प्रणय कुमार। नवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास जैसे मुद्दों पर पश्चिमी जगत लंबे समय से स्वयं को वैश्विक नैतिकता का पहरेदार प्रस्तुत करता आया है, किंतु जब इन्हीं आदर्शों को वास्तविक आचरण की कसौटी पर परखा जाता है, तो कथित नैतिक श्रेष्ठता के पीछे छिपे उसके दोहरे मापदंड बार-बार उजागर होते हैं। यह विरोधाभास अब केवल उसकी विदेश नीति तक सीमित नहीं रहा। पश्चिमी समाजों में वाम-उदारवादी विचारधारा और कट्टरपंथी राजनीति के बीच बढ़ता वैचारिक सामंजस्य स्वतंत्रता, बहुलता, पंथनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे मूल्यों की व्याख्या को भी प्रभावित करता दिखाई दे रहा है। जिस अमेरिका ने दशकों तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपने लोकतंत्र का आत्मा और असहमति के अधिकार को अपनी सभ्यतागत पहचान बताने का दावा किया, उसी अमेरिका में अब किसी विचार, संगठन अथवा व्यक्ति की स्वीकार्यता कई बार इससे तय होती दिखाई देती है कि वह उसके प्रचलित वैचारिक आख्यान के अनुकूल है या प्रतिकूल?

न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन पर गत 29 अगस्त को आयोजित ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ इसी बदलते विमर्श का उल्लेखनीय उदाहरण रहा। विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों के बीच संवाद, सह-अस्तित्व और एकता का संदेश देने के उद्देश्य से आयोजित इस कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत का संबोधन हुआ। आयोजन ‘अमेरिकन हिंदूज फार एंगेजमेंट एंड डायलाग’ द्वारा किया गया। इसे विभिन्न हिंदू-अमेरिकी संगठनों का समर्थन प्राप्त था। अमेरिका के अनेक शहरों तथा 31 देशों से आए लगभग 6,000 प्रतिनिधियों और 250 से अधिक हिंदू-अमेरिकी संगठनों की सहभागिता ने इसकी व्यापकता को रेखांकित किया। इसके बावजूद न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी ने कार्यक्रम के प्रति सार्वजनिक असहमति जताई और कार्यक्रम रद करने की मांग की। कार्यक्रम अंततः संपन्न हुआ और अपने घोषित उद्देश्य में सफल रहा, लेकिन इससे एक मूलभूत लोकतांत्रिक प्रश्न उठा कि क्या किसी वक्ता को सुने बिना ही उसके विचारों और संगठन को अस्वीकार्य घोषित कर देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुलतावाद की कथित अमेरिकी परंपरा के अनुरूप है?

इस विरोध में ‘हिंदूज फार ह्यूमन राइट्स’ भी सक्रिय था। आश्चर्य है कि जिस संगठन के नाम के साथ 'हिंदूज' जुड़ा है, वह भारत, हिंदुत्व और संघ से जुड़े मुद्दों पर विरोधी अभियान चलाता है। प्रतीत होता है कि संगठन का नाम भी सोच-समझकर रखा गया है, ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि संघ-भाजपा का विरोध हिंदू समाज के भीतर से ही हो रहा है। इसकी कार्यकारी निदेशक सुनीता विश्वनाथ नागरिकता संशोधन कानून और ‘हाऊडी मोदी’ के विरोध में भी शामिल रहीं तथा ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ जैसे अभियानों में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। 2023 में वाशिंगटन में राहुल गांधी के थिंक-टैंक संवाद में भी उनकी उपस्थिति देखी गई थी। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि संघ-प्रमुख के कार्यक्रम के विरुद्ध वे क्यों खड़ी थीं?

न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी प्रधानमंत्री मोदी तथा इजरायल से जुड़े प्रश्नों पर मुखर राजनीतिक रुख अपनाते रहे हैं। 2023 में प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान उनके विरोध में संयुक्त बयान, नागरिकता संशोधन कानून और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध, उमर खालिद के समर्थन में आवाज तथा हमास को आतंकवादी संगठन मानने एवं ‘ग्लोबलाइज द इंतिफादा’ जैसे नारों की निंदा से इन्कार उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को समझने के लिए पर्याप्त हैं। यह पूछना असंगत नहीं होगा कि उनकी बुनियादी आस्था अमेरिका की लोकतांत्रिक मान्यताओं में है या किसी मज़हब-विशेष की मान्यताओं में? विरोध के इसी क्रम में 26 अगस्त को अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग के पाकिस्तानी मूल के अध्यक्ष आसिफ महमूद द्वारा मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा का विरोध किया गया। भारत पर आयोग के पूर्ववर्ती वक्तव्यों में भी सीएए, एनआरसी, जम्मू-कश्मीर, उमर खालिद और शरजील इमाम को धार्मिक स्वतंत्रता के विमर्श से जोड़ा जाता रहा है। विरोध की इस पूरी शृंखला को अलग-अलग घटनाओं का संयोग मानना वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा।

न्यूयार्क की स्थानीय राजनीति, एक्टिविस्ट संगठनों, भारत विरोधी अभियानों और धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर सक्रिय संस्थाओं के बीच एक ऐसा वैचारिक इकोसिस्टम दिखाई देता है, जिसमें एक मंच का आरोप दूसरे मंच का प्रमाण बन जाता है। फिर वही आरोप तीसरे मंच से वैधता पाता है और अंततः एक सुनियोजित नैरेटिव को स्थापित सत्य की तरह प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन इन समस्त विरोधों के बीच प्रश्न यह है कि मोहन भागवत ने न्यूयार्क में क्या कहा? उन्होंने स्पष्ट किया कि एकता के लिए एकरूपता आवश्यक नहीं है। मनुष्य की श्रेष्ठता दूसरों पर प्रभुत्व में नहीं, बल्कि विश्व के प्रति अपने दायित्व को समझने में है। उनका यह संदेश भारत की उस सनातन सभ्यतागत दृष्टि का वैश्विक प्रतिपादन है, जिसका सार 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना में निहित है।

(लेखक शिक्षाविद् एवं सामाजिक संस्था 'शिक्षा-सोपान' के संस्थापक हैं)