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    उत्तराखंड में जनवरी की बर्फबारी से जगी आस, जगी मौसमी ग्लेशियर बनने की उम्मीद

    Updated: Wed, 28 Jan 2026 02:11 PM (IST)

    जनपद पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जनवरी की भारी बर्फबारी से मौसमी ग्लेशियर बनने की उम्मीद जगी है। यदि और हिमपात होता है, तो ये ग्लेशियर जल ...और पढ़ें

    आने वाले दिनों में अच्छी बर्फबारी हुई तो सीजनल ग्लेशियर बढ़ सकते हैं।

    आने वाले दिनों में अच्छी बर्फबारी हुई तो सीजनल ग्लेशियर बढ़ सकते हैं।

    HighLights

    1. जनवरी में भारी बर्फबारी से मौसमी ग्लेशियरों की उम्मीद

    2. ये ग्लेशियर जल संसाधनों, नदियों के लिए महत्वपूर्ण

    3. पेयजल, सिंचाई, कृषि, बिजली उत्पादन को मिलेगा लाभ

    संवाद सूत्र , जागरण , धारचूला / मुनस्यारी। जनपद के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में इस वर्ष जनवरी माह के दौरान हुई व्यापक और अच्छी बर्फबारी से मौसमी ग्लेशियर बनने की प्रबल संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों के अनुसार यदि आने वाले दिनों में एक-दो और हिमपात की घटनाएं होती हैं, तो ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सीजनल ग्लेशियर विकसित हो सकते हैं, जो क्षेत्र के जल संसाधनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होंगे।

    जनपद के मुनस्यारी ओर धारचूला के उच्च हिमालयी भू भाग में पंचाचूली शृंखला, दारमा, व्यास और मल्ला जोहार घाटी के ऊपरी हिस्सों में इस बार बर्फ की मोटी परत जमी है। इन क्षेत्रों में तापमान लंबे समय तक शून्य से नीचे बने रहने के कारण बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया धीमी है, जिससे बर्फ का संचय बढ़ रहा है। यही स्थिति मौसमी ग्लेशियर बनने के लिए अनुकूल मानी जाती है।

    स्थानीय जानकारों का कहना है कि ऐसे सीजनल ग्लेशियर गर्मियों के महीनों में धीरे-धीरे पिघलते हैं, जिससे उच्च हिमालय से उदगमित नदियों, नालों, गधेरों और प्राकृतिक जल स्रोतों को निरंतर पानी मिलता रहता है। इसका सीधा लाभ गोरी गंगा, काली नदी और उनकी सहायक नदियों को मिलने की संभावना है। इससे पेयजल आपूर्ति, सिंचाई और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए पानी की उपलब्धता बेहतर हो सकती है।

    कृषि और बागवानी के लिहाज से भी यह स्थिति शुभ संकेत मानी जा रही है। मुनस्यारी, दारमा और सीमांत क्षेत्रों में सेब, राजमा और अन्य नकदी फसलों के लिए पर्याप्त नमी उपलब्ध रहने की उम्मीद है। साथ ही, गर्मियों में जल संकट से जूझने वाले कई गांवों को भी राहत मिल सकती है।

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    हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मौसमी ग्लेशियरों का अस्तित्व पूरी तरह मौसम पर निर्भर करता है। यदि फरवरी-मार्च में तापमान अचानक बढ़ता है या बारिश अधिक होती है, तो बर्फ तेजी से पिघल सकती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ वर्षों पूर्व तक नवंबर माह से उच्च हिमालय में हिमपात होने से सीजनल ग्लेशियरों की संख्या काफी अधिक रहती थी ।

    मई जून में इन ग्लेश्यिरों के पिघलने से नदी, नालों का जलस्तर काफी अधिक बढ जाता था। भूमि में नमी बनने से उच्च् हिमालय में होने वाली जड़ी, बूटी से लेकर फसल का उत्पादन अच्छा रहता था। बीते वर्षों में मौसम में आए परिवर्तन से सीजनल ग्लेश्यिरों की संख्या में काफी कमी आ चुकी है।फिलहाल पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जमी बर्फ को आने वाले समय के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

    सीजनल ग्लेश्यिर हिमालय के लिए अति महत्व के हैँ। जिले के उच्च हिमालय में पूर्व में इनकी संख्या काफी अधिक रही है। मौसम चक्र में आए परिवर्तन से बर्फबारी का चक्र भी प्रभावित हुआ है। इस बार भी बर्फबारी देर से हुई है ओर अभी कुछ -कुछ दिनों के अंतराल में बर्फबारी होने पर ही सीजनल ग्लेशियर बन सकते हैंं। देर से होने वाली बर्फबारी से ऐसे ग्लेश्यिरों का बनना संभव नही है। - धीरेंद्र जोशी, पर्यावरणविद

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