विचार: सत्ताधारी दल के संगठन की चुनौतियां
किसी सत्तारुढ़ दल के संगठन का काम तब आसान होता है, जब उसकी सरकार सुशासन के हर मोर्चे पर मजबूत दिखे
HighLights
नितिन नवीन की टीम को तत्काल सक्रिय होना होगा।
नीट, यूजीसी-नेट जैसे परीक्षा घोटालों से युवा असंतुष्ट।
बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
राजीव सचान। अध्यक्ष बनने के लगभग सात महीने बाद नितिन नवीन की टीम घोषित हो गई। इसकी चर्चा इसलिए भी अधिक हो रही है, क्योंकि इसमें विलंब हुआ। किसी के लिए समझना कठिन है कि भाजपा अध्यक्ष को अपनी नई टीम बनाने में इतनी देर क्यों हुई? इस देरी का कारण जो भी हो, यह टीम एक ऐसे समय गठित हुई है, जब मोदी सरकार विपक्ष के आक्रामक तेवरों का सामना कर रही है।
राजनीतिक इरादों से लैस नजर आने वाली काकरोच जनता पार्टी की ओर से नीट पेपर लीक मामले में आंदोलन छेड़ने और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर अड़ जाने के बाद जो माहौल बना, उसका विपक्ष ने जमकर लाभ उठाया। इसी के नतीजे में संसद का मानसून सत्र न के बराबर चल सका।
सरकार जिस तरह संसद में गतिरोध तोड़ने में नाकाम रही, उससे यह संदेश निकला कि विपक्ष उस पर भारी पड़ा। सरकार यह भांप नहीं सकी कि विपक्ष केवल गोल पोस्ट बदलने ही नहीं, बल्कि उसे लेकर भाग खड़े होने की रणनीति पर चल रहा है।
नितिन नवीन की टीम को तत्काल प्रभाव से सक्रिय होना होगा, क्योंकि अगले वर्ष कम से कम सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें राजनीतिक दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश भी है। नितिन नवीन की टीम के सामने पार्टी और साथ ही केंद्र सरकार एवं अपनी राज्य सरकारों के पक्ष में भी नैरेटिव बनाने की चुनौती है।
स्वाभाविक रूप से यह चुनौती उन राज्यों में अधिक होगी, जहां उसकी अपनी सरकारें हैं और जहां चुनाव भी निकट हैं, क्योंकि इन सरकारों के कामकाज के लिए वह उसी तरह जवाबदेह होगी, जैसे मोदी सरकार के कामकाज के लिए।
निःसंदेह सत्ताधारी दलों के संगठनों को अपनी सरकारों का सहयोग और संरक्षण मिलने से कुछ सुविधा होती है, लेकिन जहां सत्ता से बाहर खड़े विपक्षी दलों को केवल विरोधी दलों की सरकारों की आलोचना-निंदा करना होता है, वहीं सत्ताधारी दलों के संगठनों को इसका प्रतिकार करने के साथ अपनी सरकार की नाकामियों पर भी जवाब देना होता है।
यदि कोई सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरी न उतर पा रही हो और उसकी रीति-नीति से जनता में असंतोष बढ़ रहा हो तो उसका संगठन कितना भी सशक्त और तेज-तर्रार नेताओं से लैस क्यों न हो, उसे अपने पक्ष में नैरेटिव खड़ा करने में कठिनाई होगी।
दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद युवा और खासकर जेन-जी चर्चा में हैं। वे भाजपा के साथ अन्य सभी दलों की प्राथमिकता में आ गए हैं। इसकी पुष्टि इससे भी होती है कि स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से दिए गए अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने युवाओं और नौजवानों का उल्लेख कई बार किया।
इसी के कुछ दिन बाद नितिन नवीन की टीम घोषित हुई, लेकिन उनकी टीम की घोषणा के कुछ ही घंटे पहले खबर आ चुकी थी कि राष्ट्रीय टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए की ओर से आयोजित की जाने वाली यूजीसी-नेट के तीन विषयों की परीक्षा स्थगित करनी पड़ी। यह इसलिए स्थगित करनी पड़ी, क्योंकि अनुवाद में गलतियां पाई गईं।
जूनियर रिसर्च फेलोशिप और असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए पात्रता के साथ पीएचडी में प्रवेश के लिए आयोजित की जाने वाली इस परीक्षा के प्रश्न पत्रों में उसी एनटीए की ओर से तब गड़बड़ियां हुईं, जब नीट पेपर लीक के कारण उसकी फजीहत हो चुकी थी और उसकी तपिश मोदी सरकार को भी झेलनी पड़ी। इसे लापरवाही की पराकाष्ठा कहेंगे कि जिन तीन विषयों की परीक्षा स्थगित करनी पड़ी, उनके प्रश्न पत्रों में टाइपिंग की भी गलतियां थीं और कई प्रश्न ऐसे थे, जो पहले पूछे जा चुके थे।
साफ है कि एनटीए का नाकारापन अब भी कायम है। या तो उसके अधिकारी लापरवाह हैं या फिर नाकारा। आखिर एनटीए के ऐसे कामकाज के बाद नितिन नवीन की टीम युवाओं को अपनी ओर कैसे आकर्षित कर सकती है? उनकी टीम की घोषणा के पहले आई यह खबर भी चर्चा में रही कि नए बने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे में एक माह के अंदर ही इतने गड्ढे हो गए कि उन्हें गिनना भी कठिन हो रहा है और भरना भी।
आखिर सरकार को असहज और कठघरे में खड़े करने वाले ऐसे प्रसंगों के बाद नितिन नवीन की टीम के लिए यह कहना कैसे संभव होगा कि उनकी सरकार कसौटियों पर खरी उतर रही है?
ऐसे एक नहीं अनेक प्रसंग हैं, जो यह बताते हैं कि 12 साल बाद भी मोदी सरकार अपने कई मोर्चों को दुरुस्त नहीं कर सकी है। बतौर उदाहरण शिक्षा और परीक्षा में ठोस सुधार के साथ बुनियादी ढांचे का गुणवत्तापूर्ण निर्माण अभी भी सुनिश्चित नहीं हो पाया है। किसी सत्ताधारी दल के संगठन के लिए अपने पक्ष में नैरेटिव बनाना तब आसान होता है, जब उसकी सरकार सुशासन के मामले में उदाहरण पेश कर पा रही हो।
किसी भी सरकार के पास जादू की छड़ी नहीं होती कि वह उसे घुमाए और सब कुछ सही हो जाए, लेकिन उसे दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ नेक इरादों का भी परिचय देना होता है। भारत जैसे विशाल देश में केंद्र और राज्य सरकारें कितना भी बेहतर काम करें, वह अपर्याप्त ही साबित होता है। जटिल समस्याओं का निदान आनन-फानन नहीं हो सकता, लेकिन हर मोर्चे पर सुधार केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि जमीन पर उतरते हुए दिखना भी चाहिए।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)
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