केके उपाध्याय। किसी सरकार के जीवन में सौ दिन बहुत लंबा समय नहीं होता, लेकिन सौ दिन यह बताने के लिए पर्याप्त होते हैं कि सरकार की नीयत क्या है, नीति क्या है और दिशा क्या है। पश्चिम बंगाल की नई सरकार के पहले सौ दिन इसी कसौटी पर देखे जाने चाहिए। इन सौ दिनों में सबसे बड़ा परिवर्तन बंगाल के माहौल में दिखाई देता है। लंबे समय बाद बंगाल में आम आदमी यह महसूस कर रहा है कि सरकार केवल सत्ता का प्रतिष्ठान नहीं, उसकी अपनी सरकार भी है। कानून सबके लिए है। प्रशासन को जवाबदेही तय करनी होगी। बंगाल लंबे समय तक राजनीतिक हिंसा, टकराव और भय की खबरों से पहचाना जाता रहा।

गांव से शहर तक राजनीति जीवन के हर हिस्से में मौजूद थी। नई सरकार के सामने पहली चुनौती इसी माहौल को बदलने की थी। सत्ता परिवर्तन का अर्थ केवल मुख्यमंत्री और मंत्रियों का बदलना नहीं होता। असली परिवर्तन तब होता है, जब शासन की कार्यसंस्कृति बदलती है। इन सौ दिनों में सरकार ने प्रशासन को स्पष्ट संकेत दिया है कि अब जवाबदेही सर्वोपरि है। फैसले समय पर हों। जनता की शिकायतें सुनी जाएं। योजनाएं कागज से निकलकर जमीन तक पहुंचें।

बंगाल सरकार ने शुरुआती सौ दिनों में स्वास्थ्य, रोजगार, महिला कल्याण, सीमा सुरक्षा और केंद्र-राज्य सहयोग जैसे क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाकर अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर दी हैं। नई सरकार के महत्वपूर्ण निर्णयों में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना को राज्य में लागू करना प्रमुख है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण के साथ समझौता कर इस योजना से जुड़ाव हुआ। इसका महत्व केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। बंगाल का पात्र व्यक्ति देश के दूसरे हिस्से में सूचीबद्ध अस्पताल में इसका लाभ ले सकता है। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए गंभीर बीमारी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं, आर्थिक संकट भी बन जाती है। इसलिए यह फैसला आमजन को स्वास्थ्य सुरक्षा और भरोसा देने वाला है।

बंगाल की बांग्लादेश के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसलिए सीमा सुरक्षा यहां केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा, घुसपैठ, तस्करी, कानून-व्यवस्था और सीमावर्ती नागरिकों की सुरक्षा से है। नई सरकार ने पहली कैबिनेट बैठक में सीमा पर बाड़ लगाने के लिए बीएसएफ को आवश्यक लंबित भूमि उपलब्ध कराने की दिशा में निर्णय लिया। यह एक राजनीतिक और प्रशासनिक संदेश भी था कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर राजनीति नहीं होगी। बंगाल पूर्वी भारत का प्रवेश द्वार है। पूर्वोत्तर भारत से उसकी स्वाभाविक कड़ी है। बंगाल की खाड़ी उसे दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों से जोड़ती है। इस भौगोलिक सामर्थ्य को आर्थिक शक्ति में बदलना होगा।

एक समय बंगाल भारत की औद्योगिक शक्ति था। हुगली के किनारे कारखानों की कतार थी। जूट उद्योग था। इंजीनियरिंग थी। कोलकाता देश के व्यापारिक केंद्रों में अग्रणी था। दुर्गापुर और आसनसोल औद्योगिक पहचान रखते थे। हल्दिया का अपना महत्व था। फिर धीरे-धीरे उद्योगों का पलायन शुरू हुआ। नई सरकार ने अपने शुरुआती दिनों में उद्योग जगत को एक स्पष्ट संदेश देने का प्रयास किया कि अब बंगाल उद्योग से संघर्ष नहीं करेगा। निवेश केवल घोषणाओं से नहीं आता। निवेशक को भरोसा चाहिए। नीति में स्थिरता चाहिए। कानून-व्यवस्था चाहिए। जमीन और बिजली चाहिए। प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सरलता चाहिए। सरकार के सामने अब चुनौती इस भरोसे को वास्तविक निवेश में बदलने की है।

बंगाल के पास आज भी अपार संभावनाएं हैं। बंदरगाह हैं। रेल नेटवर्क है। विशाल बाजार है। कुशल मानव संसाधन है। इन सभी शक्तियों को एक सूत्र में जोड़ दिया जाए तो बंगाल फिर भारत के औद्योगिक मानचित्र पर अपना पुराना गौरव प्राप्त कर सकता है। रोजगार केवल सरकारी नौकरियों से पैदा नहीं होगा। एमएसएमई चाहिए। स्टार्टअप चाहिए। आइटी चाहिए। मैन्यूफैक्चरिंग चाहिए। पर्यटन चाहिए। कृषि आधारित उद्योग चाहिए। हर जिले की पहचान को रोजगार से जोड़ना आने वाले पांच वर्षों में सरकार की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक होगी। बंगाल ने बीते वर्षों में महिलाओं के विरुद्ध अपराध की कई ऐसी घटनाएं देखीं, जिन्होंने पूरे देश को विचलित किया। नई सरकार ने महिला सुरक्षा को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है।

महिला सुरक्षा ऐसा विषय है, जिस पर सौ दिनों की उपलब्धि गिनाकर रुकना संभव नहीं है। यह निरंतर चलने वाली जिम्मेदारी है। सौ दिनों में यदि कोई एक परिवर्तन सबसे अधिक महसूस किया जा रहा है तो वह इसी भरोसे की वापसी है। इसे आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता। राज्य तभी आगे बढ़ता है, जब नागरिक को विश्वास हो कि उसका आने वाला कल आज से बेहतर होगा।

बंगाल चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और बंकिमचंद्र की धरती है। सुभाषचंद्र बोस और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की कर्मभूमि है। नए बंगाल को आधुनिक बनना है, लेकिन अपनी जड़ों को छोड़कर नहीं। सौ दिन मंजिल नहीं, शुरुआत हैं। ये आने वाले पांच वर्षों की दिशा का संकेत हैं और अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इन सौ दिनों में बंगाल की पूरी तस्वीर नहीं बदली, लेकिन तस्वीर बदलने का विश्वास जरूर पैदा हुआ है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)