एल आर गर्ग। नकली, मिलावटी, अधोमानक और एक्सपायरी डेट के खाद्य पदार्थों की बिक्री पर रोक लगाने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है, लेकिन चुनौती अब भी बनी हुई है। सवाल यह है कि नमूनों की जांच, छापेमारी और जुर्माने के बावजूद उपभोक्ताओं तक असुरक्षित खाद्य पदार्थ पहुंचने से कैसे रोका जाए।

खाद्य सुरक्षा की समस्या केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित नहीं है। बड़े कारोबारियों और कंपनियों के उत्पाद भी जांच के दायरे में आते हैं। ऐसे में निगरानी का दायरा बढ़ाने के साथ कार्रवाई की जवाबदेही तय करना भी आवश्यक है।

खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ई-कामर्स मंचों पर उत्पादों की ऑनलाइन जानकारी में गड़बड़ियां पहचानने के लिए एआई आधारित उपकरण का परीक्षण कर रहा है।

डार्क स्टोर में खाद्य पदार्थों के भंडारण का तापमान और कोल्ड चेन बनाए रखने के साथ क्लाउड किचन में साफ-सफाई की जांच पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

एनालॉग पनीर को पनीर के नाम से बेचने पर रोक लगाने के लिए नियमों में संशोधन का मसौदा जारी किया गया है। अधिक वसा, नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थों पर चेतावनी चिह्न लगाने की व्यवस्था पर भी काम हो रहा है।

एफएसएसएआई के अनुसार, उसे हर महीने करीब पांच से छह हजार शिकायतें मिल रही हैं। देश में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की संख्या तीन हजार से अधिक है और करीब एक हजार पदों पर भर्ती की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

एआई खतरे के आधार पर जांच और बेहतर प्रयोगशालाएं निगरानी को प्रभावी बना सकती हैं। लेकिन तकनीक तभी कारगर होगी, जब गड़बड़ी मिलने पर समयबद्ध कार्रवाई हो।

रिक्त पद भरने, शिकायतों के निपटारे की निगरानी करने और बार-बार नियम तोड़ने वालों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता है। खाद्य सुरक्षा की सफलता केवल छापेमारी और जुर्माने के आंकड़ों से नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं तक सुरक्षित खाद्य पदार्थ पहुंचने से तय होगी।

केंद्र सरकार के अनुसार, वर्ष 2022-23 से 2024-25 के बीच देश में खाद्य पदार्थों के 5,18,559 नमूनों की जांच की गई। इनमें 88,192 मामलों में जुर्माना लगाया गया 3,614 मामलों में दोषसिद्धि हुई और 1,161 लाइसेंस रद किए गए।

ये आंकड़े कार्रवाई का दायरा बताते हैं, लेकिन सभी मामलों को नकली खाद्य पदार्थों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। इनमें अधोमानक, असुरक्षित और गलत लेबल वाले उत्पादों से संबंधित मामले भी शामिल हो सकते हैं। खाद्य कारोबारियों की बड़ी संख्या और राज्यों पर जांच की जिम्मेदारी के कारण निगरानी करना आसान नहीं है।

नमूने लेने से लेकर प्रयोगशाला की रिपोर्ट और कानूनी कार्रवाई पूरी होने तक समय लगता है। ऐसे में बार-बार नियम तोड़ने वालों के विरुद्ध समयबद्ध कार्रवाई जरूरी है।

साथ ही, नोटिस या शिकायत को दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अंतिम निष्कर्ष जांच और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए।

एल. आर. गर्ग,
पूर्व खाद्य सुरक्षा आयुक्त
नई दिल्ली