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हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 22 साल की दैनिक वेतन सेवा पेंशन में जुड़ेगी, यूपी सरकार की अपील खारिज

Published: Wed, 09 Sep 2026 09:29 AM (IST)

हाई कोर्ट ने 22 साल की सेवा को कैजुअल मानने से इनकार करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर।

सांकेतिक तस्वीर।

HighLights

  1. दैनिक वेतन पर लंबी सेवा पेंशन योग्य मानी जाएगी

  2. 22 साल की सेवा को कैजुअल नहीं कहा जा सकता

  3. यूपी सरकार की अपील खारिज, दैनिक वेतन भोगियों को राहत

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दैनिक वेतन पर काम करने वाले कर्मचारियों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि नियमित होने से पहले दैनिक वेतन पर की गई लंबी सेवा को पेंशन योग्य सेवा में जोड़ा जाएगा। कोर्ट ने कहा, 22 साल तक लगातार काम करना कैजुअल या अस्थायी नहीं कहा जा सकता। 22 साल किसी व्यक्ति के पूरे कार्यकाल के बराबर है।

यदि राज्य यह साबित नहीं करता कि कर्मचारी ने 240 दिन का मानक पूरा नहीं किया तो उसकी सेवा को पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष अपील खारिज करते हुए दिया है।

दैनिक वेतन भोगियों के हित में बड़ा निर्णय, राज्य सरकार की अपील खारिज

राज्य सरकार ने एकल न्यायाधीश के मार्च 2022 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें नगर पालिका कुशीनगर के कर्मचारी राम प्रसाद यादव की याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें पेंशन देने का आदेश दिया गया था। राम प्रसाद यादव 31 मार्च, 1989 को दैनिक वेतन पर नियुक्त हुए थे और लगातार एक सितंबर 2011 तक इसी रूप में काम करते रहे। इसके बाद उन्हें क्लर्क पद पर नियमित किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद नगर पालिका ने 31 अक्टूबर, 2020 को आदेश पारित कर उनकी पेंशन इस आधार पर रोक दी कि दिहाड़ी कर्मी के रूप में सेवा पेंशन योग्य नहीं है।

कुशीनगर नगर पालिका कर्मी के पक्ष में दिया गया निर्णय रखा बरकरार

सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि दैनिक वेतन की सेवा, स्थायी स्थापना पर मौलिक पद पर की गई सेवा नहीं है। उत्तर प्रदेश नगर पालिका (गैर-केंद्रीकृत) सेवा सेवानिवृत्ति लाभ विनियमावली 1984 के विनियम 2(के) और 2(एम) तथा सिविल सर्विस रेगुलेशन के अनुच्छेद 368 के अनुसार पेंशन योग्य पद वही है जो स्थायी और मौलिक हो। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के प्रेम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसले 2019 का संदर्भ देते हुए सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया।

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पेंशन योग्य सेवा में न गिनना भेदभावपूर्ण और अतार्किक है

सुप्रीम कोर्ट ने यूपी रिटायरमेंट बेनिफिट रूल्स 1961 के नियम 3(8) को रीड डाउन करते हुए कहा था कि वर्कचार्ज, कंटिंजेंसी या गैर-पेंशन योग्य सेवा में बिताई गई अवधि को पेंशन योग्य सेवा में न गिनना भेदभावपूर्ण और अतार्किक है। अदालत ने कहा, एकलपीठ ने सही कानून लागू किया है। खंडपीठ ने सरकार को निर्देश दिया है कि याची की 1989 से 2011 तक की दैनिक वेतन सेवा को जोड़ कर तीन महीने में पेंशन का निर्धारण कर बकाया भुगतान किया जाय।