डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के लगभग चार हजार ग्राहकों की निजी जानकारी जैसे कि नाम, मोबाइल नंबर, जन्मतिथि, ईमेल, आवासीय पता, ग्राहक पहचान संख्या और ऋण से जुड़े विवरण डार्क वेब पर सामने आने की खबर ने देश की बैंकिंग व्यवस्था के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। जिस बैंक पर करोड़ों लोग अपनी जीवनभर की बचत के लिए भरोसा करते हैं, यदि उसके ग्राहकों की व्यक्तिगत जानकारी सुरक्षित नहीं रह पाती तो डिजिटल बैंकिंग पर लोगों का विश्वास कैसे बना रहेगा?

यह घटना केवल तकनीकी सुरक्षा से जुड़ा मामला नहीं है। इसका सीधा संबंध ग्राहकों की गोपनीयता, वित्तीय सुरक्षा और बैंकों की जवाबदेही से है। व्यक्तिगत जानकारी का दुरुपयोग भविष्य में वित्तीय धोखाधड़ी का कारण बन सकता है। किसी साइबर अपराधी के पास ग्राहक का नाम, मोबाइल नंबर, जन्मतिथि और ऋण आवेदन का विवरण हो तो वह बैंक अधिकारी बनकर विश्वास हासिल करने का प्रयास कर सकता है। वह ग्राहक को ऋण स्वीकृति, केवाईसी अपडेट या खाते की सुरक्षा के नाम पर धोखा दे सकता है। इस प्रकार निजी जानकारी की चोरी आर्थिक नुकसान का रास्ता खोल सकती है।

आज बैंक केवल जमा और ऋण देने वाले संस्थान नहीं रह गए हैं। उनके पास ग्राहकों की आय, संपत्ति, व्यवसाय, पारिवारिक विवरण, लेनदेन और वित्तीय व्यवहार से जुड़ी व्यापक जानकारी रहती है। यह जानकारी बैंकिंग सेवाओं को सुविधाजनक बनाती है, लेकिन इसके गलत हाथों में पहुंचने की कीमत बहुत अधिक हो सकती है। दूसरे देशों का अनुभव हमारे लिए उपयोगी सबक प्रस्तुत करता है। अमेरिका में 2019 में कैपिटल वन बैंक से जुड़ी एक बड़ी डाटा चोरी सामने आई थी।

इससे अमेरिका के लगभग 10 करोड़ और कनाडा के लगभग 60 लाख लोग प्रभावित हुए थे। इससे स्पष्ट होता है कि साइबर सुरक्षा में कमजोरी को केवल तकनीकी चूक मानकर अनदेखा नहीं किया जा सकता। बैंक प्रबंधन की जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यूरोपीय संघ ने व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा के गंभीर जोखिम वाले डाटा उल्लंघन की सूचना नियामक को सामान्यतः 72 घंटे के भीतर देने की व्यवस्था की है। तकनीकी सेवाएं किसी बाहरी कंपनी को सौंप देने से बैंक की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।

सिंगापुर ने भी फिशिंग धोखाधड़ी के कुछ निर्धारित मामलों में बैंकों और दूरसंचार कंपनियों की साझा जिम्मेदारी तय करने वाला ढांचा विकसित किया है। इसका उद्देश्य केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करना नहीं, बल्कि वित्तीय संस्थानों को धोखाधड़ी रोकने के लिए अधिक जिम्मेदार बनाना है। भारत ने डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और 2025 में अधिसूचित नियमों के माध्यम से महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हालांकि डाटा उल्लंघन की सूचना देने सहित कई प्रमुख प्रविधानों का लागू होना अभी शेष है।

अब आवश्यकता इसकी है कि नियामकीय रिपोर्टिंग के साथ प्रभावित ग्राहक को भी समय रहते उपयोगी जानकारी मिले।

सबसे पहला सुधार ग्राहकों को सूचना देने की व्यवस्था में होना चाहिए। प्रत्येक बैंक को संभावित डाटा उल्लंघन की पुष्टि होने पर प्रभावित ग्राहकों को व्यक्तिगत रूप से सूचित करना चाहिए। उन्हें बताया जाए कि इससे क्या खतरा हो सकता है और ग्राहक को किन सावधानियों की आवश्यकता है। स्वतंत्र साइबर सुरक्षा परीक्षण होना चाहिए। बैंक नियमित रूप से बाहरी विशेषज्ञों से अपने डिजिटल सिस्टम की जांच कराएं।

संवेदनशील जानकारी को सुरक्षित तकनीक से संरक्षित किया जाए और कर्मचारियों एवं सेवा प्रदाताओं को केवल आवश्यक डाटा तक ही पहुंच मिले। ऋण आवेदन और डिजिटल केवाईसी से जुड़े रिकार्ड के उपयोग, संग्रहण और निस्तारण की स्पष्ट नीति होनी चाहिए। किसी बाहरी एजेंसी की सुरक्षा में कमजोरी पाए जाने पर उसकी जिम्मेदारी भी तय हो। रिजर्व बैंक को बैंकों के लिए एक साझा साइबर घटना रिपोर्टिंग और सीखने की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।

इससे एक बैंक पर हुए हमले के अनुभव से दूसरे बैंक भी अपनी सुरक्षा मजबूत कर सकेंगे। बड़े डाटा उल्लंघन के बाद स्वतंत्र जांच का सार्वजनिक सारांश उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जिसमें ग्राहकों की गोपनीयता बनाए रखते हुए घटना के कारण और सुधारात्मक कदम बताए जाएं। ग्राहकों को भी अनजान व्यक्ति को ओटीपी, यूपीआई पिन या इंटरनेट बैंकिंग पासवर्ड नहीं बताना चाहिए। संदिग्ध लेनदेन होने पर तुरंत बैंक को सूचित करें और साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं।

भारत ने डिजिटल भुगतान और वित्तीय समावेशन में उल्लेखनीय प्रगति की है। अब उसी गंभीरता से ग्राहकों की जानकारी और उनके अधिकारों की रक्षा करनी होगी। एसबीआइ की घटना को किसी एक बैंक की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने के बजाय पूरे बैंकिंग क्षेत्र के लिए चेतावनी के रूप में देखना चाहिए। लोगों ने बैंकों को केवल अपना पैसा नहीं सौंपा, अपनी पहचान और निजी जीवन से जुड़ी संवेदनशील जानकारी भी सौंपी है। बैंकिंग व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल मुनाफा या डिजिटल लेनदेन की संख्या नहीं, बल्कि ग्राहकों का विश्वास और उनकी जानकारी की सुरक्षा भी होनी चाहिए।

(लेखक जेएनयू में प्रोफेसर हैं)