विचार: प्रमाणित होती अर्थव्यवस्था की मजबूती
विकसित देशों में भी डबल डिफ्लेशन पद्धति अपनाने पर इस तरह के परिणाम सामने आए हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी तैयार उत्पादों की कीमतों की तुलना में अधिक रही।
HighLights
वाणिज्यिक वाहन बिक्री और पूंजीगत उत्पादन में मजबूत वृद्धि।
जीडीपी डिफ्लेटर और डबल डिफ्लेशन पद्धति की व्याख्या।
मजबूत निवेश, खपत और ऋण से टिकाऊ विस्तार।
एस. महेंद्र देव और सौरभ गर्ग। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 31 अगस्त को पहली तिमाही के वृद्धि दर के आंकड़े सामने आने के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर काफी चर्चा हो रही है। अकादमिक जगत के एक वर्ग ने इन आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि राष्ट्रीय आय और जीडीपी की गणना की पद्धति में कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिनकी वजह से इन आंकड़ों की विश्वसनीयता पर संदेह होता है। इसकी पड़ताल आवश्यक है।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में दर्ज 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि के पीछे कई महत्वपूर्ण और निरंतर उपलब्ध आर्थिक संकेतकों का मजबूत आधार है। ये संकेतक अर्थव्यवस्था के विस्तार की मजबूती को प्रमाणित करते हैं। जैसे वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में 18.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह माल ढुलाई और कारोबारी मांग में मजबूती का संकेत देती है। कंपनियां भविष्य में मांग बढ़ने की उम्मीद में वाहनों के बेड़े का विस्तार कर रही हैं। निवेश के मोर्चे पर भी काफी मजबूती दिखाई दे रही है। पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में 15.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि मशीनरी और उपकरणों के आयात में 51.5 प्रतिशत की तेज बढ़ोतरी हुई।
सीमेंट उत्पादन, तैयार स्टील की खपत और बुनियादी ढांचे तथा निर्माण से जुड़ी वस्तुओं के उत्पादन में भी मजबूत वृद्धि हुई। ई-वे बिल बनने की संख्या में भी दोहरे अंकों में वृद्धि जारी रही। जीएसटी की दरों में बड़े स्तर पर बदलाव और युक्तिसंगत बनाने के बाद सकल जीएसटी संग्रह में 8.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इन सभी संकेतकों को एक साथ देखने से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था की वास्तविक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं और आर्थिक वृद्धि का आधार काफी व्यापक है। पहली तिमाही में वाहनों की जोरदार बिक्री से संकेत मिलता है कि अपनी पसंद और आवश्यकता पर खर्च करने को लेकर लोगों की क्षमता बढ़ी है, जिसने मांग को मजबूती प्रदान की है। कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र, तीनों में बैंक ऋण की व्यापक वृद्धि हुई है। मजबूत निवेश, स्थिर खपत, माल ढुलाई में तेजी और बैंक ऋण के विस्तार का एक साथ होना इसका संकेत है कि अर्थव्यवस्था का यह विस्तार टिकाऊ है।
वृद्धि को लेकर संदेह का एक पहलू मौजूदा कीमतों और स्थिर कीमतों पर जीडीपी के बीच कीमतों में किए जाने वाले समायोजन यानी जीडीपी डिफ्लेशन को लेकर है। यह चिंता तब भी बनी हुई है, जबकि आधार वर्ष में बदलाव के दौरान गणना की पद्धति में काफी सुधार किए गए हैं। पहली तिमाही के नतीजे आने के बाद जीडीपी डिफ्लेटर को लेकर जो सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी सवाल उठाया गया है, वह भी इसी मुद्दे से जुड़ा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जाने वाली बेहतर पद्धतियों के अनुरूप संशोधित राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में कीमतों के समायोजन के लिए अब थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआइ की जगह नए उत्पादक मूल्य सूचकांक यानी पीपीआइ का उपयोग किया गया है। हालांकि, डिफ्लेशन की पद्धति और कीमतों से जुड़े आंकड़ों के स्रोत दोनों में एक साथ बदलाव किए जाने के कारण हाल में जीडीपी डिफ्लेटर में आए बदलावों को समझना कुछ मुश्किल हो गया है। पहली तिमाही के आंकड़े जारी होने के बाद हुई चर्चाओं में भी यह बात सामने आई है।
हमने विनिर्माण क्षेत्र में ‘डबल डिफ्लेशन’ पद्धति अपनाई है। इसमें उत्पादन और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं (मध्यवर्ती खपत) की कीमतों में बदलाव को अलग-अलग समायोजित किया जाता है। इसके बाद दोनों के वास्तविक मूल्यों के अंतर से वास्तविक सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) निकाला जाता है। राष्ट्रीय आय की गणना में यह दुनिया भर में अपनाई जाने वाली सबसे बेहतर पद्धति मानी जाती है। जब उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतें तैयार उत्पादों की कीमतों से ज्यादा तेजी से बढ़ती हैं, तो मौजूदा कीमतों पर जीवीए की वृद्धि वास्तविक जीवीए की वृद्धि से कम हो सकती है। जब उत्पादन और कच्चे माल, दोनों की कीमतें बढ़ रही हों, तब भी जीवीए का निहित डिफ्लेटर नकारात्मक हो सकता है।
विकसित देशों में भी डबल डिफ्लेशन पद्धति अपनाने पर इस तरह के परिणाम सामने आए हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी तैयार उत्पादों की कीमतों की तुलना में अधिक रही। इससे जीवीए डिफ्लेटर कम हुआ। इसके अलावा, कुछ सेवा क्षेत्रों में कीमतों में बहुत कम वृद्धि होने के कारण जीवीए डिफ्लेटर और सामान्य सीपीआइ और डब्ल्यूपीआइ के बीच अंतर और बढ़ गया। स्थिर कीमतों पर जीवीए का अनुमान सामान्य या समग्र मूल्य सूचकांकों के आधार पर नहीं लगाया जाता।
इसके लिए अलग-अलग प्रकार के उत्पादन और उसमें इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं के लिए 300 से अधिक उत्पादक मूल्य और अन्य मूल्य सूचकांकों का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए अलग-अलग और व्यापक स्तर के कुछ आंकड़ों को सामने रखकर इन जीवीए अनुमानों पर सवाल उठाना उचित नहीं। इससे एक ऐसी सांख्यिकीय व्यवस्था को लेकर जनता में गलत धारणा बन सकती है, जिसे अधिक पारदर्शी और बेहतर बनाने के लिए लगातार सुधार किया गया है।
एक अध्ययन में भारत की राष्ट्रीय आय की गणना की पद्धति पर अनुचित तरीके से सवाल उठाए गए हैं। इसमें यह मान लिया गया है कि जीडीपी वृद्धि को कथित रूप से जरूरत से ज्यादा दिखाए जाने के कारण भारत के वास्तविक प्रदर्शन और इस काल्पनिक तुलना वाले देश के प्रदर्शन के बीच जो अंतर निकाला गया है, वह वास्तव में "निचली सीमा" है, लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जीडीपी की गणना की पद्धति में आखिर गलती कहां है। आर्थिक आकलन की किसी प्रणाली की आलोचना स्वागतयोग्य है, क्योंकि इससे सुधार की दिशा स्पष्ट हो सकती है, लेकिन भ्रामक टिप्पणियों और सुविधाजनक निष्कर्षों से यह संभव नहीं होता। विशेष तौर से तब जब अर्थव्यवस्था के लगभग सभी प्रमुख क्षेत्र तेजी का संकेत कर रहे हों।
(देव प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष और सौरभ गर्ग सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव हैं। आलेख में मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार एंटनी साइरिएक का भी योगदान है)












