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हर मंदिर में क्यों होता है गर्भगृह? यहां पढ़ें इसके पीछे का धार्मिक महत्व और मुख्य नियम

Published: Sun, 06 Sep 2026 08:00 AM (IST)Updated: Sun, 06 Sep 2026 08:42 AM (IST)

गर्भगृह हिंदू मंदिरों का सबसे पवित्र हिस्सा है, जहां देवी-देवताओं की मुख्य प्रतिमा स्थापित होती है और इसे ईश्वर का ...और पढ़ें

मंदिर का गर्भगृह क्यों है खास? (Picture Credits- AI Images)

मंदिर का गर्भगृह क्यों है खास? (Picture Credits- AI Images)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में मंदिरों का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मंदिर को ईश्वर का साक्षात निवास स्थान माना जाता है। मंदिरों में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और उनकी रोजाना विधिपूर्वक पूजा-अर्चना होती है।

किसी भी मंदिर का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण हिस्सा उसका गर्भगृह होता है। गर्भगृह में ही देवी-देवता की मुख्य प्रतिमा स्थापित की जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हर मंदिर में गर्भगृह क्यों बनाया जाता है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? अगर नहीं पता, तो ऐसे में आइए इस आर्टिकल में जानते हैं इसके पीछे के मुख्य कारण।

क्या होता है गर्भगृह?

मंदिर का गर्भगृह ब्रह्म स्थान कहलाता है। यहीं पर देवी या देवता की मूल प्रतिमा विराजमान होती है। गर्भगृह में ही देवताओं का नित्य स्नान, श्रृंगार, भोग और विश्राम कराया जाता है। साथ ही विशेष पूजा-अर्चना होती है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, गर्भगृह के लिए ऐसे स्थान का चयन किया जाता है जहां सकारात्मक ऊर्जा का केंद्र सबसे अधिक तीव्र हो।

गर्भगृह की पवित्रता और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसमें प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति को कठोर नियमों का पालन करना पड़ता है। गर्भगृह का आकार वर्गाकार या आयताकार होता है। इसमें हर किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं होती। केवल वही लोग जा सकते हैं जो पवित्रता और नियमों का पालन करते हैं।

गर्भगृह के प्रमुख नियम

  • गर्भगृह में जाने से पहले व्यक्ति को स्नान और साफ कपड़े धारण करने चाहिए। साथ ही मन में किसी भी प्रकार के नकारात्मक विचार नहीं होने चाहिए।
  • इसके अलावा व्यक्ति के साथ चमड़े की वस्तुएं नहीं होनी चाहिए। जैसे- बेल्ट, पर्स आदि। गर्भगृह में चमड़े की चीजों को ले जाने की अनुमति नहीं होती।
  • मंदिर के गर्भगृह में अशुद्ध हाथों से मूर्तियों को भूलकर भी नहीं छूना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस तरह की गलती को करने से मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की ऊर्जा प्रभावित होती है।
  • दर्शन करने के बाद पीछे हटते समय तुरंत ईश्वर की ओर पीठ करके नहीं मुड़ना चाहिए।
  • एक बात का विशेष ध्यान रखें कि गर्भगृह की परिक्रमा सदैव घड़ी की सुई की दिशा करनी चाहिए।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।