डॉ. मनिष दाभाडे। आगामी विधानसभा चुनावों वाले राज्यों में सबसे अधिक चर्चा में है उत्तर प्रदेश, क्योंकि केंद्र की सत्ता का रास्ता इसी राज्य से होकर जाता है। ऐसे में, इस प्रदेश का विधानसभा चुनाव केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कौन-सा दल किन जातियों का बड़ा गठजोड़ बना सकता है। असली प्रश्न यह है कि नागरिक अपनी सरकार से क्या अपेक्षा रखता है: सुरक्षा, अवसर, सम्मान और विकास या फिर शिकायत दर्ज कराने, नौकरी पाने और सरकारी लाभ तक पहुंचने के लिए किसी जातीय संरक्षक की तलाश?

योगी आदित्यनाथ के पक्ष में मजबूत तर्क यही है कि उन्होंने राजनीति की दिशा को जातीय संरक्षण से निकालकर कानून के शासन की ओर मोड़ने का प्रयास किया है। अखिलेश यादव की राजनीति का केंद्रीय सूत्र ‘पीडीए’-पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक-है। सामाजिक न्याय का प्रश्न महत्वपूर्ण है, प्रतिनिधित्व भी जरूरी है, मगर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य को केवल जातियों के जोड़-घटाव से नहीं चलाया जा सकता।

राज्य तब आगे बढ़ता है जब हर नागरिक को यह भरोसा हो कि कानून उसकी जाति, पंथ, उपनाम देखकर नहीं बदलेगा। हाल की राजनीतिक भाषा में यह अंतर साफ दिखता है। 2017 से पहले प्रदेश में ‘रूल आफ माफिया’ था और अब ‘रूल आफ ला’ है। योगी का यह कथन केवल राजनीतिक नारा नहीं, शासन की स्पष्ट अवधारणा है। दूसरी तरफ अखिलेश यादव अपनी रणनीति को मुस्लिम-यादव आधार, पीडीए और युवाओं की नाराजगी के गठजोड़ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। एक ओर राज्य की प्रकृति का प्रश्न है। दूसरी ओर सत्ता तक पहुंचने के लिए सामाजिक समूहों की चुनावी गोलबंदी।

जाति का प्रश्न अप्रासंगिक नहीं है। उत्तर प्रदेश में वंचित रहे दलितों, पिछड़ों और कमजोर वर्गों को प्रतिनिधित्व, आरक्षण, सम्मान और सुरक्षा चाहिए, लेकिन सामाजिक न्याय और जातिवादी राजनीतिक संरक्षण एक ही बात नहीं। किसी दलित-पिछड़े परिवार को अन्याय के समय यह आश्वासन नहीं चाहिए कि चुनाव बाद उसकी जाति की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ेगी। किसी गरीब पिछड़े युवा को सरकारी नौकरी के लिए निष्पक्ष परीक्षा चाहिए, किसी मंत्री या स्थानीय दलाल तक पहुंच नहीं। यदि थाने निष्पक्ष हों, भर्ती पारदर्शी हो, राशन और आवास योजना बिचौलियों के बिना मिले, सड़क और बिजली हर गांव तक पहुंचे, तो जाति की राजनीतिक निर्भरता स्वाभाविक रूप से कमजोर होगी। यह जाति की सामाजिक वास्तविकता से आंख चुराना नहीं। नागरिक को जाति-आधारित राजनीतिक संरक्षकत्व से मुक्त करना है।

योगी शासन में 2017 से अब तक 9.5 लाख से अधिक सरकारी नियुक्तियां दी गई हैं और आगे भी बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन का लक्ष्य है। योगी सरकार का गैर-राजपत्रित समूह ‘ख’, ‘ग’ और ‘घ’ के अनेक पदों में साक्षात्कार की व्यवस्था समाप्त करने का फैसला भी महत्वपूर्ण रहा। साक्षात्कार वह स्तर था, जहां सिफारिश, पहचान और प्रभाव की आशंका सबसे अधिक होती थी। प्रतिनिधित्व के आंकड़े भी इस तर्क को बल देते हैं।

2024 में उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के अनुसार लोक सेवा चयन आयोग की 46,675 नियुक्तियों में 17,929 चयनित अभ्यर्थी ओबीसी वर्ग से थे यानी लगभग 38.41 प्रतिशत। एससी-एसटी के चयनितों को जोड़ दें तो आरक्षित वर्गों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से अधिक रही। यह आंकड़ा सभी सरकारी नियुक्तियों का समग्र चित्र नहीं है, फिर भी यह उस धारणा को चुनौती देता है कि वंचित समुदायों की प्रगति केवल उन्हीं दलों के माध्यम से संभव है, जो उनकी पहचान पर विशेष राजनीतिक दावा करते हैं।

पीडीए के पक्ष में आवाज उठाते हुए सपा को यह भी स्पष्ट करना होगा कि राज्य की संस्थाओं को जातीय प्रभाव से मुक्त कैसे रखा जाएगा? छोटी और अति-पिछड़ी जातियां बड़े सामाजिक समूहों के वर्चस्व से कैसे बचेंगी? भर्ती में प्रभावशाली परिवारों और जातीय नेटवर्क की भूमिका कैसे खत्म होगी? कानून का राज तभी विश्वसनीय बनता है, जब सत्तारूढ़ दल से निकटता भी न्यायिक प्रक्रिया से बचाव की ढाल न बन सके। भाजपा विधायक रहे अशोक चंदेल को 2019 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा मिली थी। कानून का राज विकास की पहली शर्त है।

जिस प्रदेश में जमीन पर कब्जे का डर हो, माफिया का दबदबा हो, निवेशक असुरक्षित हो और गरीब को न्याय पाने के लिए सिफारिश खोजनी पड़े, वहां विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। कानून की समानता छोटे व्यापारी को भी उतना ही बल देती है, जितना बड़े उद्यमी को देती है। इसी तरह वह जितनी आजादी किसी आम परिवार की महिला देती है, उतनी ही संपन्न घर की नारी को। योगी सरकार का जाति-आधारित राजनीतिक रैलियों और पुलिस दस्तावेजों में अनावश्यक जाति-उल्लेख को सीमित करने का कदम इसी दिशा में देखा जाना चाहिए। इसका अर्थ जातिगत अत्याचार को नकारना नहीं हो सकता-एससी/एसटी अत्याचार निवारण कानून में जाति की पहचान आवश्यक है, पर सामान्य आपराधिक प्रक्रिया में नागरिक की पहचान जाति से पहले उसके अधिकारों और विधिक स्थिति से होनी चाहिए।

योगी सरकार के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पेपर लीक, पुलिस की मनमानी जैसी शिकायतों पर उसे संवेदनशील और कठोर, दोनों होना होगा। कानून का शासन केवल कठोर कार्रवाई का नाम नहीं। उसमें न्यायिक प्रक्रिया, संविधान की मर्यादा और निर्दोष के अधिकारों की सुरक्षा अनिवार्य है। यही योगी माडल की विश्वसनीयता की कसौटी भी है। उत्तर प्रदेश के सामने विकल्प जाति को स्वीकार करने या उसे नकारने का नहीं है।

विकल्प यह है कि क्या जाति को स्थायी राजनीतिक खांचों में बदल दिया जाए या ऐसी संस्थाएं बनाई जाएं, जिनके सामने जाति की राजनीतिक उपयोगिता धीरे-धीरे कम हो? योगी आदित्यनाथ की राजनीति की ताकत इसी दूसरे रास्ते में है। अखिलेश यादव का राजनीतिक गणित पूछता है कि सत्ता तक पहुंचने के लिए किन समूहों को जोड़ा जाए? योगी माडल प्रश्न उठाता है कि सत्ता मिलने के बाद राज्य हर नागरिक को क्या देगा? उत्तर प्रदेश की जनता के लिए यही प्रश्न निर्णायक बनना चाहिए, क्योंकि बेहतर राजनीति वही है जिसमें जाति नहीं, नागरिकता और समीकरण नहीं, कानून का राज सर्वोपरि हो।

(लेखक जेएनयू में प्रोफेसर और ‘द इंडियन फ्यूचर्स’ के संस्थापक हैं)