1905 में इस आंदोलन ने दी थी अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती, आजादी का हथियार बना था ब्रिटिश सामान का बहिष्कार
कैसे खादी ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक ऐसी ज्वाला भड़काई, जिसने इतिहास की दिशा ही बदल दी। आइए, इस आर्टिकल में विस्तार से समझते हैं।

सिर्फ विदेशी सामान का बहिष्कार नहीं था स्वदेशी आंदोलन, शिक्षा से उद्योग तक ऐसे बदली थी तस्वीर (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। 15 अगस्त करीब है और देश इस बार अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा। क्या आप जानते हैं कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे पहला और संगठित जन-आंदोलन कौन-सा था?
बता दें, यह था 'स्वदेशी आंदोलन', जिसकी शुरुआत 1905 में हुई थी। इस आंदोलन ने पहली बार ब्रिटिश हुकूमत को यह कड़ा संदेश दिया कि अब भारतीय सिर्फ मूक दर्शक बनकर नहीं रहेंगे।
इसका मुख्य मंत्र बहुत साफ था- अपने देश की बनी चीजों को अपनाना और ब्रिटिश चीजों का पूरी तरह से बहिष्कार करना। जी हां, यह महज एक राजनीतिक कदम नहीं था, बल्कि अंग्रेजों की आर्थिक कमर तोड़ने और अपनी आत्मशक्ति पहचानने की एक बड़ी कोशिश थी।

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एक फैसले ने फूंक दी विरोध की सबसे बड़ी चिंगारी
19वीं सदी में भारत के लोग अंग्रेजों की शोषणकारी नीतियों से पहले ही त्रस्त थे। दादाभाई नौरोजी, रोमेश चंद्र दत्त और दिनशा वाचा जैसे बड़े कांग्रेस नेताओं ने यह उजागर कर दिया था कि कैसे अंग्रेज भारी टैक्स लगाकर भारत की संपत्ति को चूस कर इंग्लैंड ले जा रहे हैं। भारत सिर्फ कच्चा माल देने वाला और अंग्रेजों का महंगा सामान खरीदने वाला देश बनकर रह गया था।
लेकिन, असली चिंगारी तब भड़की जब वायसराय लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल के विभाजन का फैसला किया। अंग्रेजों ने इसे 'प्रशासनिक सुविधा' का नाम दिया, लेकिन असल मकसद 'फूट डालो और राज करो' था। उन्होंने बंगाल को हिंदू बहुल पश्चिम और मुस्लिम बहुल पूर्व में बांट दिया। इस फैसले के खिलाफ पूरे देश का गुस्सा फूट पड़ा।
कैसे जन-जन तक पहुंचा विरोध?
विरोध जताने के लिए सिर्फ भाषण और याचिकाएं काफी नहीं थीं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए, 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के ऐतिहासिक टाउन हॉल में स्वदेशी आंदोलन की औपचारिक शुरुआत हुई और बहिष्कार का प्रस्ताव पास किया गया। 16 अक्टूबर 1905 को जब यह विभाजन लागू हुआ, तो पूरे बंगाल में उस दिन को शोक और विरोध के रूप में मनाया गया।
जल्द ही यह आंदोलन बंगाल से निकलकर महाराष्ट्र और पंजाब जैसे राज्यों में भी फैल गया। स्वयंसेवकों ने समितियां बनाईं, जो घर-घर जाकर स्वदेशी का संदेश पहुंचाती थीं। अश्विनी कुमार दत्त की 'स्वदेश बांधव समिति' ने तो मुस्लिम बहुल बारीसाल में 150 से ज्यादा शाखाएं खोलकर कमाल का काम किया।
विदेशी कपड़ों की होली और स्वदेशी की हुंकार
इस आंदोलन का असर सड़कों पर साफ दिखा। चौराहों पर विदेशी कपड़ों और सामानों की होली जलाई गई, विदेशी सामान बेचने वाली दुकानों पर विरोध प्रदर्शन किया गया और ब्रिटिश कारखानों में हड़तालें हुईं। लोगों ने मैनचेस्टर और लंकाशायर के मिलों में बने कपड़ों का बहिष्कार कर भारतीय हथकरघा को अपनाना शुरू किया।
स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उद्योगों में नई जान फूंक दी:
- 1901 में स्थापित बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल वर्क्स लिमिटेड और 1906 में शुरू हुई बंगा लक्ष्मी कॉटन मिल्स ने भारी मुनाफा कमाया।
- इसी दौर में 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी और 1897 में ताले बनाने वाली गोदरेज इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों को नई उड़ान मिली।
- 1906 में वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई ने अपनी स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी भी शुरू की।
- देखते ही देखते देसी बैंक, बीमा कंपनियां, साबुन और माचिस की फैक्ट्रियां पूरे देश में खुलने लगीं।

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कैसे संस्कृति और शिक्षा बने आजादी के हथियार?
यह आंदोलन सिर्फ बाजारों तक सीमित नहीं था। अंग्रेजी स्कूलों का मुकाबला करने के लिए भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने वाले स्कूल-कॉलेज खोले गए। 1906 में बंगाल नेशनल कॉलेज और बंगाल टेक्निकल इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई।
सांस्कृतिक स्तर पर भी यह दौर बेहद अहम था। इसी समय वंदे मातरम आजादी का सबसे बड़ा नारा बन गया। रवींद्रनाथ टैगोर ने 'एकला चलो रे', 'आमार शोनार बांग्ला' और 'बांग्लार माटी, बांग्लार जोल' जैसे प्रेरणादायक गीत लिखे। बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में शिवाजी और गणेश उत्सवों को जन-आंदोलन का हिस्सा बनाया।
चेहरे जिन्होंने घर-घर पहुंचाई आजादी की आग
इस आंदोलन को धार देने में गरम दल के नेताओं- लाल-बाल-पाल यानी लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल की सबसे बड़ी भूमिका थी, जिन्होंने ब्रिटिश राज के भीतर सुधार मांगने की बजाय पूर्ण स्वराज्य की मांग की। दूसरी तरफ, अरबिंदो घोष जैसे नेताओं ने अनुशीलन समिति के जरिए क्रांतिकारी और उग्र रास्ते अपनाए। सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नरमपंथी नेता भी बंगाल में इस आंदोलन के बड़े चेहरे थे।
'आनंद बाजार पत्रिका', 'जुगांतर' और 'बंदे मातरम' जैसे अखबारों ने स्वदेशी की भावना को घर-घर तक पहुंचाया। बता दें, भले ही 1908 तक आते-आते नेताओं की गिरफ्तारी के कारण यह आंदोलन धीमा पड़ गया हो, लेकिन इसने एक ऐसा बीज बोया जिसने भविष्य की राजनीति बदल दी। इसी स्वदेशी आंदोलन के आदर्शों ने बाद में महात्मा गांधी के असहयोग और अहिंसक आंदोलनों के लिए एक मजबूत और अचूक नींव तैयार की।

