यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Feb 14, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
स्वदेशी का शंखनाद: जब विदेशी शासकों द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण के खिलाफ देश उठ खड़ा था
भारत को पुन आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं तो ऐसे में उचित होगा कि हम इतिहास के उन क्षणों को भी याद करें जब विदेशी शासकों द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण के खिलाफ देश उठ खड़ा हुआ था।

डा. अश्विनी महाजन बता रहे हैं कि किस प्रकार हमारे विचारकों, राष्ट्रवादी नेताओं और उनके साथ ही आम जनता ने स्वदेशी के विचार को एक राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए भारत में विदेशी शासन की नींव हिलाने का काम किया...
हालांकि स्वदेशी का विचार 1905 से पूर्व देश के कुछ भागों तक ही सीमित था, लेकिन स्वदेशी विचार अथवा स्वदेशी दर्शन इस देश के लिए कोई नया नहीं है। 1905 से पूर्व ही दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव गोविंद राणाडे, बाल गंगाधर तिलक, गणेश विनायक जोशी आदि ने भारतीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने का काम प्रारंभ कर दिया था, जिसे प्रथम स्वदेशी आंदोलन कहा जा सकता है। ब्रिटिश सरकार ने बंगाल के विभाजन की घोषणा की तो देशभर में इस फैसले के खिलाफ रोष की एक लहर चल पड़ी। उस निर्णय के खिलाफ 7 अगस्त, 1905 को (कलकत्ता के टाउन हाल में पहली बार) विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रयोग के आह्वान के साथ स्वदेशी के राजनैतिक आंदोलन का सूत्रपात हुआ।
जब घबराया ब्रिटिश बाजार
लंदन इवनिंग न्यूज की 1 सितंबर, 1905 की रिपोर्ट में कहा गया था कि मारवाड़ी चेंबर आफ कामर्स ने मैनचेस्टर चेंबर आफ कामर्स को तार दिया है। जिसमें लिखा है कि- ‘मैनचेस्टर के माल की बिक्री लगभग बंद हो गई है। यदि सेक्रेटरी आफ स्टेट विभाजन को वापिस नहीं लेते और बायकाट बंद नहीं होता है, तो वे बिल्कुल बर्बाद हो जाएंगे और भविष्य में कोई सौदे-समझौते नहीं कर पाएंगे। मामला बड़ा गंभीर है और तीन चार दिन के भीतर विभाजन की निषेधाज्ञा जारी नहीं की जाती है, तो ‘पूजा’ के निमित्त बनाया हुआ सारा माल बिके बिना रह जाएगा, ‘लकी सेल’ का आयोजन असंभव हो जाएगा, कृपया हमारी सहायता करें।’ यह रिपोर्ट स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि स्वदेशी समर्थन के साथ बाहरी उत्पादों के बहिष्कार के इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य को पहली बार परेशान किया था।
संस्कृति से जुड़ा आंदोलन
स्वदेशी के राजनैतिक स्वरूप और उसकी अभिव्यक्ति को समझने के लिए स्वदेशी के विचार एवं दर्शन को भी समझने की जरूरत है। प्रारंभ में बंगाल विभाजन के खिलाफ और बाद में देश के राजनैतिक परिदृश्य पर महात्मा गांधी के उदय के साथ उस आंदोलन का और अधिक विस्तार दिखाई देता है। हम देखते हैं कि भारत में स्वदेशी के आधार पर ब्रिटिश शासन के दौरान विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, ब्रिटेन के किसी भी अन्य उपनिवेश की तुलना में अधिक व्यापक, सघन और प्रभावी था, क्योंकि स्वदेशी का विचार भारत के चरित्र और संस्कृति के साथ जुड़ा हुआ है।
धार्मिक सिद्धांत का पालन
महात्मा गांधी ने इस विषय पर कहा था, ‘स्वदेशी हमारे अंदर की वह भावना है जो हमें आस-पास के परिवेश के उपयोग और दूरस्थ के बहिष्कार के लिए प्रेरित करती है। जहां तक धर्म की बात है, परिभाषा की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए मुझे स्वयं को अपने पूर्वजों के धर्म तक ही सीमित रखना चाहिए।’ अर्थशास्त्र के संदर्भ में वे कहते हैं, ‘मुझे केवल उन चीजों का उपयोग करना चाहिए, जो मेरे निकटतम पड़ोसियों द्वारा उत्पादित की जाती है और उनको स्वीकार्य बनाने हेतु कुशल एवं पूर्ण बनाने का प्रयास करना चाहिए।’ तब गांधी जी ने कहा था, ‘मैं स्वदेशी को बदले की दृष्टि से किए गए बायकाट के रूप में नहीं मानता। मैं उसे एक धार्मिक सिद्धांत मानता हूं, जिसका पालन सबको करना चाहिए, स्वदेशी में जहां परित्याग निहित है, वहीं इसमें सृजन भी निहित है।’
प्रकृति का परिपक्व विचार
इससे पूर्व कई विचारकों ने स्वदेशी के वैचारिक अधिष्ठान को प्रतिपादित करने का कार्य किया है। इनमें स्वामी दयानंद का नाम प्रमुख है, जिन्होंने लेखनी से स्वदेशी और स्वराज के विचार को स्थापित एवं प्रसिद्ध किया। यह सही है कि ब्रिटिश एवं अन्य विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार का आह्वान करते हुए स्वदेशी आंदोलन का उद्देश्य देश के राजनैतिक स्वातंत्र्य को प्राप्त करने का था, लेकिन यह मात्र एक नारा नहीं, बल्कि मनुष्य की प्रकृति का एक महत्वपूर्ण भाग और उसका एक परिपक्व विचार है। यह केवल अर्थशास्त्र तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीति, धर्म और जीवन के अन्य पहलळ्ओं से भी उतना ही जुड़ा हुआ विचार है, जो हमें विदेशियों द्वारा अवांछित शोषण और विकृतियों से भी बचाता है। यह भाव हमारी संस्कृति के संरक्षण को भी सुनिश्चित करता है।
हथियार बना चरखा
राष्ट्रीय पटल पर महात्मा गांधी के आगमन के बाद राजनैतिक स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा और लोगों द्वारा बड़े पैमाने पर विदेशी वस्तुओं की होली जलाए जाने, विदेशी उत्पादों के बहिष्कार, स्वदेशी के उपयोग की शपथ और देशभर में हस्तनिर्मित वस्त्र को बढ़ावा देने के लिए चरखे और कताई केंद्रों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया शुरू हो गई। इसकी राजनैतिक अभिव्यक्ति को इस बात से समझा जा सकता है कि चरखा चलाने वालों को स्वतंत्रता सेनानी कहा जाने लगा था। देश का आमजन अब चरखे के इस आंदोलन से जुड़ाव महसूस कर रहा था। यानी अब स्वतंत्रता आंदोलन में स्वदेशी एक हथियार के तौर पर उपयोग किया जा रहा था।
कूका आंदोलन में स्वदेशी की आवाज
1905 से कहीं पहले ही विविध रूपों में स्वदेशी अपनाने और विदेशी उत्पादों का बहिष्कार चल रहा था। 1871-72 में पंजाब में नामधारी सिखों ने अंग्रेजी कपड़े का बहिष्कार करना शुरू किया। राम सिंह कूका ने अंग्रेजी कपड़ों का ही नहीं, अंग्रेजी शिक्षा और न्यायालयों का भी विरोध किया और हस्तनिर्मित स्वदेशी वस्त्र (खद्दर) को प्रोत्साहित किया। इसे हम कूका आंदोलन के रूप में भी जानते हैं।
कांग्रेस में था असमंजस
1905 के बाद इस आंदोलन को एक बड़ा बल मिला। उससे पूर्व कांग्रेस में भी स्वदेशी विचार एवं आंदोलन के प्रति कोई आकर्षण, आग्रह अथवा स्वीकृति नहीं थी। 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की सूझबूझ से विदेशी सामान के बहिष्कार, स्वायत्त शासन, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा के चार विषयों पर प्रस्ताव अवश्य पारित हो गए मगर कांग्रेस के नरम दल के सदस्यों ने अगले अधिवेशन में ही स्वयं को इन चारों प्रस्तावों से अलग कर लिया। कांग्रेस के गरम दल के सदस्यों ने इस बात का घोर विरोध किया। अधिवेशन बिना किसी निर्णय के समाप्त हो गया। उधर लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिनचंद्र पाल (लाल, बाल, पाल), जो इस गरम दल का नेतृत्व कर रहे थे, ने अपने स्तर पर स्वराज के लिए स्वदेशी आंदोलन को आगे ले जाने का बीड़ा उठाया। नरम दल का कहना था कि पूर्ण स्वराज (और उसके लिए स्वदेशी का आह्वान) सही नीति नहीं है। जबकि गरम दल अत्यंत तीव्रता से स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा आदि के माध्यम से स्वराज की वकालत कर रहा था।
डगमगाए मगर संभल गए हालात
कांग्रेस की स्वदेशी के प्रति आस्था की कमी का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि डी. ई. वाचा, जो कांग्रेस के संस्थापक सदस्य थे और जो 1901 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने, द्वारा टाइम्स आफ इंडिया के 11 और 18 मार्च, 1886 को प्रकाशित दो लेखों में, देशभक्ति की अभिव्यक्ति के रूप में स्वदेशी आंदोलन की प्रशंसा तो की गई, लेकिन इसे अव्यावहारिक भी घोषित किया और यहां तक कि इसे लोकशक्ति का ‘हानिकारक विपथन’ भी बताया। उनका यह भी कहना था कि जनसाधारण ने भी विदेशी कपड़ों को सस्ता और बढ़िया होने के कारण पसंद किया। हालांकि स्वदेशी आंदोलन की सफलता अभूतपूर्व थी, लेकिन उसके बावजूद बंग-भंग आंदोलन के समय से ही कांग्रेस में स्वदेशी और स्वराज के विषय को लेकर असमंजस के कारण स्वदेशी के आंदोलन को धक्का लगा, क्योंकि इसके साथ ही कांग्रेस में दोफाड़ हो गया था। देश का स्वतंत्रता आंदोलन क्षीण हो गया था। यह स्थिति प्रथम विश्व युद्ध तक चली और उसके बाद फिर से महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वदेशी आंदोलन ने जोर पकड़ा और 1947 में भारत स्वाधीन हो गया।
सबके साथ से मजबूत होंगे कदम
पिछले लगभग तीन दशक से अधिक समय से भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों के चलते देश में फिर से आयातों की बाढ़ तो आई ही, साथ ही साथ विदेशी पूंजी पर निर्भरता के कारण देश की काफी कंपनियां भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीकों से विदेशी आधिपत्य में चली गईं। यहां तक कि हमारे युवाओं द्वारा शुरू किए गए कई स्टार्टअप भी विदेशी निवेशकों को भेंट हो गए अथवा विदेशी हो गए। पहले विदेशी निवेशकों के दबाव में उनका पंजीकरण सिंगापुर, लंदन अथवा किन्हीं दूसरे देशों के शहरों में हुआ और अंततोगत्वा उनका स्वामित्व भी विदेशियों के हाथों में चला गया। देश में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए विदेशी निवेशकों को कई रियायतें और प्राथमिकताएं दी गईं। इस सबके चलते देसी निवेशक हतोत्साहित तो हुए ही और कई भारतीय अमीर दुनिया के दूसरे मुल्कों को स्थानांतरित हो गए। आज देश में एक अलग से स्वदेशी आंदोलन चलाने की जरूरत है और विदेशी के विरोध में स्वदेशी जागरण मंच सहित कई संगठन इस काम को अंजाम भी दे रहे हैं। आज के स्वदेशी आंदोलन में विदेशी के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल से आगे बढ़ते हुए, स्वदेशी उद्योगों को प्रश्रय एवं सहयोग देते हुए उन्हें विकसित करने, स्वदेशी उद्यमों एवं स्टार्टअप को विदेशी आधिपत्य से बचाने, आयातों को रोकने हेतु टैरिफ बढ़ाने, गैर टैरिफ प्रतिबंध लगाने समेत कई प्रयास करने की जरूरत होगी। सभी को मिलकर पुन: स्वदेशी की भावना के अनुरूप कार्य की जरूरत है। तभी देश सही अर्थों में आत्मनिर्भर होकर विश्व के शक्तिशाली देशों की पंक्ति में खड़ा हो सकेगा।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कालेज में प्रोफेसर हैं)

