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गोपेश्वर का गोपीनाथ मंदिर: जहां नारी रूप में पूजे जाते हैं भगवान शिव, पढ़ें इसका पौराणिक रहस्य

Published: Wed, 09 Sep 2026 11:43 AM (IST)

चमोली के गोपेश्वर में मौजूद गोपीनाथ मंदिर दुनिया का इकलौता ऐसा मंदिर है जहां शिवजी की पूजा गोपी रूप में ...और पढ़ें

क्या आप गए हैं गोपीनाथ मंदिर?

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तराखंड के चमोली जिले में 1,308 मीटर की ऊंचाई पर बसा गोपेश्वर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और एक बेहद रहस्यमयी मंदिर के लिए मशहूर है। देवभूमि की इन वादियों के बीच स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा धाम है, जहां भगवान शिव पुरुष रूप में नहीं, बल्कि एक 'गोपी' यानी स्त्री के रूप में पूजे जाते हैं।

लेकिन, ऐसा क्यों आइए इस आर्टिकल में जानते हैं। पहाड़ों की ठंडी हवाओं के बीच बसे इस धाम में कदम रखते ही मन को एक अलग आध्यात्मिक शांति मिलती है।

शिव जी ने क्यों धरा था गोपी का रूप?

भोलेनाथ के इस अनोखे रूप के पीछे द्वापर युग की एक बेहद खूबसूरत कहानी है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन में अपनी मधुर बांसुरी से रासलीला रचा रहे थे, तो उसकी सुरीली धुन कैलाश पर्वत तक पहुंच गई। उस संगीत से मंत्रमुग्ध होकर महादेव भी इसमें शामिल होना चाहते थे। लेकिन, नियम यह था कि रास में सिर्फ श्रीकृष्ण ही पुरुष हो सकते थे, बाकी सब गोपियां होंगी।

वृंदावन में प्रवेश करने के लिए शिवजी ने एक रूपवती गोपी का भेष धारण किया। भगवान कृष्ण ने उन्हें तुरंत पहचान लिया और मुस्कुराते हुए उन्हें 'महाराज गोपेश्वर' कहकर पुकारा। उसी पावन घटना के बाद से इस जगह का नाम गोपेश्वर और मंदिर का नाम गोपीनाथ पड़ गया।

अष्टधातु का त्रिशूल और 24 द्वारों का रहस्य

मंदिर के विशाल प्रांगण में अष्टधातु का एक भारी-भरकम त्रिशूल गड़ा हुआ है। सदियों पुराने इस त्रिशूल के बारे में कहा जाता है कि जब कामदेव ने महादेव की समाधि भंग करने की कोशिश की थी, तब शिवजी ने गुस्से में यही त्रिशूल उन पर फेंका था। यह आज भी उसी अवस्था में गड़ा हुआ है।

8वीं से 11वीं शताब्दी के बीच कत्यूरी राजाओं द्वारा बनाया गया यह मंदिर नागर शैली का बेहतरीन नमूना है। इसकी बनावट इतनी अद्भुत है कि इसके 30 वर्ग फीट के मुख्य गर्भगृह तक पहुंचने के लिए आपको 24 अलग-अलग द्वारों से होकर गुजरना पड़ता है।

भगवान रुद्रनाथ का शीतकालीन घर

गोपीनाथ मंदिर पंच केदारों में शामिल भगवान रुद्रनाथ से भी जुड़ा हुआ है। सर्दियों के मौसम में जब भारी बर्फबारी होती है और रुद्रनाथ के कपाट बंद होते हैं, तब छह महीने तक उनकी उत्सव डोली गोपीनाथ मंदिर में ही विराजमान रहती है और यहीं उनकी नियमित पूजा की जाती है।

पर्यटन और पहाड़ी संस्कृति

गोपेश्वर सिर्फ आस्था का ही नहीं, बल्कि प्रकृति प्रेमियों का भी स्वर्ग है। एक पवित्र स्थल होने के नाते यहां मांसाहार पूरी तरह वर्जित है, लेकिन आप यहां के स्वादिष्ट और शुद्ध पारंपरिक 'पहाड़ी' भोजन का आनंद ले सकते हैं। ट्रैकिंग के शौकीनों के लिए पास का सागर गांव और रुद्रनाथ ट्रैक यहीं से शुरू होता है। वापसी में आप यहां की भोटिया जनजाति की महिलाओं द्वारा हाथ से बुने गए ऊनी शॉल, टोपियां और कालीन भी यादगार के तौर पर ले जा सकते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।