विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

जब 'रोटी' बनी डाकिया और 'लड्डू' बना बम का कोड, क्रांतिकारियों ने ऐसे लड़ी थी अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई

Updated: Fri, 14 Aug 2026 12:30 PM (IST)

गुलाम भारत को आजादी दिलाने में हमारी थाली में रखे खाने ने भी अहम भूमिका निभाई है, आइए आपको यह दिलचस्प इतिहास बताते हैं।

रोटी और मिठाइयों का आजादी की लड़ाई में अहम योगदान (Image Source: AI Generated)

रोटी और मिठाइयों का आजादी की लड़ाई में अहम योगदान (Image Source: AI Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक अधिकारों या जमीन के टुकड़े की लड़ाई नहीं थी, यह हमारी आजीविका और संसाधनों की रक्षा की भी जंग थी। हम सभी जानते हैं कि अंग्रेज भारत में मसालों के भंडार की वजह से आकर्षित हुए थे, फिर यह कैसे हो सकता था कि इस लड़ाई में हमारा भोजन ही शामिल न हो। 

जी हां, आज हम किसी स्वतंत्रता सेनानी के जज्बे की नहीं, बल्कि इसी भोजन की बात करने वाले हैं कि कैसे थाली में रखा फूड आजादी की लड़ाई का हिस्सा बना।  

जब चपाती बनी डाकिया  

1857 के संघर्ष को भले ही विद्रोह मानकर अंग्रेजों ने बड़ी ही आसानी से दबा दिया हो लेकिन यहीं से भारतवासियों ने अंग्रेजों में डर का माहौल पैदा कर दिया था। इसी विद्रोह के शुरू होने से पहले चपाती अहम भूमिका में आई। इस चपाती में कुछ भी खास नहीं था और न ही इसपर किसी तरह का संदेश लिखा होता था, पर इसे एक गांव से दूसरे गांव डाकिया की तरह भेजे जाने का सिलसिला शुरू हुआ। अंग्रेजों का इसपर ध्यान फरवरी 1857 में गया, जब इस चपाती आंदोलन से ब्रिटिश अधिकारी मार्क थॉर्नहिल का सामना हुआ।

अंग्रेज अफसर की मेज तक पहुंची रोटियां

इस घटना पर सबसे पहले मथुरा में तैनात अंग्रेज मजिस्ट्रेट मार्क थॉर्नहिल की नजर पड़ी। एक सुबह उन्होंने अपने ऑफिस डेस्क पर चार छोटी गंदी रोटियां रखी देखी। वो बिल्कुल सामान्य रोटियों की तरह थीं, लेकिन जांच करने पर पता चला कि यह एक चेन-रिएक्शन (श्रृंखला) है, जो गांव-दर-गांव चल रहा है।

देखते ही देखते यह नेटवर्क दक्षिण में नर्मदा नदी से लेकर उत्तर में नेपाल की सीमाओं तक फैल चुका था। ब्रिटिश अधिकारी सबसे ज्यादा इस बात से डरे हुए थे कि वे इस खामोश हलचल का मतलब नहीं निकाल पा रहे थे।

बड़े तूफान से पहले की खामोशी

इस आंदोलन से अंग्रेज इसलिए भी घबराए हुए थे, क्योंकि यह वो समय था जब भारतीय सैनिकों और अंग्रेजों के बीच कड़वाहट अपने चरम पर थी। दरअसल, ब्रिटिश सेना नई एनफील्ड राइफलें लेकर आई थी, जिनके कारतूसों पर गाय और सुअर की चर्बी लगे होने की अफवाह फैल चुकी थी। इससे हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही धर्मों के सैनिकों में भयंकर गुस्सा पनप रहा था। कई इतिहासकारों का मानना है कि रोटियों का यह खामोश सफर दरअसल आने वाली क्रांति की एक खुफिया चेतावनी थी। यह पूरे देश को एकजुट करने का एक मूक अलार्म था, जिसके तुरंत बाद अप्रैल 1857 में मेरठ में महाविद्रोह भड़क उठा।

मिठाई की दुकान मीटिंग का अड्डा 

चपाती आंदोलन को दशकों बीत जाने के बाद क्रान्तिकारियों ने संदेश पहुंचाने का नया तरीका खोज निकाला। इस बार संदेश छिपा हुआ नहीं था, वह रंगों से जुड़ा हुआ था। साल 1940 में वाराणसी में राम भंडार नाम की मिठाई की दुकान पर मदन गोपाल गुप्ता ने तिरंगा बर्फी बनाई। इसका उद्देश्य क्रांतिकारियों और आंदोलनकर्ताओं के बीच खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान करना था। 

अंग्रेजों ने झंडे को बैन कर दिया था और अब मकसद एक ही था कि मिठाई में तीन रंगों के माध्यम से अपनी ताकत प्रदर्शित की जाए। संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, इन तिरंगा बर्फियों को लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए फ्री में भी बांटा गया था। 

नेचुरल रंगों से बनी है तिरंगा बर्फी 

तिरंगा बर्फी की सबसे खास बात यह थी कि इन्हें नेचुरल रंगों से बनाया गया था। केसरिया रंग केसर से, हरा रंग पिस्ता से तो सफेद रंग काजू से बना था। इस तरह यह बर्फी क्रांतिकारियों के लिए सीक्रेट कोड बनी।  

लड्डू का सीक्रेट कोड 

लड्डुओं से भरा डब्बा यह संकेत देता था कि बम अभी रास्ते में हैं, वहीं बंगाल के रसगुल्ले विस्फोटकों की एक बड़ी खेप की जानकारी देते थे। बर्फियों का कनेक्शन कारतूसों और गोला-बारूद से था। इसके अलावा, मोतीचूर के लड्डुओं को कलर पैटर्न से बनाते थे जिन्हें जोड़ने पर एक नक्शा तैयार हो जाया करता था। 

यह भी पढ़ें- कदम-कदम बढ़ाए जा….नेताजी बोस की सेना का वो तराना जो फिल्म 'समाधि' ने बना अमर! आज भी थिरकती है इंडियन आर्मी 

यह भी पढ़ें- 1905 में इस आंदोलन ने दी थी अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती, आजादी का हथियार बना था ब्रिटिश सामान का बहिष्कार