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सुरसा कौन थीं? जानिए नागों की माता का पौराणिक इतिहास, हनुमान जी की परीक्षा और रोहिणी का अवतार

Published: Wed, 26 Aug 2026 08:03 AM (IST)Updated: Wed, 26 Aug 2026 08:51 AM (IST)

पौराणिक कथाओं में सुरसा का वर्णन बेहद दिलचस्प और रहस्यमयी है। चलिए पढ़ते हैं सुरसा के अलग-अलग अवतार के बारे में।

सुरसा के जीवन का रहस्य (AI-Generated Image)

सुरसा के जीवन का रहस्य (AI-Generated Image)

HighLights

  1. सुरसा नागों की माता और महर्षि कश्यप की पत्नी थीं

  2. सुंदरकांड में हनुमान जी की बुद्धि और शक्ति की परीक्षा ली

  3. देवी भागवत के अनुसार रोहिणी के रूप में बलराम की माता बनीं

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पौराणिक ग्रंथों में सुरसा का विवरण अलग-अलग संदर्भों में एक बेहद महत्वपूर्ण और बहुआयामी पात्र के रूप में मिलता है। विभिन्न पुराणों में उनके जन्म और वंश की कथाएं अलग-अलग तरह से बताई गई हैं। वाल्मीकि रामायण के अरण्य कांड के अनुसार, दक्ष प्रजापति की पुत्री क्रोधवशा की दस कन्याओं में से एक सुरसा थीं। जब महर्षि कश्यप ने उनसे विवाह किया, तो उनसे नागों (नागवंश) का जन्म हुआ। वहीं, महाभारत के आदि पर्व के अनुसार, सुरसा से अनला, रुहा और विरुधा नाम की तीन पुत्रियां भी उत्पन्न हुई थीं।

दूसरी ओर, स्कंद पुराण के असुर कांड में सुरसा के जन्म की एक अलग कथा मिलती है। देवासुर संग्राम के समय जब अधिकांश असुर मारे गए, तब एक असुर मृत्यु के भय से भागकर पाताल लोक चला गया था। सुरसा उसी असुर की पुत्री थीं। महर्षि कश्यप से विवाह के बाद सुरसा ने अंगारका (सिंहिका) और अजमुखी नाम की दो पुत्रियों तथा सुरपद्म, सिंहवक्त्र, तारकासुर और गोमुख नाम के चार पुत्रों को जन्म दिया। इसके अलावा, इसी पुराण के अनुसार दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने सुरसा को सब कुछ नष्ट करने वाला एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र भी सिखाया था।

सुंदरकांड में क्या है वर्णन?

सुरसा की सबसे प्रसिद्ध घटना वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में आती है। जब हनुमान जी सीता जी की खोज में समुद्र लांघकर लंका की ओर बढ़ रहे थे, तब देवों और गंधर्वों ने उनकी शक्ति और बुद्धि की परीक्षा लेने के लिए सुरसा को भेजा गया। सुरसा ने पर्वत जैसा विशाल और भयानक रूप धारण कर हनुमान जी का रास्ता रोक लिया। जब सुरसा ने अपना मुंह सौ योजन तक चौड़ा फैला लिया, तब हनुमान जी ने बुद्धिमानी से अपना शरीर एक उंगली जितना छोटा कर लिया, वे तुरंत सुरसा के मुंह में प्रवेश करके उनके कान से बाहर निकल आए। हनुमान जी की इस चतुराई और सामर्थ्य से प्रसन्न होकर सुरसा ने उन्हें कार्य में सफलता का आशीर्वाद दिया।

देवी भागवत का रहस्य

सुरसा के जीवन का एक और बड़ा अध्याय देवी भागवत चौथे स्कंध और श्रीमद्भागवत पुराण के 10वें स्कंध में दर्ज है। एक बार कश्यप ऋषि ने यज्ञ के लिए वरुण देव की गाय चुरा ली और सुरसा तथा अदिति ने उस गाय को अपने आश्रम में छिपाकर रखा। वरुण और ब्रह्मा जी के श्राप के कारण 28वें द्वापर युग में कश्यप ऋषि को वसुदेव, अदिति को देवकी और सुरसा को रोहिणी के रूप में गोकुल में जन्म लेना पड़ा। इसी अवतार में सुरसा (रोहिणी) भगवान बलराम (बलभद्रराम) की माता बनीं। इसके अलावा, महाभारत के सभा पर्व के अनुसार सुरसा ब्रह्मा जी की सभा में विराजमान होकर उनकी उपासना भी करती हैं।

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