विचार: सेवा भाव ने बनाया मोदी को सफल नेता
एक राजनेता के रूप में मोदी इसलिए सफल हैं, क्योंकि सेवा उनका मूलमंत्र है और यही लोगों को उनसे जोड़ती है।
HighLights
1987 में गुजरात में भीषण सूखे के दौरान मोदी ने 'न्याय यात्रा' की
यात्रा ने राहत कार्यों में भ्रष्टाचार उजागर किया, मजदूरों को जागरूक किया
मोदी की 'न्याय यात्रा' ने सेवा-आधारित नेतृत्व की नींव रखी
उदय माहूरकर। साल 1987 की बात है। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस का दबदबा था। उस समय भाजपा के लोकसभा में केवल दो सदस्य थे। ऐसे समय में अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकार किरीटभाई भट्ट ने गुजरात भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश संगठन सचिव नरेन्द्र मोदी से मिलने की इच्छा जताई। हम अहमदाबाद स्थित भाजपा के खानपुर कार्यालय में उनसे मिले। उनसे मिलकर बाहर निकलते समय किरीटभाई ने मुझसे कहा, 'मोदी बहुत आगे जाएंगे। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों की उन्हें अच्छी समझ है।'
किरीटभाई वामपंथी विचारों के बावजूद मेरे लिए पत्रकारिता के आदर्श रहे हैं। 1987 के अंत तक देश और गुजरात की राजनीतिक स्थिति बदलने लगी थी। बोफोर्स विवाद से राजीव गांधी सरकार को राजनीतिक नुकसान हुआ। वहीं गुजरात में अमरसिंह चौधरी की सरकार गुटबाजी और जनता में बढ़ते असंतोष से जूझ रही थी। इसी बीच गुजरात में सबसे भीषण सूखा पड़ा। इसकी वजह से पीने का पानी पहुंचाने के लिए ट्रेनों का इस्तेमाल करना पड़ा। चारे की कमी के कारण बड़ी संख्या में मवेशियों की मौत होने लगी।
राज्य के 19 में से 17 जिले सूखे से प्रभावित थे। पशुओं के लिए दूसरे राज्यों से चारा मंगाना पड़ा। करीब सात लाख पशुओं को पशु शिविरों में रखा गया। राहत कार्यों के जरिये करीब 12 लाख मजदूरों को रोजगार देने की योजना थी, पर मजदूरों को मजदूरी समय पर नहीं मिलती थी। राजीव गांधी सरकार ने राहत के लिए करीब 65 करोड़ रुपये मंजूर किए, मगर सवाल था कि क्या यह पैसा वास्तव में दूर-दराज के गांवों तक पहुंच भी रहा है? इसी दौर में मोदी ने ‘न्याय यात्रा’ का विचार सामने रखा। इस यात्रा के तीन उद्देश्य थे। पहला, यह जांचना कि राहत कार्यों में काम करने वाले मजदूरों को सरकार के निर्देशों के मुताबिक मजदूरी मिल रही है या नहीं। दूसरा था मजदूरों, किसानों और आदिवासी समुदायों को उनके अधिकारों के बारे में जानकारी देना।
तीसरा था भ्रष्टाचार और विसंगतियों से जुड़े सुबूत इकट्ठा कर उन्हें राज्य के अधिकारियों के सामने रखकर समाधान की मांग करना। इस यात्रा में चार रथ थे। हर रथ एक जीप पर बनाया गया था। जीपों को पर्दों से इस तरह तैयार किया गया था कि वे चलती-फिरती सभा के मंच की तरह काम कर सकें। यह मोदी का एक नया प्रयोग था। यह 40 दिन की यात्रा थी, जो गुजरात के चार अलग-अलग कोनों से शुरू हुई-गोधरा, पालनपुर, जामनगर और भुज से। इसका नेतृत्व केशुभाई पटेल, शंकरसिंह वाघेला, सुरेशभाई मेहता और काशीराम राणा/मकरंद देसाई ने किया।
यात्रा 6 दिसंबर को आंबेडकर जी की पुण्यतिथि पर शुरू हुई और 12 जनवरी, 1988 को स्वामी विवेकानंद जी की जयंती तक चली। रथ राहत शिविरों तक जाते और सूखे के दौरान लोगों को उनके अधिकारों के बारे में बताते। इससे कांग्रेस सरकार के खिलाफ लोगों में असंतोष पनपा और यात्रा को जनसमर्थन मिलने लगा। यात्रा के दौरान कार्यकर्ता मजदूरों को मूंगफली, चना और गुड़ बांटते थे। इससे उनमें भरोसा पैदा हुआ। यात्रा के दौरान मोदी पशुओं की स्थिति को लेकर भी चिंतित थे। उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं को ‘बैलबरास’ नाम से पशुओं के लिए शेड बनाने के लिए प्रेरित किया। किसान अपने बैलों को वहां छोड़ गए और सूखा खत्म होने पर बैलों को ले गए और खेती करने लगे।
जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तब भी वह नियमित रूप से पशु स्वास्थ्य शिविर लगवाते थे। इन शिविरों में गायों और भैंसों की आंखों के मोतियाबिंद का भी इलाज किया जाता था। उक्त यात्रा के दौरान सरकार की जो नाकामियां दिखीं, उन्हें सामने लाया गया। इससे सरकार और अधिकारियों पर दबाव बढ़ने लगा। यात्रा का असर यह हुआ कि मजदूर ठेकेदारों और अधिकारियों से अपनी मजदूरी के बारे में सवाल करने लगे। अमरसिंह चौधरी सरकार को भी कार्रवाई करनी पड़ी। इस यात्रा से भाजपा को ग्रामीण इलाकों में अपना आधार मजबूत करने में मदद मिली। उस समय भाजपा को मुख्य रूप से शहरी मध्य वर्ग की पार्टी के रूप में देखा जाता था, लेकिन धीरे-धीरे मजदूरों, किसानों और आदिवासी समुदायों के बीच भी उसका समर्थन बढ़ने लगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सेवा पर आधारित मोदी के इस माडल ने लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव बनाने में मदद की। इसी वजह से 1989 के बाद जब मोदी ने संगठनात्मक और बाद में राज्य में प्रशासनिक जिम्मेदारी तथा फिर प्रधानमंत्री के रूप में भूमिका निभाई, तब से भाजपा गुजरात में लोकसभा या विधानसभा का चुनाव नहीं हारी। न्याय यात्रा वास्तव में मोदी के राजनीतिक और सामाजिक सोच का एक खाका थी, जिसकी बुनियाद सार्वजनिक जीवन और राजनीति के माध्यम से लोगों की सेवा पर आधारित थी। इसने यह सुनिश्चित किया कि सरकार की योजनाओं और सुविधाओं का पूरा लाभ उन लोगों तक पहुंचे, जिनके लिए वे हैं। साथ ही उन बिचौलियों को हटाया गया, जो सरकारी धन को बीच में ही रोक लेते हैं या उसका गलत इस्तेमाल करते हैं और नागरिकों को उन्हें मिलने वाले लाभों के बारे में जागरूक किया गया। पिछले 25 वर्षों से यह सोच उनके काम का अभिन्न हिस्सा रही है। नरेन्द्र मोदी इसीलिए सफल हैं, क्योंकि सेवा से ज्यादा लोगों को जोड़ने वाली कोई चीज नहीं है।
(स्तंभकार वरिष्ठ पत्रकार एवं जाने-माने लेखक हैं)
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