डॉ. ऋतु सारस्वत। हाल में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा एक अंग्रेजी शब्द के उच्चारण को लेकर कुछ लोगों ने इंटरनेट मीडिया पर जिस प्रकार उपहास किया, उसने एक बार फिर हमारी उस मानसिक रुग्णता को सामने ला खड़ा किया, जो विगत अनेक दशकों से न केवल हमें भीतर ही भीतर खोखला करती आ रही है, बल्कि हमारे आत्मविश्वास को भी निरंतर क्षीण कर रही है। विडंबना यह है कि उसके कारणों पर न हमने कभी गंभीर आत्ममंथन किया और न ही उसके विरुद्ध कोई वैचारिक प्रतिरोध खड़ा किया।

परिणामस्वरूप उपहास की यह घृणित प्रवृत्ति हमारे सार्वजनिक जीवन का लगभग स्वीकृत व्यवहार बन गई है। इस घटना ने एक और गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया कि किसी व्यक्ति को यह अधिकार किसने दिया कि वह किसी अन्य की भाषा, उच्चारण अथवा अभिव्यक्ति को अपनी तथाकथित श्रेष्ठता की कसौटी पर परखे और स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करते हुए दूसरे का मखौल उड़ाए। यदि किसी भाषा का ज्ञान किसी व्यक्ति में दूसरों के प्रति सम्मान के स्थान पर उपेक्षा और उपहास का भाव उत्पन्न कर रहा है तो समस्या भाषा की नहीं, उस ज्ञान के अहंकार की है।

राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर लेने के दशकों बाद भी हम मानसिक और विशेष रूप से भाषाई पराधीनता से आज तक मुक्त नहीं हो पाए हैं। प्रश्न किसी व्यक्ति का नहीं है। प्रश्न उस मानसिकता का है, जिसने विदेशी भाषा में निपुणता को ही ज्ञान, प्रतिभा, योग्यता और सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय बना दिया है। यदि अंग्रेजी में पारंगत होना ही ज्ञान, प्रतिभा और श्रेष्ठता का अंतिम प्रमाण होता तो आज चीन, जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देश विश्व के अग्रणी राष्ट्र नहीं होते।

इन देशों ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, उद्योग, शिक्षा और नवाचार के क्षेत्र में विश्व का नेतृत्व अपनी भाषाओं के आत्मविश्वास के साथ स्थापित किया है। उन्होंने अपनी भाषा को आधुनिक बनाया, जबकि हमने आधुनिकता को ही विदेशी भाषा का पर्याय मान लिया। वहां अपनी भाषा में बोलना गौरव का विषय है, जबकि किसी विदेशी भाषा में संवाद करना सामाजिक प्रतिष्ठा का मानदंड नहीं माना जाता। वैश्विक मंचों पर भी उनके राष्ट्रीय नेता अपनी भाषा में विचार रखना स्वाभाविक समझते हैं, क्योंकि भाषा उनके लिए केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और आत्मसम्मान का भी प्रतीक है।

भारतीय समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विदेशी भाषा में पारंगत होना योग्यता, बुद्धिमत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा का पर्याय मान लिया गया है, जबकि अपनी ही मातृभाषा में बोलना अनेक लोगों के लिए संकोच का विषय बना चुका है। यह किसी व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि उस स्थापित सामाजिक मानसिकता का परिणाम है, जिसने भाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यांकन का पैमाना बना दिया है। इस मानसिकता का सबसे जीवंत उदाहरण हमारा सिनेमा जगत है, जिसने हिंदी भाषा के माध्यम से अपार लोकप्रियता, प्रतिष्ठा और आर्थिक समृद्धि अर्जित की, किंतु उसके अनेक प्रतिष्ठित कलाकार सार्वजनिक मंचों पर अंग्रेजी में संवाद करना अधिक सहज समझते हैं।

आवश्यकता ऐसी सामाजिक चेतना की है, जो निरंतर इस तथ्य को स्थापित करे कि अपनी मातृभाषा में संवाद करना सम्माननीय है। सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन यू ने कहा था, 'जिस समाज के पास अपनी भावनाओं से जुड़ी मातृभाषा नहीं होती, वह भावनात्मक रूप से अपंग हो जाता है। ऐसा समाज स्वयं पर संदेह करने लगता है और उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है।' दुर्भाग्य यह है कि भारत में इस मानसिकता का पोषण सबसे अधिक हमारी शिक्षा व्यवस्था ने किया है। बचपन से ही बच्चों और अभिभावकों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि सफलता का मार्ग ज्ञान से अधिक अंग्रेजी से होकर जाता है। परिणामस्वरूप हमारी ऊर्जा किसी कौशल, अनुसंधान, सृजनात्मकता और नवाचार विकसित करने के बजाय अंग्रेजी सीखने में अधिक व्यय होने लगती है। जबकि रोजगार भाषा नहीं, योग्यता और कौशल उत्पन्न करते हैं।

दुखद यह है कि मानसिक गुलामी की यह प्रवृत्ति केवल सामान्य जनजीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। नेतृत्व का मूल्यांकन अनेक बार उसके विचारों, अनुभव और कार्यक्षमता की अपेक्षा अंग्रेजी में संवाद करने की क्षमता के आधार पर किया जाता है। यदि वह अंग्रेजी में सहज नहीं हैं तो उसके ज्ञान, योग्यता और नेतृत्व क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लगाने का प्रयास किया जाता है। यह प्रवृत्ति किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए उचित नहीं कही जा सकती। लोकतंत्र की शक्ति भाषा में नहीं, विचार में होती है। किसी के उच्चारण का उपहास करना उपहास करने वाले व्यक्ति की मानसिक पराधीनता का सबसे बड़ा प्रमाण होता है और विश्व की किसी भी संस्कृति में मानसिक रूप से पराधीन व्यक्ति कभी भी सम्मान योग्य नहीं होता।

(लेखिका समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं)