रक्षा मंत्रालय ने देश में बनने वाले रक्षा उपकरणों की जो नई सूची जारी की, वह यह बता रही है कि रक्षा मामले में आत्मनिर्भर होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ा जा रहा है। इस सूची के अनुसार चार सौ से अधिक और सैन्य सामग्री का निर्माण देश में ही किया जाएगा। यह ऐसी छठी सूची है।

इस सूची में उन्नत हल्के हेलीकॉप्टर, हल्के लड़ाकू विमान भी शामिल हैं और उच्च विस्फोटक टैंक-रोधी गोला-बारूद भी। इसका अर्थ है कि भारत समय के साथ ऐसी रक्षा सामग्री का निर्माण करने में सफल है, जिसकी आवश्यकता देश को भी है और जिसके निर्यात की संभावनाएं भी हैं।

पिछले पांच वर्षों में 15 हजार से अधिक रक्षा सामग्री का स्वदेशीकरण किया गया है। इससे लगभग 9,000 करोड़ रुपये के आयात प्रतिस्थापन का अनुमान है। यदि देश को वास्तव में आत्मनिर्भर बनना है तो अन्य अनेक क्षेत्रों के साथ रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। इससे विदेशी मुद्रा की बचत के साथ ही उसमें वृद्धि भी होगी, क्योंकि धीरे-धीरे देश का रक्षा निर्यात भी बढ़ रहा है।

पिछले 12 वर्षों में देश का रक्षा निर्यात कई गुना बढ़ा है और आज लगभग सौ देशों को भारतीय सैन्य उपकरणों की आपूर्ति की जा रही है। भारत को अपनी जरूरत की रक्षा सामग्री का स्वदेश में ही अधिकाधिक निर्माण इसलिए करना चाहिए, क्योंकि अभी आवश्यक रक्षा सामग्री हासिल करने में अच्छी-खासी विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है।

भारत रक्षा सामग्री के मामले में विश्व के लिए बाजार बनकर नहीं रह सकता। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि कई बार उन्नत रक्षा सामग्री पाने में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इनमें संबंधित देशों की कठोर शर्तें भी होती हैं। यह ठीक है कि कई देश उन्नत रक्षा सामग्री के साथ तकनीक भी दे देते हैं, लेकिन वह उत्तम कोटि की नहीं होती। भारत को अपनी जरूरत की रक्षा सामग्री खुद बनाने के साथ ही रक्षा विनिर्माण का वैश्विक केंद्र भी बनना होगा।

यह सराहनीय है कि मोदी सरकार रक्षा सामग्री के स्वदेश में उत्पादन को विशेष महत्व दे रही है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से शक्ति की जिस सप्तधारा का उल्लेख किया, उसमें एक रक्षा शक्ति भी है। देश में अधिकाधिक उन्नत रक्षा सामग्री का निर्माण इसलिए संभव हो पा रहा है, क्योंकि निजी कंपनियों का सहयोग लेना शुरू किया गया है।

यदि यह काम और पहले किया गया होता तो आज स्थिति और बेहतर होती। जैसे रक्षा क्षेत्र की निजी कंपनियां विश्वस्तरीय सैन्य सामग्री का निर्माण करने में सक्षम हैं, वैसे ही अन्य क्षेत्र की कंपनियों को होना होगा। आत्मनिर्भरता का यही मूल मंत्र है।