों की अनदेखी भी कर देते हैं। इसका नतीजा भवनों के ढहने और लोगों की मौतों के रूप में सामने आता है।

मानकों के खिलाफ और घटिया निर्माण दिल्ली ही नहीं, सारे देश की समस्या है। यह विचित्र है कि देश में अंग्रेजों और उसके पहले के भी शासकों की ओर से बनवाए गए भवन सही-सलामत हैं, लेकिन 30-40 वर्ष पुरानी इमारतें ढह जा रही हैं। यह शर्मनाक है कि जब समय के साथ भवनों का कहीं अधिक टिकाऊ और मजबूत निर्माण सुनिश्चित किया जाना चाहिए, तब उलटी गंगा बह रही है।