तेजस्वी सूर्या। हाल में मैंने अपनी पहली कांवड़ यात्रा पूर्ण की। हरिद्वार में हर की पौड़ी से ऋषिकेश स्थित वीरभद्र महादेव मंदिर तक कंधे पर गंगाजल से भरी कांवड़ लेकर लगभग 26 किमी पैदल चलना मेरे जीवन के सबसे भावपूर्ण आध्यात्मिक अनुभवों में से एक था। वर्षों से मन में यह प्रश्न था कि आखिर वह कौन सी शक्ति है, जो करोड़ों लोगों को स्वेच्छा से कई दिनों तक पैदल चलने, शारीरिक कष्ट सहने और केवल भगवान के दर्शन के लिए निकल पड़ने की प्रेरणा देती है।

कांवड़ यात्रा जैसी महाराष्ट्र की वारकरी यात्रा, नर्मदा परिक्रमा, अमरनाथ और वैष्णो देवी की यात्रा, तमिलनाडु की कावड़ी यात्रा, केरल की सबरीमाला, कर्नाटक की धर्मस्थल पदयात्रा और आंध्र की कनक दुर्गा यात्रा भी हैं। इन सबकी बाहरी भिन्नता के बावजूद एक समानता है। मनुष्य अपने पास जो सबसे बड़ी संपदा रखता है, वही ईश्वर को अर्पित करता है-अपना श्रम, अपना पुरुषार्थ और अपना शरीर। कांवड़ यात्रा इसी भाव की अति सुंदर अभिव्यक्ति है। हर वर्ष पांच करोड़ से अधिक श्रद्धालु, जिनमें अधिकांश युवा होते हैं, हरिद्वार या ऋषिकेश से गंगाजल लेकर यात्रा पर निकलते हैं। किसी के लिए यह यात्रा एक दिन की होती है, किसी के लिए एक सप्ताह की, पर भाव सबका एक ही होता है-चलते जाना साधना है। समर्पण ही इसका अंतिम उद्देश्य है।

मैंने लगभग 12-13 किलो वजन की कांवड़ कंधे पर उठाई और यात्रा आरंभ की। शुरुआती कुछ किमी उत्साह, जयघोष और ऊर्जा से भरे हुए थे, किंतु जैसे-जैसे रास्ता आगे बढ़ता गया, यात्रा का वास्तविक अर्थ उद्घाटित होने लगा। कांवड़ियों की श्रद्धा जितनी प्रभावित करने वाली थी, उतनी ही प्रभावित करने वाली वह सामाजिक शक्ति भी थी, जो पूरे मार्ग में यात्रा को संभाले हुए थी। यात्रा के दौरान अनेक लोग स्वयं यात्रा नहीं कर रहे थे, पर वे सेवा में लगे हुए थे। कोई पानी बांट रहा था, कोई भोजन परोस रहा था। यह शुद्ध सेवाभाव से उपजी सामाजिक शक्ति थी।

हमारा समाज केवल व्यवस्था से अपेक्षा नहीं करता, बल्कि स्वयं भी व्यवस्था का सहभागी बनता है। कांवड़ यात्रा इसका जीवंत उदाहरण है। कांवड़ यात्रा के लिए जिस शारीरिक क्षमता, सहनशक्ति और अनुशासन की आवश्यकता होती है, उसकी चर्चा शायद ही कभी होती है। यही युवा यदि महंगी फीस देकर आयरनमैन या हाइराक्स जैसी प्रतियोगिता में भाग लेते, तो उनकी दृढ़ता और अनुशासन की प्रशंसा होती, पर जब वही तरुणाई आस्था के रूप में दिखाई देती है और सामान्य परिवारों के युवा उसे दर्शाते हैं, तो उसे कमतर आंका जाता है। यह कांवड़ियों के बारे में कम और हमारे अपने पूर्वाग्रहों के बारे में अधिक बताता है।

हममें से अधिकांश लोग मंदिर कुछ न कुछ मांगने जाते हैं, लेकिन उस क्षण, जब महादेव मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग के सामने खड़ा था, मेरे पास मांगने के लिए कुछ भी नहीं था। केवल मौन था और उसी मौन में पूर्णता थी। हमारी परंपरा में साधना का आरंभ शरीर से होता है। इसी भाव को बसवन्ना के वचन अत्यंत सुंदर रूप में व्यक्त करते हुए कहते हैं-धनवान लोग शिवालय बनवा सकते हैं, लेकिन साधारण जन अपने शरीर को ही मंदिर बना लेते हैं। उनके पैर स्तंभ बनते हैं, देह देवालय बनती है और मस्तक स्वर्ण कलश। पत्थर के मंदिर नष्ट हो सकते हैं, किंतु चलता-फिरता जीवंत मंदिर अमर होता है।

कांवड़िए प्रायः सामान्य परिवारों से आते हैं-किसान, मजदूर, छोटे कर्मचारी, दुकानदार और मेहनतकश युवा। उनके पास धन-संपदा भले न हो, लेकिन वे अपना शरीर, श्रम, कष्ट और भक्ति अर्पित करते हैं। कांवड़ यात्रा भारतीय सभ्यता के तीन बड़े आयामों को जीवंत रूप में सामने लाती है। पहला आयाम है साधना। हर कदम आत्म-अनुशासन है, हर पीड़ा तपस्या है। शारीरिक कष्ट यहां बाधा नहीं, बल्कि यात्रा का अभिन्न अंग है। दूसरा आयाम है सेवा।

कांवड़ यात्रा केवल कांवड़िए की यात्रा नहीं है। भंडारा लगाने, पानी पिलाने, चिकित्सा सहायता देने, थके हुए यात्री की देखभाल करने वाला-हर व्यक्ति इस यात्रा का सहभागी बन जाता है। समाज स्वयं यात्रारत हो जाता है। तीसरा आयाम है समरसता। कांवड़ यात्रा में सामाजिक भेद पीछे छूट जाते हैं। सब साथ चलते हैं, सब कष्ट सहते हैं, सब समर्पित रहते हैं। सब एकसमान होते हैं। इस यात्रा में हमारा एक छोटा-सा प्रयास स्वच्छता को लेकर भी था।

यात्रा मार्ग और वीरभद्र महादेव मंदिर परिसर में प्लास्टिक और कचरा साफ कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि स्वच्छता भी साधना का ही एक रूप है। हम अक्सर कर्मकांड के पीछे छिपे मूल्यों को भूल जाते हैं। हम गंगा की आरती करते हैं, पर गंगा को स्वच्छ रखने के दायित्व को भूल जाते हैं। भारतीय परंपरा में प्रकृति सदैव पूजनीय रही है, इसलिए उसकी रक्षा भी हमारी आध्यात्मिक जिम्मेदारी है।

यात्रा पूर्ण होने पर मन में यह विचार बार-बार आया कि भारत को केवल पुस्तकों से नहीं समझा जा सकता। उसे समझना-जीना हो तो ऐसी आध्यात्मिक यात्रा पर चलना पड़ता है। श्रावण मास में कठिन तप और श्रद्धा के साथ कांवड़ यात्रा करने वाले श्रद्धालु केवल गंगाजल नहीं उठा रहे। वे हजारों वर्षों से जीवित भारतीय सभ्यता की एक महान परंपरा को अपने कंधों पर आगे बढ़ा रहे हैं।

(लेखक लोकसभा सदस्य एवं भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)