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कीड़ों के खोखले किए बांस से कैसे बनी जादुई धुन? दिलचस्प है बांसुरी के जन्म की अनसुनी कहानी

Published: Tue, 08 Sep 2026 11:18 AM (IST)

बांसुरी, भारतीय संस्कृति और भगवान कृष्ण से जुड़ा एक प्राचीन वाद्य यंत्र है, जिसका इतिहास काफी दिलचस्प है।

क्या है बांसुरी का इतिहास? (AI Generated Image)

क्या है बांसुरी का इतिहास? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हिंदी फिल्मों के कई गाने, जैसे ‘बांसुरी तिहारी नंदलाल’ और ‘श्याम तेरी बंसी’ में बांसुरी का इस्तेमाल हुआ है। इस वाद्य यंत्र का नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले श्री कृष्ण की छवि आती है। भारतीय संस्कृति से गहराई से जुड़ा ये वाद्य यंत्र अपनी मीठी धुन के लिए जाना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं बांसुरी का इतिहास क्या है और ये कैसे बनाई जाती है? आइए जानें इस बारे में।   

बांसुरी का इतिहास 

बांसुरी का इतिहास काफी पुराना माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिन बांसों को कीड़े खोखला कर देते थे, उनसे गुजरती हवा के कारण एक धुन निकलती थी। इसी से बांसुरी बनाने का ख्याल सबसे पहली बार मन में आया और बांसुरी का निर्माण हुआ। 

भारत में बांसुरी के इतिहास को भगवान कृष्ण से भी जोड़कर देखा जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में बांसुरी को भगवान कृष्ण की रास लीलाओं से जोड़कर देखा गया है। कहा जाता है कि उनकी बांसुरी की धुन इतनी मनमोहक होती थी कि सारी गोपियां और जानवर, सब उस धुन से मोहित हो जाते थे। 

बांसुरी का जिक्र इतिहास में कई जगहों पर मिलता है। आधुनिक युग में पंडित पन्नालाल घोष और हरिप्रसाद चौरसिया जैसे संगीतकारों ने बांसुरी को प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचाया और इसे एक नई पहचान दी। 

क्यों है बांसुरी इतनी खास?

बांसुरी की सबसे बड़ी खासियत है इसमें कोई तार, कंजी या मैकेनिकल पार्ट नहीं होता। इसलिए इसकी धुन को इंसान की आवाज के सबसे करीब माना जाता है। इसलिए बांसुरी का एक किस्सा रूमी से भी जुड़ा है। सूफी कवि रूमी मानते थे कि बांसुरी की आवाज इंसानी आवाज से बहुत करीब है, जिसकी धुन उसके घर (बांस के पौधे) से बिछड़ने के दर्द को बयां करती है। 

बांसुरी की एक खासियत यह भी है कि यह काफी हल्की होती है। इसे बहुत आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। साथ ही, ये बांस से बनाई जाती है, जिसके कारण यह पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाती।  

कैसे बजाई जाती है बांसुरी? 

बांसुरी को दो तरीकों से बजाया जाता है। एक है आड़ी बांसुरी और दूसरी है सीधी बांसुरी। वादक बांसुरी के मुख्य छेद के पास अपने होंठों से हवा का दबाव बनाता है और बांसुरी पर बने 6-7 छेदों को अपनी उंगलियों से ढकता और खोलता है, जिससे धुन निकलती है। हवा के फ्लो और बांसुरी के छेदों को आधा या पूरा ढककर अलग-अलग स्वर और मींड पैदा किए जाते हैं। 

बांसुरी कैसे बनाई जाती है?

बांसुरी दिखने में भले ही बेहद साधारण लगती है, लेकिन इसे बनाना बहुत बारीकी का काम है। बांसुरी बनाने के लिए बिल्कुल सीधे, पतले और पके हुए बांस को चुना जाता है। इसके बाद बांस को सुखाया जाता है और फिर उसके अंदर के हिस्से को पूरी तरह चिकना किया जाता है।  

गर्म लोहे की छड़ से बांस पर छेद बनाए जाते हैं। इन छेदों के बीच की दूरी का खास ध्यान रखना पड़ता है, वरना बांसुरी बजाते समय धुन बिगड़ सकती है। इसके बाद बांस को फटने से बचाने के लिए उस पर पॉलिश की जाती है।