विचार: भारत की विधि संहिता नहीं है मनुस्मृति
देश को इतिहासबोध, आत्मसमीक्षा और संविधान में अटूट निष्ठा की आवश्यकता है। सभ्यतागत आत्मविश्वास अतीत पर शर्मिंदा होने में नहीं, बल्कि उसे समझकर आगे बढ़ने में है।
HighLights
मनुस्मृति वर्तमान भारत की विधि संहिता नहीं, केवल ऐतिहासिक ग्रंथ।
नागरिकों के अधिकार संविधान से तय होते हैं, न कि प्राचीन ग्रंथों से।
अतीत को समझकर आत्मसमीक्षा के साथ वर्तमान को बदलना आवश्यक है।
डॉ. रामानंद शर्मा। पुणे के एक कार्यक्रम में राहुल गांधी ने मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए स्त्री की पारिवारिक भूमिका से जुड़े एक विधान को स्त्री विरोधी बताया। इसे पितृसत्तात्मक सोच का प्रतीक बताते हुए उन्होंने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर निशाना साधा। मनुस्मृति का ऐतिहासिक महत्व अपनी जगह है, लेकिन वर्तमान कानूनी व्यवस्था में इसकी कोई भूमिका नहीं है। यह भारतीय सामाजिक इतिहास का एक ग्रंथ मात्र है। आज यह भारत की विधि संहिता नहीं है। देश में नागरिकों के अधिकार संविधान से तय होते हैं। शासन व्यवस्था संसद और न्यायपालिका से चलती है। आज की स्त्री की स्थिति के लिए सीधे मनुस्मृति को जिम्मेदार बताना इतिहास की बेहद सतही समझ है। किसी धर्मशास्त्र को आधुनिक संसद से पास कानून मान लेना ऐतिहासिक भूल है।
वर्ष 1794 में सर विलियम जोंस ने मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद किया। औपनिवेशिक सत्ता ने इसे हिंदू कानून समझने का मुख्य जरिया बनाया। अंग्रेजों ने स्थानीय परंपराओं और देशाचार की जगह ग्रंथ केंद्रित व्यवस्था को बढ़ावा दिया। इसलिए औपनिवेशिक व्याख्या और प्राचीन सामाजिक संदर्भ को अलग करके देखना होगा। मनुस्मृति की चर्चा में उसके पाठ के इतिहास को समझना आवश्यक है। इसकी पांडुलिपियों में पाठ परिवर्तन और प्रक्षिप्त अंशों पर विद्वानों में सदा मतभेद रहा है। किसी एक विवादित श्लोक को अंतिम विधान मान लेना अध्ययन की जल्दबाजी है। असुविधाजनक प्रविधानों को केवल क्षेपक यानी बाद में कुछ जोड़ा हुआ कहकर खारिज करना भी गलत होगा।
इतिहासकार का काम अपनी पसंद से पाठ चुनना नहीं है। उसका दायित्व पाठ को उसके काल और संदर्भ में देखना है। भारतीय समाज का इतिहास केवल ग्रंथों से नहीं बना। ग्रंथों के साथ लोकाचार और क्षेत्रीय परंपराएं भी चलती रहीं। किसी ग्रंथ का लिखा विधान और समाज का व्यवहार हमेशा एकसमान नहीं होता। मनुस्मृति में यदि स्त्री की स्वतंत्रता पर सीमाएं हैं तो स्त्रीधन और पारिवारिक अधिकार भी दर्ज हैं। इसका मूल्यांकन एकरंगी नहीं हो सकता। इसे न तो आधुनिक अधिकारों का घोषणापत्र माना जा सकता है और न केवल उत्पीड़न का दस्तावेज।
भारतीय सभ्यता का अनुभव अत्यंत व्यापक है। ऋग्वेद में लोपामुद्रा, घोषा और अपाला जैसी ऋषिकाओं के सूक्त मिलते हैं। उपनिषद में गार्गी और मैत्रेयी के दार्शनिक प्रश्न दर्ज हैं। याज्ञवल्क्य से गार्गी का शास्त्रार्थ हमारी बौद्धिक चेतना का प्रमाण है। मनुस्मृति के किसी एक विधान से पूरी सभ्यता को परिभाषित नहीं किया जा सकता। प्राचीन विधान को सीधे आज की राजनीति से जोड़ना तार्किक नहीं है। वर्तमान सरकार की आलोचना उसकी नीतियों, निर्णयों और कार्यों के आधार पर होनी चाहिए। किसी प्राचीन ग्रंथ को आज की सरकारी नीतियों का आधार सिद्ध करने के लिए ठोस प्रमाण चाहिए। केवल राजनीतिक आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है।
राहुल गांधी चुनाव के समय मंदिरों और धार्मिक प्रतीकों के प्रति सहज दिखते हैं। चुनावी राजनीति से बाहर निकलते ही परंपरा पर तीखे हमले होने लगते हैं। आस्था राजनीतिक मौसम के हिसाब से बदलने वाली वस्तु नहीं हो सकती। स्त्री की गरिमा और स्वतंत्रता किसी एक धर्म-संप्रदाय का विषय नहीं है। यह सार्वभौमिक संवैधानिक मूल्य है। इसी कसौटी की परीक्षा तीन तलाक के प्रश्न पर भी हुई। 2019 में तीन तलाक को दंडनीय बनाने वाले कानून का कांग्रेस ने विरोध किया था। यदि स्त्री की गरिमा और स्वतंत्रता सार्वभौमिक मूल्य हैं, तो उनकी रक्षा की कसौटी भी सार्वभौमिक होनी चाहिए। किसी प्रथा की आलोचना केवल इसलिए मुखर हो कि वह हिंदू परंपरा से जुड़ी है और दूसरी जगह वही मुखरता कमजोर पड़ जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। संवैधानिकता का अर्थ सुविधा के अनुसार मानक बदलना नहीं है।
स्त्री सशक्तीकरण की असली परीक्षा आज की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी में है। 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी दिशा में बड़ा कदम है। राष्ट्रपति पद पर द्रौपदी मुर्मु से लेकर सेना, न्यायपालिका और अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भूमिका बदलते भारत का चित्र प्रस्तुत करती है। यह भारत अपने अतीत से संवाद करता है, लेकिन उसका बंधक नहीं बनता। स्त्री के प्रश्न को केवल मनुस्मृति तक सीमित करना समस्या को छोटा करना है। आज शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल मुख्य हैं। राजनीतिक दलों को इन पर ठोस नीतियां देनी चाहिए। अतीत की निंदा आसान है।
वर्तमान को बदलना कठिन उत्तरदायित्व है। हिंदू समाज में सुधार की आवश्यकता स्वीकार करना और पूरी परंपरा को कठघरे में खड़ा करना दो अलग बातें हैं। भारतीय समाज ने अपने भीतर से राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और स्वामी विवेकानंद जैसे सुधारकों को जन्म दिया। परंपरा की शक्ति आत्मसमीक्षा में होती है। सुधार परंपरा के विरोध से नहीं, बल्कि उसके भीतर से संभव होता है। मनुस्मृति पर बहस को दो अतिवादों से बचाना होगा। न तो इसका अंध समर्थन उचित है और न ही एक श्लोक के आधार पर पूरी सभ्यता को दोषी ठहराना सही है। सभ्यता को उसकी उपलब्धियों और सीमाओं दोनों के साथ पढ़ना होगा।
राहुल गांधी को स्पष्ट करना होगा कि वे भारतीय सभ्यता को किस दृष्टि से देखते हैं। उन्हें हिंदू परंपरा में केवल रूढ़ियां दिखती हैं या उसकी आत्मसुधार की क्षमता भी नजर आती है? संविधान और सांस्कृतिक परंपरा के संबंध को वे किस रूप में समझते हैं? इन प्रश्नों के उत्तर किसी नारे से नहीं मिलेंगे। इनके लिए स्पष्ट वैचारिक दर्शन चाहिए। सुधार की बात हो तो समान कसौटी के साथ हो। राजनीति हो तो स्पष्ट विचार के साथ हो। यह बहस मनुस्मृति से बहुत आगे की है। यह तय करेगी कि हम अपने इतिहास को कैसे पढ़ते हैं और वर्तमान को किस विवेक से बदलते हैं। भारत को न तो अतीत का अंध गौरव चाहिए और न ही अतीत से अपराध बोध। देश को इतिहासबोध, आत्मसमीक्षा और संविधान में अटूट निष्ठा की आवश्यकता है। सभ्यतागत आत्मविश्वास अतीत पर शर्मिंदा होने में नहीं, बल्कि उसे समझकर आगे बढ़ने में है।
(लेखक दिल्ली विवि के आर्यभट्ट कालेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)












