विचार: माता-पिता के रहते भी अनाथ होते बच्चे
इन दिनों पति और बच्चों के रहते कुछ महिलाओं का दूसरे पुरुष के साथ शादी करने के मामले बढ़ने लगे हैं।
HighLights
महिलाएँ परिवार छोड़ नए रिश्तों में जा रही हैं।
मोबाइल फोन की भूमिका इन रिश्तों में प्रमुख है।
बच्चे माता-पिता के होते हुए भी अनाथ हो रहे हैं।
क्षमा शर्मा। हाल में एक वीडियो देखा, जिसमें एक महिला मांग में सिंदूर भरे, काजल, बिंदी और नेल पालिश लगाए, सिर ढके हुए है। साथ में उसका पुरुष मित्र खड़ा है। एक यूट्यूबर उससे सवाल करता है-तो आप अपने पति को छोड़ आई हैं? महिला कहती है-हां। यूट्यूबर फिर पूछता है-कारण क्या था? महिला कहती है-पति से प्यार नहीं करती थी। जिससे प्यार करती थी, उसके साथ आ गई। रिपोर्टर पूछता है-सुना है, आपके कई बच्चे हैं। महिला कहती है-हां, हैं। रिपोर्टर पूछता है-तो उनका क्या होगा? महिला कहती है-जो हो, सो हो। जिसके बच्चे हैं, वह पाले। एक दूसरे वीडियो में मुस्लिम महिला सिंदूर लगाए दिखाई देती है। लड़के की मां उसे भला-बुरा कह रही है। रिपोर्टर लड़के से कहता है-आपकी मां बहुत नाराज हो रही हैं।
क्या इन्हें साथ रखेंगे? लड़का कहता है-हां, रखेंगे। एक अन्य वीडियो में देखा कि एक सत्रह साल का लड़का चालीस साल की महिला से मंदिर में शादी कर लेता है। उसे घर लाता है तो घर वाले महिला को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। मां कहती है कि यह उम्र में मुझसे कुछ ही छोटी है, मैं इसे अपनी बहू कैसे मान लूं? इस महिला के कई बच्चे भी हैं। इस पर महिला कहती है कि उनकी देखभाल पति करेगा। इन सभी महिलाओं की कहानियों में मोबाइल की प्रमुख भूमिका है। वे बताती हैं कि मिस्ड काल आया था। बातचीत होने लगी, फिर प्यार हो गया।
इनसे अलहदा ऐसी कहानियां भी प्रकाश में आई हैं, जहां कोई महिला अपने दामाद के साथ चली गई। उसने अपनी लड़की के भविष्य के बारे में नहीं सोचा। एक महिला तो लड़की की शादी तय होने के बाद होने वाले दामाद से बातचीत करने लगी, फिर उसी के साथ रहने पर अड़ गई। किसी को अपने समधी से मोहब्बत हो गई। वह उसके साथ रहने पर अड़ गई। इन सभी कहानियों में एक जैसी बात जो सुनाई देती है, वह यह है कि शादी इनकी नहीं, इनके माता-पिता की मर्जी से हुई थी। इन्होंने जीवन में जिम्मेदारियों के अलावा प्यार जैसी चीज को कभी महसूस ही नहीं किया। इसलिए जैसे ही लगा कि किसी से प्यार हो गया है तो सब कुछ छोड़कर उसके साथ हो लीं।
यह देखना भी दिलचस्प है कि इनमें से शायद ही किसी महिला का अपने पति से संबंध-विच्छेद हुआ है, तलाक लिया है या वे उससे अलग रह रही थीं। सब पति के साथ ही रह रही थीं और मंदिर में जाकर शादी कर ली। ऐसे में कानूनी तौर पर तो इनका विवाह अवैध ही माना जाएगा। कल को यदि वह लड़का या नवयुवक, जिसके साथ ये अपने परिवार को छोड़कर चली आई हैं, वह भी इनसे किनारा कर ले तो कानून और पुलिस भी इनकी मदद नहीं कर सकेंगे। हां, यदि ये दुष्कर्म का आरोप लगा दें, तब शायद कुछ मदद हो सके, लेकिन वह भी कितनी होगी, कहा नहीं जा सकता। ऐसी ही एक घटना में महिला जिस लड़के के साथ गई थी, उसे छोड़कर अपने पति के पास लौटी थी, मगर उसने उसे अपनाने से मना कर दिया।
इन मामलों का एक दूसरा पहलू भी है कि सभी महिलाओं के कई-कई बच्चे हैं। वे अपनी मां को खोज रहे हैं। वे बच्चे अपने संगी-साथियों, अड़ोस-पड़ोस के ताने एवं मजाक सुन रहे हैं। कइयों ने तो स्कूल तक जाना छोड़ दिया है। वे उस शर्मिंदगी को झेल रहे हैं, जिसमें उन्होंने कुछ नहीं किया। यह भी देखना दिलचस्प है कि ऐसी घटनाएं महानगरों के मुकाबले छोटे शहरों और गांवों में अधिक हो रही हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, यह समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय भी हो सकता है। पुराने जमाने से सुन रहे हैं कि पुत्र कुपुत्र (बुरा या नालायक) हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता (बुरी) नहीं हो सकती, लेकिन इन घटनाओं ने जैसे इस विचार पर भी विराम लगा दिया है। स्त्रीवादी विचार इसे महिला की पसंद और उसके निर्णय लेने की क्षमता मान सकता है। यह भी कह सकता है कि आखिर स्त्री को भी अपनी जिंदगी चलाने के गलत-सही फैसले लेने का हक है। फिर बच्चों को पालने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की ही तो नहीं है।
अर्से से पुरुष अपनी पत्नी के होते हुए भी दूसरी ले आते हैं, तब तो कोई शिकायत नहीं करता, लेकिन आज महिलाएं ऐसा करने लगीं तो सबको शिकायत हो रही है, लेकिन यदि स्त्री के अधिकार हैं तो ऐसे मामलों में उन बच्चों के अधिकारों को कैसे परिभाषित किया जाएगा? उनका तो पूरा जीवन ही दांव पर लग गया है। अब वे किसके पास जाएंगे? यदि अपनी मां ही उन्हें छोड़कर चली गई तो कौन दूसरा है, जो उनकी सुनेगा? कल को यदि पिता भी दूसरी शादी कर ले तो उनका क्या होगा? यदि अपनी मां ही अपने बच्चों को पालना, उनकी देखभाल करना नहीं चाहती तो विमाता ऐसा क्यों करेगी? वह कह सकती है कि वह दूसरों के बच्चे क्यों पाले। ऐसे में उन बच्चों के पास न तो कोई अपना होगा, न कोई घर होगा। फिर उनकी पढ़ाई-लिखाई कैसे होगी? उनके खाने-पीने का ध्यान कौन रखेगा? कल को बीमार पड़ें तो उनकी देखभाल कौन करेगा? कोई मारपीट करे तो उन्हें कैसे बचाया जाएगा?
बच्चों के लिए काम करने वाले संगठन कहते हैं कि बच्चों के समुचित विकास के लिए माता-पिता, दोनों का प्यार और स्नेह चाहिए। उन्हें प्यार के साथ डांटने और समझाने-बुझाने वाला तथा अच्छा करने पर तारीफ करने वाला भी चाहिए, लेकिन ये बच्चे तो माता-पिता के रहते हुए भी जैसे अनाथ होकर जी रहे हैं।
(लेखिका साहित्यकार हैं)
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