विचार: समझी जाएं जेन-जी की आकांक्षाएं
भारत में जेन-जी की आकांक्षाएं किसी एक चुनाव या एक अभियान की बात नहीं हैं। यह भारत के लोकतंत्र के आने वाले कल की दिशा तय करने वाला सवाल है। जो भी नेतृत्व राजर्षि की संकल्पना को आत्मसात कर उसके अनुरूप आचरण करेगा, वही इस पीढ़ी का भरोसा जीत पाएगा।
HighLights
जेन-जी भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण, पर असंतुष्ट शक्ति है।
डिजिटल जुड़ाव के बावजूद नौकरी और अवसरों की कमी से निराश।
नेतृत्व को राजर्षि की अवधारणा अपनाकर युवाओं का भरोसा जीतना होगा।
डॉ. मनिष दाभाडे। आज भारतीय राजनीति में जेन-जी को लेकर जो हलचल दिख रही है, वह कोई अचानक उभरा हुआ रुझान नहीं है। यह एक बड़े बदलाव की स्वीकृति है। सवाल यह है कि क्या यह पीढ़ी वाकई राजनीति में इतनी अहम है या फिर मीडिया के एक हिस्से और इंटरनेट मीडिया की देन है? सच्चाई इन दोनों के बीच है। बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाली बात यह है कि हर चुनावी विश्लेषण अब जेन-जी को किसी जादुई ताकत की तरह पेश करने की जल्दी में है। वह भी तब जब हमारे चुनाव अब भी बहुत हद तक स्थानीय मुद्दों, जातिगत समीकरणों, सरकारी योजनाओं और नेताओं की छवि से ही तय होते हैं। भारत की करीब एक चौथाई आबादी जेन-जी है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या के बावजूद राजनीतिक फैसलों के केंद्र में अपेक्षित स्थान नहीं पा रही। यही असंतुलन इसे अहम बना देता है। जब कोई इतना बड़ा तबका संस्थाओं के भीतर अपनी बात कहने की जगह नहीं पाता, तो वह स्वाभाविक रूप से संस्थाओं के बाहर अपनी आवाज ढूंढ़ने लगता है।
जेन-जी की प्रकृति और स्वरूप पर विचार करें तो यह कोई एक जैसा एकरूप समूह नहीं है। यह इलाके, भाषा, जाति, वर्ग और आर्थिक हैसियत के हिसाब से बहुत अलग-अलग है। इसे "वोट बैंक" कहना उसकी असली तस्वीर को छोटा करके देखना होगा। बेंगलुरु के किसी स्टार्टअप में काम करने वाला युवक, प्रयागराज में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही छात्रा और किसी छोटे शहर में पारिवारिक काम-धंधा संभाल रहा लड़का, सभी जेन-जी के प्रतिनिधि हैं, लेकिन उनकी पसंद और प्राथमिकताएं भिन्नता लिए हो सकती हैं। इस पीढ़ी को किसी एक विचारधारा या किसी एक पार्टी के दायरे से बांधकर देखना उचित नहीं। इस पीढ़ी को आखिर जोड़ता क्या है? इसका जवाब है डिजिटल दुनिया से इसका गहरा जुड़ाव। यह भारत की पहली पीढ़ी है जो स्मार्टफोन और इंटरनेट मीडिया के साथ बड़ी हुई है, जहां खबर पलक झपकते फैल जाती है। इसी वजह से आज कोई भी छोटी नाराजगी देश भर के आक्रोश का कारण बन सकती है।
न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर के युवाओं में इस समय एक बैचैनी दिखाई पड़ती है। उन्हें अपना भविष्य अनिश्चित दिख रहा है। तेजी से बदलती तकनीक, आटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से नौकरियों पर मंडराता खतरा और सत्ता में बैठे लोगों के प्रति गहराता अविश्वास उन्हें परेशान कर रहा है। पिछले दो वर्षों में नेपाल, इंडोनेशिया, मेडागास्कर, मोरक्को और पेरू जैसे देशों में युवाओं के नेतृत्व वाले आंदोलनों ने सरकारों को हिला दिया या गिरा भी दिया। इन सभी आंदोलनों में यही एक समान पहलू था कि यह कोई विचारधारा की लड़ाई नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, चंद लोगों की चांदी और नीतियों से स्वयं को बाहर रखे जाने के खिलाफ गुस्सा था। भारत का युवा भी अपने फोन की स्क्रीन पर यह सब देखता है। इसलिए यह असंतोष अब सीमाओं के आरपार महसूस होने लगा है। अपने देश में देखें तो यह बेचैनी पढ़ाई और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी से भी पैदा होती है। एक पूरी पीढ़ी को पढ़ने, हुनर सीखने और मेहनत करने के लिए कहा गया, लेकिन जब परीक्षा में गड़बड़ी, भर्ती में देरी और अवसरों में अभाव की बात सामने आती है, तो यह इंसाफ न मिलने का गहरा दर्द बन जाती है। पढ़े-लिखे बेरोजगारों की बढ़ती संख्या यही बताती है कि डिग्रियां तो बढ़ी हैं, लेकिन उस हिसाब से प्रतिष्ठा वाली नौकरियां नहीं बढ़ीं।
अगर राजनीतिक दल इस मुश्किल को सिर्फ एक संवाद की समस्या मानकर हल करने की कोशिश करेंगे और सोचेंगे कि इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब वीडियो, थोड़ी और "कूल" भाषा से बात बन जाएगी तो यह एक बड़ी गलती होगी। नए जमाने के मंचों को अपनाना जरूरी है, लेकिन सिर्फ इतना काफी नहीं। एक वायरल रील किसी युवा के सालों की मेहनत के बाद मिली निराशा को मिटा नहीं सकती। जब असल समस्या संस्थाओं की हो तब अच्छी पैकेजिंग नाराजगी को कुछ समय के लिए टाल तो सकती है, लेकिन हमेशा के लिए खत्म नहीं कर सकती। समाधान तीन पहलुओं में निहित है। भरोसा, आर्थिक अवसर और राजनीतिक भागीदारी। भरोसा तब बनता है जब तंत्र साफ-सुथरा हो, जब परीक्षा और भर्ती की प्रक्रिया निष्पक्ष हो और वादों की पूर्ति हो। आर्थिक अवसर तब बनते हैं जब पढ़ाई को नौकरी के अनुकूल बनाया जाए। जब कारखानों, सेवा क्षेत्र और नई तकनीक में अच्छी नौकरियां बनें और उद्यमिता सिर्फ एक नारा न रहकर वास्तविकता में रूपांतरित हो। राजनीतिक भागीदारी भी तभी मायने रखती है जब युवाओं को सिर्फ प्रचार में चेहरा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि नीति बनाने, संगठन चलाने और फैसले लेने के मोर्चे पर समायोजित किया जाए।
राज्य-व्यवस्था के संदर्भ में भारतीय परंपरा भी खासी समृद्ध रही है। आचार्य चाणक्य ने "राजर्षि" की बात कही थी। अर्थात एक ऐसा शासक जो सत्ता का उपयोग निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि जनता की भलाई के लिए करता है? जो खुद अनुशासन में रहता है और जिसकी असली ताकत जनता के भरोसे से आती है, न कि सिर्फ पद से। राजर्षि की संकल्पना सत्ता को सेवा मानती है। इसमें जनता की नब्ज को समझा जाता है। दंभ से मुक्त होकर आलोचना को गले लगाना पड़ता है। इसमें तात्कालिक लोकप्रियता से अधिक विरासत के निर्माण को महत्व दिया जाता है। जेन-जी के परिप्रेक्ष्य में यह संकल्पना बहुत सार्थक लगती है। इस पीढ़ी को न लंबे भाषण चाहिए और न अनावश्यक प्रचार या मार्केटिंग। उसे ऐसा नेतृत्व चाहिए, जो सत्ता को अपना हक नहीं, अपितु दायित्व समझे। जो फैसला लेने से पहले सुनना जानता हो। जो व्यक्ति से अधिक संस्थाओं को वरीयता दे और जो युवाओं को हाशिए पर नहीं, बल्कि मुख्यधारा का हिस्सा बनाए। राजर्षि की यह संकल्पना हमें यही सिखाती है कि असली और टिकाऊ भरोसा प्रचार से नहीं, बल्कि विनम्रता और जिम्मेदार शासन से ही कमाया जाता है। भारत में जेन-जी की आकांक्षाएं किसी एक चुनाव या एक अभियान की बात नहीं हैं। यह भारत के लोकतंत्र के आने वाले कल की दिशा तय करने वाला सवाल है। जो भी नेतृत्व राजर्षि की संकल्पना को आत्मसात कर उसके अनुरूप आचरण करेगा, वही इस पीढ़ी का भरोसा जीत पाएगा।
(लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)












