विकास सिंह। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य भारत के सामने एक बड़ा सार्वजनिक सपना है। आजादी के बाद के दशकों में भारत ने अपना ध्यान काफी हद तक नियंत्रित और सतर्क अर्थव्यवस्था पर रखा, जबकि दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों ने तेजी से औद्योगिकीकरण करके अपनी आय में बड़ा इजाफा किया।

1991 के सुधारों ने भारत की दिशा बदली, पर जमीन की व्यवस्था, अदालती फैसलों और उद्योगों में रोजगार की कमी की वजह से हम दूसरे देशों से पीछे रह गए। अब आने वाले समय में भारत के पास इस अंतर को पाटने का एक शानदार मौका है। बीते कुछ सालों में देश के बुनियादी ढांचे में काफी प्रगति हुई है। सरकार ने सड़क, रेल, बिजली और इंटरनेट जैसे बुनियादी ढांचे में काफी पैसा लगाया है।

बजट में इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए लगातार बड़ा हिस्सा दिया जा रहा है। डिजिटल पेमेंट्स और सस्ते इंटरनेट ने आम लोगों को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा है। ये तमाम बातें निवेशकों को आकर्षित करती हैं और विकास का एक पक्का आधार तैयार करती हैं।

लेकिन सड़क और इंटरनेट होना ही काफी नहीं है, असली काम इनका इस्तेमाल करके बेहतर कारखाने और रोजगार बनाना है। किसी भी कारखाने को लगाने में आने वाली देरी सबसे बड़ी रुकावट है। जमीन की खरीद, पर्यावरण की मंजूरी और बिजली का कनेक्शन मिलने में महीनों लग जाते हैं। अलग-अलग राज्यों में इसका समय अलग होता है। निवेशक किसी राज्य के वादे से ज्यादा वहां की आसान प्रक्रिया को देखते हैं।

भारत की प्रशासनिक व्यवस्था में अलग-अलग विभाग हैं और सभी जगह से क्लीयरेंस लेने में देरी होती है। नई सड़क या बांध का उद्घाटन करना नेताओं के लिए आसान और दिखने वाला काम है, लेकिन जमीन के विवाद सुलझाना और कानूनी प्रक्रिया को आसान बनाना ज्यादा वक्त लेता है।

जमीन का मामला सबसे पेचीदा है। गलत या पुराने रिकार्ड होने से जमीन के विवाद बढ़ते हैं, जिससे औद्योगिक विकास रुका रहता है। इसी तरह मजदूर कानून को आसान बनाने की जरूरत है ताकि कंपनियां ज्यादा से ज्यादा लोगों को पक्की नौकरी दे सकें

। सिर्फ नई सड़कें और पुल बनाने से बात नहीं बनेगी। हमारे पास पढ़े-लिखे, कुशल और स्वस्थ वर्कर भी होने चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य और स्किल ट्रेनिंग पर ध्यान देना उतना ही जरूरी है जितना कंक्रीट के ढांचे पर खर्चा करना। हर साल भारत में लगभग एक करोड़ से ज्यादा युवा रोजगार की तलाश में आते हैं। सभी को सरकारी नौकरी या आईटी क्षेत्र में जगह नहीं मिल सकती।

इसके लिए मैन्यूफैक्चरिंग, टूरिज्म, लॉजिस्टिक्स और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों को आगे आना होगा। छोटे उद्योगों को बड़ा बनने के लिए मदद चाहिए। दक्षिण कोरिया ने पढ़ाई, नई तकनीक और निर्यात पर ध्यान देकर तरक्की की थी।

भारत को भी आने वाले दो दशकों में इसी आधार पर काम करना होगा। अगर हम सुधारों को सही ढंग से लागू कर सकें, तो 2047 तक भारत सच में एक विकसित और समृद्ध देश बन सकता है।
विकास सिंह, विशेषज्ञ, समग्र विकास