बिहार का रहस्यमयी 'वन देवी मंदिर': जहां सूर्यास्त के बाद जाना है सख्त मना, जानिए इसकी पौराणिक कहानी
बिहार के बिहटा में स्थित रहस्यमयी वन देवी मंदिर अपनी लोक-संस्कृति और पौराणिक कथाओं के लिए प्रसिद्ध है, जिस पर ...और पढ़ें

वन देवी मंदिर का इतिहास और उससे जुड़ी कथाएं

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। उत्तर भारत के बिहार राज्य में स्थित एक ऐसा रहस्यमयी मंदिर जो अपनी लोक-संस्कृति और पौराणिक कथाओं के लिए जाना जाता है। बिहार के बिहटा में स्थित है वन देवी का असली मंदिर जिस पर बॉलीवुड में एक फिल्म भी बनकर तैयार हो चुकी है।
सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया स्टारर फिल्म 'द वीवान:फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' की कहानी इसी मंदिर पर आधारित है। आइए जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी संपूर्ण जानकारी के बारे में।
वन देवी मंदिर की कहानी
मां वन देवी का मंदिर पटना से तकरीबन 35 किलोमीटर की दूरी अमहारा, राघोपुर और कंचनपुर गांवों के संगम स्थल पर स्थित है। यह मंदिर बिहार के कम ज्ञात आकर्षणों और धार्मिक स्थलों में घूमने की इच्छा रखने वाले यात्रियों के लिए पसंदीदा गंतव्य बन गया है।
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक वन देवी की कहानी सदियों पुरानी है, जब वर्तमान बिहटा के आसपास के हिस्से घने जंगलों से घिरे हुए थे। वन देवी मंदिर करीब 350 से 400 साल पुराना बताया जाता है, जबकि फिल्म निर्माताओं ने इसकी उत्पत्ति 16वीं शताब्दी की बताई है।

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वन देवी का संबंध मां विंध्यवासिनी से
स्थानीय लोक कथाओं में इस मंदिर का संबंध मां विंध्याचल की मां विंध्यवासिनी से जोड़कर देखा जाता है। लोककथाओं के मुताबिक, राघोपुर के विद्यानंद मिश्रा नाम के एक भक्त विंध्याचल में देवी की श्रद्धापूर्वक पूजा करते थे।
जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती गई, उनके लिए इतनी लंबी यात्रा काफी मुश्किल हो गई। एक दिन देवी ने उन्हें सपने में दर्शन दिए और कहा कि, अपने पवित्र पिंड का एक अंश अपने निवास स्थान पर ले आओ।
बताया जाता है कि, विद्यानंद मिश्रा ने देवी के आदेश को मानते हुए पवित्र पिंड लाकर अपने गांव के पास के जंगल में स्थापित कर दिया। उस समय वहां कोई भव्य मंदिर स्थित नहीं था, सिर्फ एक झोपड़ी के अंदर पिंड स्थापित था। क्योंकि यह मंदिर जंगल के बीचों-बीच स्थित था इसलिए देवी को 'वन देवी' या 'वन की देवी' के रूप में जाना जाने लगा।
मंदिर में मूर्ति पूजा नहीं होती है
साल 1958 के आसपास परिवर्तन की शुरुआत हुई, जब संत भगवान दास त्यागी यज्ञ के लिए अमहारा आए। स्थानीय लोगों के मुताबिक उन्हें पवित्र पिंड के आसपास की साधारण संरचना को एक औपचारिक मंदिर का रूप देने का श्रेय दिया जाता है।
इसके बाद 12 फरवरी, 1997 में स्थानीय भक्तों ने मंदिर के आगे का निर्माण और विकास से जुड़े कार्य में अहम भूमिका निभाई। आप जानकार हैरान हो जाएंगे कि इस मंदिर में किसी भी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, यहां सिर्फ एक पिंड है। यात्रियों के लिए शायद यही यात्रा का सबसे रोचक पहलू है।
सूर्यास्त के बाद मंदिर में जाना वर्जित
वन देवी मंदिर से जुड़ा एक रोचक पहलू ये भी है कि, सूर्यास्त के बाद किसी को भी जंगल या मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं होती है। इसी वजह से वन देवी मंदिर को रहस्यमयी कहा जाता है। सूरज डूबने के बाद मंदिर के कपाट बंद होते ही पुजारी भी चले जाते हैं और किसी को भी मंदिर में रुकने की अनुमति नहीं होती है।
लोक कथाओं के मुताबिक, माना जाता है कि, अंधेरा होते ही जंगलों में मां वन देवी खुद विचरण करती हैं। हालांकि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि रात में कोई अलौकिक शक्ति प्रकट होती है। लेकिन यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है, जो मंदिर की पहचान का सबसे खास हिस्सा है।

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पटना से वन देवी मंदिर कैसे पहुंचे?
पटना से वन देवी मंदिर जाने के लिए सड़क और हवाई मार्ग दोनों उपलब्ध हैं। अगर आप पटना से गाड़ी चलाकर वन देवी मंदिर जाते हैं तो आपको 35 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ेगा।
इसके अलावा रेल से आने वाले यात्रियों के लिए बिहटा रेलवे स्टेशन सबसे पास का स्टेशन पड़ेगा। आप बिहटा रेलवे स्टेशन पर उतरकर रिक्शा या ऑटो के माध्यम से भी जा सकते हैं।
हवाई मार्ग पसंद करने वाले लोगों के लिए सबसे पास का हवाई अड्डा जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। इस हवाई अड्डे से वन देवी का मंदिर करीब 28 से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
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