कोयला खदानों में अब नहीं होंगे हादसे, आइआइटी बीएचयू ने तैयार किया ब्लास्ट फ्री तकनीक
आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने खदानों से कोयला निकालने के लिए ब्लास्ट-फ्री तकनीक विकसित की है। यह नई तकनीक दुर्घटनाओं, ...और पढ़ें

आईआईटी बीएचयू की नई ब्लास्ट-फ्री तकनीक से कोयला खदानों में सुरक्षा और आत्मनिर्भरता।
HighLights
आईआईटी बीएचयू ने विकसित की ब्लास्ट-फ्री कोयला खनन तकनीक।
दुर्घटनाओं, पर्यावरण क्षति को रोकेगी, ऊर्जा व लागत बचाएगी।
एनसीएल के सहयोग से देश को खनन में आत्मनिर्भर बनाएगी।
शैलेश अस्थाना, जागरण, वाराणसी। अब खदानों से काेयला निकालने के लिए डायनामाइट विस्फोट नहीं किया जाएगा। इससे प्राय: होने वाली दुर्घटनाओं में निरीह श्रमिकों की मौत के साथ ही पर्यावरण को होने वाले नुकसान से भी बचा जा सकेगा। कोयला कंपनियां सीधे तापीय विद्युत परियोजनाओं के लिए उनके उपयुक्त 50 मिमी साइज के काेयले का निर्यात कर सकेंगी।
इनसे कोयले की बड़ी चट्टानों की ढुलाई, फिर छोटे टुकड़ों में तुड़ाई, क्रशिंग और अनियंत्रित आकार की छंटाई आदि के खर्च भी बच जाएंगे। इससे पर्यावरण के साथ ही उर्जा, श्रम, समय और लागत व्यय में कमी आएगी। यह संभव हो सकेगा आइआइटी बीएचयू के खनन अभियंत्रण विभाग के विज्ञानियों द्वारा तैयार नए ब्लास्ट फ्री आप्टिमाइज़्ड सरफेस माइनर कटिंग ड्रम से।
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एडवांस्ड न्यूमेरिकल सिमुलेशन और इंजीनियरिंग टूल्स का उपयोग करके तैयार किए गए इस पूर्णतया स्वदेशी सरफेस माइनर से माइनिंग आपरेशन के दौरान ही 50 मिमी से कम माप के कोयले का नियंत्रित उत्पादन किया जा सकता है। प्रधान अन्वेषक प्रो. संजय शर्मा ने बताया कि अब ऐसे अनुसंधानों की आवश्यकता है जिससे उर्जा संरक्षण नारों से बढ़कर उत्पादों की ओर बढ़े।
कोल खदानों से कोयला निकालने के लिए विस्फोट अब नहीं करना होगा। विस्फोट से होने वाले कंपन से पशु-पक्षियों व पृथ्वी की सतह को होने वाले नुकसान, दुघर्टना में श्रमिकों के घायल होने या प्राण-क्षति, फिर बड़े टुकड़ों की ढुलाई, तुड़ाई, क्रशिंग और अनुपयोगी साइज की छटाई आदि के नुकसान और उनमें लगने वाली लगभग 50 प्रतिशत उर्जा की बचत होगी। यह माइनर कटिंग ड्रम खदानों से ही कोयले को 50 मिमी के समान आकार में काटकर निकाल लेगा।
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नादर्न कोल लिमिटेड ने दी अनुसंधान राशि
शोध अध्ययन के परियोजना प्रभारी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डा. बीएनवी शिवा प्रसाद बताया कि 50 मिमी के काेयले तापीय परियोजनाओं के लिए उपयुक्त होते हैं। नादर्न कोल लिमिटेड से आइआइटी बीएचयू के साथ हुए समझौते के तहत एनसीएल ने इस समस्या के समाधान की पहल की थी, कंपनी द्वारा एक करोड़ रुपये अनुसंधान राशि भी उपलब्ध कराया गया। सभी प्रकार के प्रयोगों और प्रेक्षणों में यह मशीन सफल सिद्ध हो चुकी है। अब एनसीएल इनका प्रयोग अपनी खदानों में कर सकेगा।

प्रधान अन्वेषक प्रो. संजय शर्मा और असिस्टेंट प्रोफेसर डा. बीएनवी शिवा प्रसाद। (फाइल फोटो)
कोयला खोदाई में देश बनेगा आत्मनिर्भर
प्रो. शर्मा ने बताया कि अभी एनसीएल के सात ओपन कास्ट परियोजनाओं में 14 सरफेस माइनर्स लगे हुए हैं। जिनसे कोयला मुख्य रूप से 100 मिमी से कम साइज कैटेगरी में बेचा जाता है। अभी तक बाहर से मंगाए गए कटिंग ड्रम कान्फिगरेशन अक्सर भारतीय कोयला परतों के लिए पूरी तरह से सही नहीं होते हैं, क्योंकि इनमें मजबूती, भूवैज्ञानिक इंटरबैंड और घिसाव की क्षमता में काफी अंतर होता है।
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कटिंग की परफार्मेंस और उससे निकलने वाले कोयले का आकार कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे ड्रम और पिक की बनावट, पिक को लगाने का तरीका, ड्रम की गति, मशीन के आगे बढ़ने की दर, कट की गहराई, और कोयले व उससे जुड़ी परतों के जियो-मैकेनिकल गुण।
संस्थान द्वारा तैयार यह सरफेस माइनर भारतीय कोयला खदानों के लिए पूरी तरह से उपयुक्त है और आधुनिक भी। इससे भारतीय सरफेस माइनिंग में कोयले के एक समान टुकड़े प्राप्त करने से जुड़ी एक बड़ी आपरेशनल चुनौती का समाधान होगा। इस पूर्ण स्वदेशी मशीन के विकास से देश इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर भी बनेगा।
