सूर्य ग्रहण खत्म होते ही क्यों किया जाता है स्नान? पुराणों में लिखे इस सवाल का सही जवाब आप भी पढ़ें
सूर्य ग्रहण के बाद स्नान करना धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे नकारात्मक ऊर्जा और अशुद्धियों से मुक्ति मि ...और पढ़ें

सूर्य ग्रहण के बाद स्नान क्यों है जरूरी, जानें पौराणिक महत्व और कारण (Picture Credit: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सूर्य ग्रहण एक ऐसी खगोलीय घटना मानी जाती है जिसका सीधा संबंध हमारे जीवन में भी पड़ता है। यह तब होता है जब सूरज, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में आ जाते हैं। जब चांद, सूरज और पृथ्वी के बीच आ जाता है और पृथ्वी पर यह अपनी छाया डालता है। इससे सूरज का आंशिक या पूर्ण ग्रहण लगता है। इस घटना को सूर्य ग्रहण कहा जाता है।
इसका सीधा असर हमारे जीवन और सभी राशियों पर भी पड़ता है। यही नहीं इस दौरान कुछ कामों की मनाही होती है और कुछ नियमों का पालन करने की सलाह दी जाती है।
ऐसे ही एक नियम है सूर्य ग्रहण के समापन के बाद स्नान करना। ऐसा कहा जाता है कि आपको सूर्य ग्रहण समाप्त होने के तुरंत बाद स्नान करना चाहिए। आइए आपको बताते हैं इसके कारणों के बारे में और ऐसा क्यों कहा जाता है।
ग्रहण के बाद स्नान करना जरूरी क्यों होता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य ग्रहण के समय सूर्य देव पर राहु का प्रभाव होता है और राहु की छाया की वजह से वातावरण में अशुद्धि हो जाती है।
इसके प्रभाव से कुछ नकारात्मक ऊर्जाएं भी आस-पास सक्रिय हो जाती हैं। इसी वजह से जिस समय सूर्य ग्रहण लगता है उस दौरान कुछ विशेष कामों को करने से मन किया जाता है जिसमें पूजा-पाठ, भोजन और दैनिक गतिविधियों को लेकर कई तरह के नियम शामिल होते हैं। वहीं ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान करना शरीर को साफ करने के साथ आस पास की अशुध्दियों को दूर करना भी होता है।
ऐसी मान्यता है कि सूर्य ग्रहण के दौरान व्यक्ति के शरीर और आस-पास के वातावरण पर कुछ अशुभ प्रभाव पड़ सकते हैं क्योंकि इस दौरान सूर्य की किरणों में भी कुछ ऐसे तत्व मुजूद होते हैं जो शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। इसी वजह से सूर्य ग्रहण के समाप्त होते ही स्नान करने की सलाह दी जाती है।
खबरें और भी
पुराणों में सूर्य ग्रहण को लेकर कही गई है ये बात
हिंदू धार्मिक परंपरा में किसी भी ग्रहण का संबंध राहु-केतु की कथा से जोड़ा जाता है। समुद्र मंथन के दौरान जब भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृत बांटना शुरू किया, तब स्वरभानु नामक असुर देवताओं के बीच बैठकर अमृत पीने लगा। सूर्य और चंद्रमा ने उसकी पहचान करके भगवान विष्णु को इसके बारे में बता दिया। उस समय विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से उस असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया।
अमृत का स्पर्श हो जाने के कारण दोनों ने राहु और केतु का रूप धारण किया जिन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। उस समय से ही सूर्य और चंद्रमा के ऊपर राहु के प्रभाव के कारण ग्रहण होता है।
सूर्य ग्रहण समाप्त होने पर स्न्नान की अनिवार्यता को लेकर स्कंद पुराण और पद्म पुराण में भी बताया गया है। यह शरीर, मन और वातावरण की शुद्धि के लिए एक अच्छा माध्यम माना जाता है।
यह भी पढ़ें- सूर्य ग्रहण के बाद घर की निगेटिव एनर्जी कैसे दूर करें? अपनाएं ये 5 अचूक तरीके
यह भी पढ़ें- सूर्य ग्रहण में क्यों नहीं छूनी चाहिए भगवान की मूर्ति? जानिए सूतक काल और नकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा रहस्य
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।