एक ऐसे समय जब मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ विपक्ष संकीर्ण राजनीतिक कारणों से मोर्चा खोले हुए है और काकरोच जनता पार्टी भी दिल्ली में धरना-प्रदर्शन के लिए उतर आई, तब 124 पूर्व अधिकारियों का जनता के नाम जारी किया गया पत्र समूचे देश के ध्यानाकर्षण की मांग करता है।

इसलिए करता है, क्योंकि भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय विदेश सेवा के इन पूर्व अधिकारियों के इतने बड़े समूह ने अपने पत्र में कुछ ऐसी बातों का उल्लेख किया है, जिनकी अनदेखी करना कठिन है। उनका यह कहना बिल्कुल सही है कि संदेह प्रमाण का पर्याय नहीं हो सकता। विडंबना यह है कि एसआईआर को लेकर जो संदेह खड़े किए जा रहे हैं, वे तिल का ताड़ बनाने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं।

एसआईआर जैसी व्यापक एवं गहन प्रक्रिया में छोटी-मोटी त्रुटियां होना स्वाभाविक हैं, लेकिन इन त्रुटियों को वोट चोरी का नाम देना और लोकतंत्र को खत्म करने की कोशिश करार देना जनता को गुमराह करना ही है। इस तरह की कोशिश न केवल संस्थाओं की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाती है, बल्कि लोकतंत्र के प्रति जनता के भरोसे को कमजोर करने का भी काम करती है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और मुख्य चुनाव आयुक्त भी संवैधानिक पद पर आसीन हैं।

यदि विपक्ष के पास एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर उनके खिलाफ कोई ठोस प्रमाण हैं तो उसे सड़कों पर उतरने के स्थान पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जाना चाहिए। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट एसआईआर के विभिन्न पहलुओं की सुनवाई कर रहा है। विपक्ष को यह समझना होगा कि किसी झूठ को बार-बार दोहराने से वह सत्य नहीं हो जाता।

पूर्व नौकरशाहों ने अपने पत्र में इसका भी उल्लेख किया है कि उनमें से अनेक चुनाव प्रक्रिया के संचालन में शामिल रहे हैं और उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब चुनावों में वास्तव में बड़े पैमाने पर धांधली होती थी। यह न केवल विचित्र, बल्कि हास्यास्पद भी है कि अभी हाल तक मतदाता सूचियों में तमाम अशुद्धियों और विशेष रूप से फर्जी वोटरों के शामिल होने की शिकायत करने वाले विपक्षी दल इन अशुद्धियों को दूर करने की प्रक्रिया के खिलाफ अपुष्ट आरोपों की आड़ में चुनाव आयोग के विरुद्ध माहौल बनाए हुए हैं।

ऐसा लगता है कि वे एसआईआर की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट पर भी भरोसा करने के लिए तैयार नहीं हैं। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। यदि लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्था पर भी भरोसा नहीं करेंगे तो वे अपनी विश्वसनीयता ही खोएंगे। विपक्ष को पूर्व नौकरशाहों के पत्र पर भी आत्मचिंतन करना चाहिए और इसके पहले लिखे गए पूर्व न्यायाधीशों के पत्र पर भी।