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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर रात 12 बजे खीरा क्यों काटा जाता है? सिर्फ परंपरा नहीं, इसके पीछे हैं कुछ रहस्य

Published: Wed, 02 Sep 2026 12:26 PM (IST)

जन्माष्टमी पर रात 12 बजे खीरा काटने की परंपरा का गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जो भगवान कृष्ण के जन्म से ...और पढ़ें

जन्माष्टमी पर आधी रात को खीरा क्यों काटते हैं जानिए (Picture Credit: AI Generated)

जन्माष्टमी पर आधी रात को खीरा क्यों काटते हैं जानिए (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. जन्माष्टमी पर रात 12 बजे खीरा काटने की परंपरा।

  2. खीरा जीवन, समृद्धि और नाल छेदन का प्रतीक है।

  3. यह रस्म कृष्ण के जन्म और गर्भनाल अलग होने को दर्शाती है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारे देश में जन्माष्टमी का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है और इस दिन लड्डू गोपाल की पूजा पूरे श्रद्धा भाव से की जाती है। ऐसा माना जाता है कि कृष्ण जी की पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उनके ऊपर सदैव कान्हा का आशर्वाद बना रहता है।

इस दिन व्रत और दही-हांडी के जश्न से लेकर 56 भोग और सजी-धजी झांकियों तक, भक्त इस दिन को बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं। जन्माष्टमी के दिन कई परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनमें से एक है रात में 12 बजे श्री कृष्ण के समय खीरा काटना। जैसे ही कृष्ण जी का जन्म होता है भक्त आधी रात को खीरा काटकर और उसे प्रसाद के रूप में चढ़ाकर भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव मनाते हैं।

इस परंपरा का गहरा आध्यात्मिक महत्व है और यह न सिर्फ मथुरा में बल्कि पूरे देश में निभाई जाती है। आइए दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री से जानते हैं इस पर्व के दिन रात के समय सिर्फ खीरा ही क्यों काटा जाता है, अन्य कोई सब्जी या फल क्यों नहीं?

जन्माष्टमी पर खीरा काटने की रस्म का महत्व

इस साल जन्माष्टमी 04 सितंबर को मनाई जाएगी। इस दिन लोग घरों में भगवान कृष्ण का जन्म उत्सव मनाते हैं। इस दिन पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आधी रात के समय खीरा काटते हैं। हिंदू धर्मग्रंथों में बताया गया है कि खीरा जीवन से जुड़ा होता है।

बीजों से भरपूर होने के कारण इसे जीवन का प्रतीक माना जाता है और नए जीवन के जन्म का जश्न मनाने के लिए भक्त आधी रात के समय खीरा काटते हैं। यह विकास, खुशी और समृद्धि का भी प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि खीरे में मौजूद कई बीज भगवान कृष्ण का आशीर्वाद होते हैं। खीरा काटने से परिवार में खुशहाली और समृद्धि आती है।

खीरे का आध्यात्मिक महत्व

जन्माष्टमी की पूजा-विधि में खीरे का इस्तेमाल करना कई गहरे प्रतीकात्मक अर्थों से जुड़ा है- इस खीरे के डंठल को उस नाल का प्रतीक माना जाता है जो बच्चे को उसकी मां से जोड़ती है, यानी कि यह गर्भनाल का प्रतीक है।

आधी रात को खीरा काटना उस पल को दिखाता है जब भगवान श्री कृष्ण को देवकी माता की कोख से अलग किया गया था। खीरे के अंदर के बीज जीवन और संभावनाओं को दिखाते हैं। और उन्हें निकालना जन्म की प्रक्रिया पूरी होने और दुनिया में कदम रखने की तैयारी का प्रतीक है।

जन्माष्टमी की रात कैसे काटा जाता है खीरा?

जन्माष्टमी के दिन डंठल वाला ताजा खीरा काटने का महत्व है। इसके लिए भक्त ऐसा खीरा ही पूजा के लिए चुनते हैं। आधी रात के ठीक 12 बजे श्री कृष्ण के जन्म के समय इस खीरे को सिक्के की मदद से काटा जाता है और उसके बीच में से लड्डू गोपाल को बाहर निकाला जाता है।

इस रस्म को 'नाल छेदन' कहा जाता है। आधी रात को खीरा काटना मां की नाल काटने और कृष्ण के दुनिया में आने का प्रतीक होता है। इसके बाद इस खीरे से बीज निकाले जाते हैं, जो कोख से अलग होने और नए जीवन की यात्रा शुरू करने की तैयारी को दिखाते हैं। इस खीरे को लड्डू गोपाल के पालने के सामने रखा जाता है और कृष्ण जी की छठी तक यह खीरा वहीं रखा रहता है।

मध्य रात्रि में खीरा काटना केवल एक रस्म नहीं है बल्कि यह सदियों से चली आ रही परंपरा की साक्षी भी है जो श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का प्रतीक है।

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