विचार: आर्थिक प्रगति पर अनावश्यक सवाल
भारत ने पहली तिमाही में 7.8% की जीडीपी वृद्धि दर्ज की, जिससे वह विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया
HighLights
भारत ने पहली तिमाही में 7.8% की जीडीपी वृद्धि दर्ज की।
जापानी रेटिंग एजेंसी JCR ने भारत की सॉवरेन रेटिंग 'ए-' की।
यह अपग्रेड वैश्विक निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ाएगा।
संजय गुप्त। पिछले दिनों इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही के जीडीपी के आंकड़े सामने आने पर सरकार के साथ अनेक अर्थशास्त्रियों ने प्रसन्नता व्यक्त की। जीडीपी में 7.8 की वृद्धि के साथ ही भारत एक बार फिर विश्व की सबसे तेज बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में सामने आया, लेकिन इन आंकड़ों के जारी होते ही कुछ रिटायर्ड नौकरशाहों और खासकर पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इन आंकड़ों को गलत बताकर एक बखेड़ा खड़ा कर दिया।
जीडीपी के ताजा आंकड़ों के अनुसार सेवा, मैन्यूफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्श्न आदि क्षेत्रों में तेज वृद्धि हो रही है। उपभोग में वृद्धि भी जीडीपी बढ़त में सहायक बनी। यह एक सामान्य समझ है कि आर्थिकी को बढ़ाने में आज जो क्षेत्र सहायक हों, जरूरी नहीं कि एक दशक बाद भी आर्थिकी उनके ही जरिये बढ़े। इसी कारण दस वर्ष के अंतराल पर उन क्षेत्रों की एक नई सूची जारी होती है, जिनके आधार पर जीडीपी का आकलन होता है। ऐसा पहली बार नहीं किया गया।
आम तौर पर यह हर दस वर्ष में होता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी इसे मान्यता देता है। यह हैरानी की बात है कि इस सामान्य सी बात को सेवानिवृत्त नौकरशाह न समझ पाएं और जीडीपी के आंकड़ों पर संशय जताएं। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल उठा रहे रिटायर्ड नौकरशाह अपनी कुंठा निकाल रहे हैं।
जीडीपी के आंकड़ों पर विदेश यात्रा पर गए प्रधानमंत्री मोदी ने एक पोस्ट के जरिये यह कहा था कि ये आंकड़े निराशावादियों के लिए झटका हैं। यह विपक्षी नेताओं और खासतौर पर राहुल गांधी पर कटाक्ष था, जो कुछ समय पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के भारतीय अर्थव्यवस्था के मृत होने के दावे का समर्थन कर रहे थे। पूर्व नौकरशाहों की ओर से जीडीपी के आंकड़ों पर सवाल उठाए जाने के बाद कांग्रेस मोदी सरकार पर टूट पड़ी और यह दावा करने लगी कि वास्तविक जीडीपी ग्रोथ तो 2.6 प्रतिशत ही है। यह आकलन बहुत ही हास्यास्पद है, क्योंकि देश में कोविड के बाद से जो प्रगति हुई है, वह जगजाहिर है।
इस प्रगति को देखते हुए जीडीपी में सिर्फ 2.6 प्रतिशत की वृद्धि का दावा गले नहीं उतरता। जीडीपी के आंकड़े सही हैं, इसे रेखांकित करने के लिए विश्व बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्र सहित और भी अर्थशास्त्री सामने आए। उन्होंने तथ्यों के साथ सरकार के आंकड़ों को सही बताया। नीलकंठ मिश्र के अनुसार दो अलग-अलग सीरीज के जीडीपी के आंकड़ों की आपस में तुलना करना बुनियादी तौर पर गलत है।
उनके अनुसार नई जीडीपी सीरीज में डाटा और कार्यप्रणाली, दोनों में सुधार किया गया है और संशोधित बेस-ईयर के आंकड़े नए अनुमानों से बहुत पहले ही सामने आ चुके थे। आखिर कोई इन आंकड़ों को कैसे झुठला सकता है कि अगस्त में कारों और एसयूवी की बिक्री में 35, दोपहिया वाहनों में 20 से अधिक और कमर्शियल वाहनों में 40 प्रतिशत से ज्यादा का उछाल आया। ध्यान रहे वाहन बिक्री के आंकड़े सरकार नहीं जुटाती। टैक्स कलेक्शन में मजबूती, लोन ग्रोथ में तेजी और निर्माण कार्य में निरंतर तेजी जैसे ठोस संकेतकों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती।
तथ्य यह भी है कि जीडीपी के आंकड़े सामने आने के बाद जापानी रेटिंग एजेंसी (जेआरसी) ने भारत की सावरेन रेटिंग को ए- घोषित किया, जो इसके पहले बीबीबी+ थी। जेआरसी सहित अन्य रेटिंग एजेंसियां भारत सहित तमाम देशों की रेटिंग जारी करती है। अन्य अनेक कारणों के साथ इस रेटिंग से कोई देश विदेशी निवेश आकर्षित करने में सफल रहता है।
जेआरसी वैश्विक स्तर पर एक विश्वसनीय एजेंसी है और किसी देश की ए- रेटिंग इस बात को दर्शाती है कि वित्तीय जिम्मेदारी निभाने को लेकर उस पर भरोसा किया जा सकता है। यह भी ध्यान रहे कि इससे पहले पिछले महीने दो अन्य वैश्विक रेटिंग एजेंसियां एसएंडपी और फिच भी भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती रेखांकित कर चुकी हैं। दोनों एजेंसियों ने भारत की नीतिगत स्थिरता और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी खर्च को देखते हुए भारत को निवेश के मामले में उपयुक्त स्थान करार दिया था। जापानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी का भारत की रेटिंग को बढ़ाकर ए- करना मामूली बात नहीं। यह एक छलांग है।
भारत 1988 के बाद से कभी भी 'ए' श्रेणी में नहीं रहा। 1990-91 में भारत भुगतान संतुलन के संकट में फंस गया था, जिससे देश की आर्थिक साख को नुकसान पहुंचा था। इस साख को वापस पाने में देश को लंबा समय लगा। अब इस साख को और मजबूत किया जाना चाहिए। किसी रेटिंग एजेंसी की ओर से ए- रेटिंग मिलने का मतलब है कि वैश्विक निवेशकों का भारत पर भरोसा काफी बढ़ गया है। इससे देश में अधिक विदेशी निवेश आने की संभावना बढ़ेगी। इसके नतीजे में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। इस मजबूत रेटिंग की वजह से भारत सरकार और भारतीय कंपनियों को विदेश से सस्ते ब्याज दरों पर कर्ज या फंड मिल सकेगा।
रेटिंग में सुधार के साथ तथ्य यह भी है कि भारतीय बैंकों का एनपीए घटा है और अब यह दो प्रतिशत से नीचे है। इसी तरह राजकोषीय घाटा पिछले वर्ष के 4.7 से घटकर 4.4 प्रतिशत पर आ गया है। जीडीपी के मुकाबले केंद्र सरकार का कर्ज भी लगभग 56.1 प्रतिशत है, जिसके आगे और कम होने की उम्मीद है। सरकार ने जिस तरह गैर-जरूरी सब्सिडी में कटौती करके बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ाया है, वह इसका संकेत है कि वित्तीय संसाधनों का प्रबंधन सही तरह किया जा रहा है।
अगर सरकार कर्ज और खर्चों को नियंत्रित रखे तो वैश्विक एजेंसियां भारत की रेटिंग में और सुधार कर सकती हैं। अब जब भारत की रेटिंग सुधर रही है, तब किसी की ओर से आर्थिकी में गिरावट आने की बातें करना विचित्र ही है। जिन नौकरशाहों और कांग्रेस नेताओं ने जीडीपी के आंकड़ों को लेकर नकारात्मक माहौल बनाया, उन्हें यह समझना चाहिए कि रेटिंग एजेंसियां कई पैमानों के आधार पर अपनी रेटिंग देती हैं।
क्या पूर्व नौकरशाह और कांग्रेस नेता आर्थिक मामलों में खुद को रेटिंग एजेंसियों से अधिक जानकार साबित करना चाहते हैं? साफ है कि यह कहना उनकी खीझ ही है कि सरकार ने आंकड़ों को तोड़ा-मरोड़ा और कम आर्थिक वृद्धि को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)












