विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

12वां ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर: जानें इस प्राचीन शिव मंदिर का रोचक इतिहास और पौराणिक कथा

Published: Mon, 24 Aug 2026 07:00 AM (IST)

संभाजीनगर में स्थित घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से अंतिम है, जो भगवान शिव के पूरे परिवार को एक मूर्ति ...और पढ़ें

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र

घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाराष्ट्र के संभाजीनगर में स्थित भगवान शिव का सबसे प्रचीन घृष्णेश्वर मंदिर, जो भगवान शिव को समर्पित है। इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में से आखिरी ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह भारत का एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग मंदिर है, जहां भगवान शंकर समेत उनका पूरा परिवार एक मूर्ति में विराजमान है।

जिसमें भगवान शिव, देवी पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय नंदी बैल पर विराजमान हैं। इसके अलावा भगवान शंकर ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण किया हुआ है। यह नक्काशीदार मूर्ति मंदिर के शिखर पर सबसे ऊपरी भाग में सफेद पत्थरों में उकेरी गई है और मंदिर के दक्षिण द्वार से साफतौर पर देखी जा सकती है।

मंदिर के एक स्तंभ पर हाथी और नंदी की नक्काशीदार मूर्ति बनी हुई है। इस नक्काशी को हरी-हर मिलन (भगवान विष्णु और भगवान शंकर की भेंट) का प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही मंदिर के 24 स्तंभों पर यक्षों की मूर्ति उकेरी गई हैं जो यह दर्शाती हैं कि यक्षों ने पूरे मंदिर का भार अपने कंधों और पीठ पर उठाया है।

यह भी पढ़ें- भगवान शिव का 6वां ज्योतिर्लिंग 'भीमाशंकर', जहां शिवलिंग पर हमेशा चढ़ा रहता है चांदी का कवच

Slug  grishneshwar jyotirlinga maharashtra only temple entire shiva family idol

Picture Credits- AI Image

घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास

घृष्णेश्वर मंदिर का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा माना जाता है। इतिहास में इस मंदिर को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। 13वीं और 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत के दौरान इस मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा था।

इसका कई बार पुनर्निर्माण हुआ खासकर 16वीं शताब्दी में महान मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा मालोजी भोसले ने कराया था। मंदिर की वर्तमान संरचना का श्रेय 18वीं शताब्दी में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा कराया गया था।

यह भी पढ़ें- काशी विश्वनाथ: देश का इकलौता ज्योतिर्लिंग जहां एक ही पिंड में विराजे हैं शिव और शक्ति दोनों!

घृष्णेश्वर मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा

घृष्णेश्वर मंदिर की पौराणिक कथा भगवान शिव के एक सच्चे भक्त की भक्ति से जुड़ी है। माना जाता है कि भगवान शिव अपने इस भक्त से खुश होकर स्वयं दर्शन दिए। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, देवगिरी नाम के पर्वत पर ज्ञानी ब्राह्मण अपनी पत्नी सुदेहा के साथ रहते थे। दोनों ही भगवान शिव के परम भक्त थे, लेकिन संतानहीन होने के कारण अक्सर दुखी हो जाते थे।

संतान पाने के लिए सुदेहा ने अपने पति की दूसरी शादी अपनी ही सगी बहन घुश्मा से करवा दी। बड़ी बहन के कहे के मुताबिक घुश्मा रोजाना एक मिट्टी से निर्मित शिवलिंग बनाती और पानी में प्रवाहित कर देती। घुश्मा पूरी तरह से शिव की भक्ति में लीन हो गई थी, जिसके परिणाम स्वरूप उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई।

अपनी छोटी बहन की गोद में बच्चा देखने के बाद सुदेहा अंदर ही अंदर जलने लगी और अपनी बहन के बेटे को मार डाला। जब यह बात घुश्मा समेत परिवार के सभी सदस्यों को पता चली तो घुश्मा के चेहरे पर कोई भाव नहीं दिखाया दिया। वह रोज की तरह शिवलिंग को जल में प्रवाहित करने चली, लेकिन तभी उनकी भक्ति से खुश होकर भगवान शिव ने उन्हें खुद दर्शन दिए और बेटे की मौत का सच बताया।

घुश्मा ने भगवान शिव से अपनी गलती के लिए क्षमा करने की प्रार्थना की। भक्त की इतनी उदारता देखकर भगवान शिव काफी खुश हुए और वरदान मांगने को कहा। घुश्मा ने महादेव से वरदान मांगा कि वे यहीं भक्तों की रक्षा और दंपतियों को संतान का आशीर्वाद देने के लिए विराजमान हो जाएं। इसी कारण से मंदिर का नाम घृष्णेश्वर नाम पड़ा। जिन दंपतियों को संतान नहीं होती, वे यहां दर्शन के लिए आते हैं।

यह भी पढ़ें- दक्षिण का काशी: 11वें ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम का इतिहास और पौराणिक महत्व

यह भी पढ़ें- द्वारका का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग: पढ़ें भगवान शिव के 10वें स्वयंभू धाम का इतिहास और रहस्य

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।