बद्री नारायण। भारतीय ज्ञान परंपरा पर अध्ययन, अध्यापन और शोध की प्रक्रिया भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रारंभ हो गई है। कई विश्वविद्यालयों में इस विषय पर अध्ययन केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं और उच्च शिक्षण संस्थानों में क्रेडिट आधारित पाठ्यक्रम भी बनाए जा रहे हैं।

यह पहल हमें अपने सोच, विचार और मानसिकता में विद्यमान औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्ति दिलाने में मदद करेगी। अपनी ज्ञान परंपरा की खोज न केवल औपनिवेशिक शासन में रहे देशों में हो रही है, बल्कि चीन, जापान जैसे कई देश भी अपने राष्ट्रीय स्व को ज्ञान से जोड़ते हुए अपनी जड़, जमीन और संस्कृति में उपजे ज्ञान, मेधा, दक्षता और तकनीकी को अपनी आधुनिकता में शामिल कर रहे हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा पर शोध, अध्ययन और अध्यापन की प्रक्रिया भारत में विलंब से शुरू हुई है। इसे आजादी के बाद से ही आरंभ हो जाना चाहिए था, लेकिन यह संतोषजनक है कि शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की देखरेख में यह प्रक्रिया अब लगातार आगे बढ़ रही है। इस प्रक्रिया में कुछ चुनौतियां भी हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा मात्र कोई विषय न होकर एक ऐसा दृष्टिकोण है, जिससे हम अपने सभी विषयों और ज्ञान की अनुषंगी इकाइयों को समझ सकते हैं। यह एक दार्शनिक और सैद्धांतिक आयाम रचने के साथ ही अनुभवजन्य और प्रयोगसिद्ध प्रमाणों से भरे ज्ञान की उपयोगिता भी रखता है। इसमें उदाहरण और अनुभव भी शामिल हैं, जो हमारे पाठ्यक्रमों में आ रहे हैं। इसे केवल एक विषय के रूप में देखने की ग्रंथि से हमें मुक्त होना होगा।

भारतीय शिक्षा और विमर्श जगत की दूसरी समस्या यह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा पर शोध और संकलन के क्षेत्र में अभी कम काम हुआ है, जिसके कारण हमारे पास अध्ययन सामग्री का अभाव है। इस कमी को समझते हुए विज्ञान एवं तकनीकी संस्थान अपने-अपने तरीके से इस दिशा में कार्यरत हैं।

समाज विज्ञान से जुड़े शिक्षा संस्थानों में भारतीय समाज के ज्ञान, मेधा, तकनीकी पर शोध, संकलन और अध्ययन सामग्री बनाने का कार्य अभी पर्याप्त गुणात्मकता के साथ प्रारंभ हुआ है। अनेक विद्वान और समाजशास्त्री इस दिशा में कार्यरत हैं। इन शोधों का परिणाम शीघ्र ही दिखेगा।

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान ने पाठ्यपुस्तक निर्माण की प्रक्रिया में भारतीय ज्ञान परंपरा पर केंद्रित पाठ्यपुस्तकें बनाने के अभियान को खासा महत्व दिया है। अन्य विश्वविद्यालयों को भी भारतीय ज्ञान परंपरा पर ज्ञान सृजन की परियोजना पर काम करना होगा।

शिक्षा मंत्रालय में भारतीय ज्ञान परंपरा पर ज्ञान सृजन की प्रक्रिया को सहयोग देने के लिए एक उपखंड भी बनाया गया है, जो ऐसी परियोजनाओं को आर्थिक और दक्षता निर्माण में सहयोग करता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा की पुनः खोज और उसे शोध एवं शिक्षण से जोड़ने की इस परियोजना की एक बड़ी समस्या इसके अर्थ का गलत पाठ और अनेक वृत्तांतात्मक उलझावों एवं अफवाहपूर्ण अवधारणाओं से गुजरना है। इस संदर्भ में पहली चुनौती इसके अर्थ एवं तत्व मीमांसा की है।

भारतीय ज्ञान परंपरा वस्तुतः भारतीय समाज और उसके मिट्टी-पानी और सांस्कृतिक पर्यावरण में उपजा ज्ञान है। यह किसी एक जाति, पंथ और संस्कृति में सृजित एवं विकसित हुआ ज्ञान नहीं है, बल्कि यह उन सभी घटकों के सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव का ज्ञान समुच्चय है, जिनसे भारतीय समाज बनता है। यह बहुलतावादी सामाजिक संस्कृति से उभरा ज्ञान है।

यह भारतीय जमीन और पर्यावरण में पले-बढ़े हर संस्कृति के अनुभवों से उपजा ज्ञान है। अतः इसे किसी एक जाति, पंथ और संस्कृति में सीमित करना इसके तात्विक अर्थ का गलत पाठ करना है। हिंदू, बौद्ध, मुस्लिम, सिख, ईसाई जैसी कोटियों से परे यह हर समुदाय, समाज एवं संस्कृति के लौकिक एवं दार्शनिक ज्ञान पर शोध-अध्ययन की हमें छूट देता है।

एक तरफ वाल्मीकि, भरतमुनि, वेदव्यास, चरक, सुश्रुत, पतंजलि, कौटिल्य का ज्ञान लोक भारतीय ज्ञान परंपरा का हिस्सा है, दूसरी तरफ बुद्ध, नागार्जुन, भर्तृहरि, कबीर, नानक, रविदास के आख्यान इस ज्ञान विमर्श को रचते हैं। साथ ही अमीर खुसरो, दारा शिकोह तथा अन्य सूफियों का ज्ञान एवं योगियों का विमर्श भी इसमें शामिल है।

तात्पर्य यह है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में सीमांत पर बसे समुदायों, दलित, वंचित का ज्ञान अनुभव शामिल है, साथ ही अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक समूहों के अनुभव भी इसमें शामिल हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा का परिप्रेक्ष्य समाज की हर सामाजिक इकाई को एक सांस्कृतिक इकाई मानता है, जो अपने दैनंदिन जीवन के अनुभवों के बीच सांस्कृतिक, सभ्यतिक और आध्यात्मिक ज्ञान सृजित करता है। भारत में हर सामाजिक इकाई का एक लोक-जीवन होता है, जिसके अपने गीत, संगीत, सबद, भजन, कीर्तन, कव्वाली, मुहावरे, मसले होते हैं, जिनमें उन सामाजिक समूहों का ज्ञान, विवेक, तकनीकी, दक्षता और नीतियां भरी होती हैं।

आवश्यकता है भारतीय लोक ज्ञान के इन सभी रूपों का व्यापक संकलन एवं शोध कर उन्हें भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध रूपों को समझने एवं समझाने के लिए उपयोग किया जाए। इसमें स्त्री-पुरुष केंद्रित ज्ञान के साथ ही भारतीय समाज के हर चर-अचर के ज्ञानानुभव संग्रहित हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा के इन रूपों में दर्शन, राजनीतिशास्त्र, आर्थिकी, धार्मिक, तकनीकी, चिकित्सकीय, लोक-व्यवहार के भारतीय संस्करण का विशाल भंडार है। इन्हें संकलित कर उनकी व्याख्या और पुनः पाठ करने की आवश्यकता है। हमें इनका आर्काइव विकसित कर उन पर शोध करना होगा और उन शोधों को पाठ्यक्रम में लाना होगा। साथ ही, इन पर उच्च कोटि की पाठ्यपुस्तकें भी विकसित करनी होंगी।

भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित भारतीयता की व्यापकता एवं बहुलता के ज्ञान, नीतिगत, सांस्कृतिक एवं सभ्यतिक पक्षों पर शोध और अध्ययन करना होगा। इससे हमें अपने भारत को पुनःअविष्कृत करने में मदद मिलेगी। ज्ञान की यह पुनःखोज हमें स्वयं को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने के साथ ही विकसित भारत के लिए ज्ञान-लोक गढ़ने की भी निमित्त बनेगी।

(लेखक टाटा सामाजिक अध्ययन 
संस्थान के कुलपति हैं)