जब गोरी सरकार की पाबंदी पर भारी पड़ा उषा मेहता का 'गुप्त रेडियो स्टेशन', अंग्रेजों को नहीं हुई थी कानों-कान खबर
उषा मेहता को भले ही उस दौर में कोई नहीं जानता था पर गुप्त रेडियो स्टेशन बनाने के बाद उन्होंने पूरी दुनिया में लोकप्रियता बटोरी।

उषा मेहता के साथ और भी सेनानी थे शामिल (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 8 अगस्त 1942 को जैसे ही बॉम्बे से भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई तो अंग्रेजों ने सबसे पहले महात्मा गांधी, सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू समेत कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। अब कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती थी कि नेतृत्व के बिना इस आंदोलन को कैसे आगे बढ़ाया जाए।
ऐसे में उषा मेहता और उनके सहयोगियों ने बढ़-चढ़कर काम किया था। आइए जानते हैं आखिर कैसे वो अंग्रेजों की नाक के नीचे से एक गुप्त रेडियो स्टेशन चलाने में कामयाब रही थीं।
कैसे शुरू हुआ गुप्त रेडियो स्टेशन?
आंदोलन के सभी बड़े नेता तो जेल में थे लेकिन कांग्रेस के कुछ छोटे-मोटे नेता अभी भी जमीनी स्तर पर काम में लगे हुए थे। बापू की गिरफ्तारी पर भी सबके हौसले पस्त नहीं हुए, सभी ने बॉम्बे के गोवालिया टैंक मैदान पर तिरंगा फहराते हुए आंदोलन की आवाज बनने की पुरजोर कोशिश की।
इसी दौरान तय किया गया कि चाहे कुछ भी हो जाए आंदोलन कमजोर नहीं पड़ना चाहिए। इसके लिए पहले सोचा कि अखबार निकाला जाए पर वो सीक्रेट तरीके से घर-घर पहुंचाना संभव नहीं था। ऐसे में अखबार के विचार को त्याग कर रेडियो स्टेशन शुरू करने की बात कही गई। उषा मेहता आगे आईं क्योंकि उन्हें रेडियो की अच्छी-खासी समझ थी।
उषा मेहता के साथ और भी सेनानी थे शामिल
इस मीटिंग में तय किया गया कि उषा मेहता के साथ ही बाबूभाई ठक्कर, विट्ठलदास झवेरी और नरीमन अबराबाद प्रिंटर गुप्त रूप से रेडियो स्टेशनों का संचालन करेंगे। इन सभी के पास रेडियो चलाने की ट्रेनिंग थी। नरीमन अबराबाद प्रिंटर जहां एक तरफ इंग्लैंड से रेडियो की तकनीक सीखकर आए थे तो वहीं दूसरी तरफ उषा मेहता को सीक्रेट रेडियो सर्विस का एनआउंसर बनाया गया।
पुराने ट्रांसमीटर को रोड़कर तैयार किए गए रेडियो
इसमें शिकागो रेडियो के मालिक ननका मोटवानी ने बड़ी मदद की। उन्होंने ट्रांसमिशन के लिए कामचलाऊ टूल्स मुहैया करवाए। इस तरह पुराने ट्रांसमीटर को तोड़कर रेडियो अब काम करने लायक बन चुके थे। अब इसके माध्यम से लोगों तक आवाज पहुंचाने की देरी थी।
उषा मेहता की आवाज में हुआ था पहला प्रसारण
वैसे तो इस रेडियो स्टेशनन की स्थापना का दिन 14 अगस्त 1942 था, लेकिन इसका पहला प्रसारण उषा मेहता ने अपनी आवाज में 27 अगस्त 1942 को किया था। उनके शब्द कुछ ऐसे थे कि ‘ये कांग्रेस रेडियो की सेवा है, जो 42.34 मीटर पर भारत के किसी हिस्से से प्रसारित की जा रही है’।
फिर देखते ही देखते बापू समेत डॉ. राममनोहर लोहिया, अच्युतराव पटवर्धन और पुरुषोत्तम जैसे कांग्रेस के सभी बड़े नेता इससे जुड़ गए। अफसोस कि उषा मेहता और उनके साथियों को 12 नवंबर 1942 को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में यह बात दर्ज है कि अंग्रेजों ने करीब 6 महीने तक इस बात की खोजबीन की कि आखिर यह रेडियो स्टेशन कैसे चल रहा था।

