1700 साल पुरानी शिलाओं में फिर जीवंत हुईं श्रीकृष्ण की लीलाएं, MP के एरण में ASI ने नए स्वरूप में सजाए दुर्लभ गुप्तकालीन पैनल
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने मध्य प्रदेश के एरण में 1700 साल पुराने गुप्तकालीन श्रीकृष्ण लीला के शिलाफलकों को उत्खनन ...और पढ़ें

सांदीपनि गुरु से शिक्षा प्राप्त करते कृष्ण, बलराम और सुदामा। (सौजन्य- एएसआई)
HighLights
एएसआई ने एरण में 1700 साल पुराने शिलाफलकों को संरक्षित किया।
ये फलक श्रीकृष्ण के जन्म से कंस वध तक की कथा दर्शाते हैं।
एरण स्थल को 'देश' योजना में पर्यटन हेतु विकसित किया जाएगा।
शशिकांत तिवारी, भोपाल। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से लेकर उनके जीवन के विभिन्न पड़ावों तक की झलक अब मध्य प्रदेश के सागर जिले स्थित एरण में एक नए स्वरूप में देखने को मिलेगी। करीब 1700 वर्ष पुरानी गुप्तकालीन कृष्ण कला को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने उत्खनन और वैज्ञानिक संरक्षण के बाद नया जीवन दिया है। यहां मिले श्रीकृष्ण से जुड़े आठ प्राचीन शिलाफलकों को साफ कर उनके मूल स्वरूप के अनुरूप संरक्षित किया गया है।
विशेष बात यह है कि ये शिलाफलक लंबे समय से आंशिक रूप से जमीन में दबे हुए थे। कई फलकों का आधा हिस्सा मिट्टी के भीतर था, जबकि गंदगी और समय की मार के कारण उन पर उकेरी गई आकृतियां भी स्पष्ट नहीं रह गई थीं। ASI ने इन्हें बाहर निकालकर वैज्ञानिक तरीके से सफाई और संरक्षण कराया। अब इन्हें श्रीकृष्ण के जीवन की क्रमिक अवस्थाओं के अनुसार स्थापित किया गया है, जिससे दर्शक जन्म से लेकर विभिन्न लीलाओं तक की कथा को क्रमवार समझ सकेंगे।
जन्म से कंस वध तक की कथा पत्थरों पर उकेरी
एरण में मिले इन शिलाफलकों में श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों का चित्रण किया गया है। पहला फलक श्रीकृष्ण के जन्म से पहले का है, जिसमें माता देवकी और पिता वासुदेव को अंजलि मुद्रा में भगवान विष्णु की प्रार्थना करते हुए दर्शाया गया है।
इसके बाद के फलकों में कृष्ण जन्म और बाल लीलाओं से जुड़े दृश्य उकेरे गए हैं। एक शिलाफलक में कंस द्वारा देवकी और वासुदेव के नवजात शिशुओं की हत्या का दृश्य दर्शाया गया है। वहीं, नवजात कन्या के आकाशवाणी करने का प्रसंग भी अंकित है।
अन्य दृश्यों में माता देवकी को बालक कृष्ण को स्तनपान कराते हुए, माता यशोदा को कृष्ण के साथ और नंद बाबा के प्रसंगों के साथ दिखाया गया है। कृष्ण द्वारा धेनुकासुर और उसके साथियों के उद्धार की कथा भी शिल्पकला में उकेरी गई है।

गोकुल से मथुरा यात्रा और सांदीपनि आश्रम की झलक
शिलाफलकों में श्रीकृष्ण के जीवन के आगे के पड़ाव भी दिखाई देते हैं। एक फलक में गोकुल से मथुरा जाते समय गोपियों के साथ श्रीकृष्ण के संवाद का चित्रण है। वहीं, एक अन्य महत्वपूर्ण दृश्य में सांदीपनि ऋषि को श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा को शिक्षा देते हुए दर्शाया गया है।
श्रृंखला के अंतिम फलकों में कंस वध सहित श्रीकृष्ण के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को भी पत्थरों पर जीवंत किया गया है। अब प्रत्येक शिलाफलक के सामने हिंदी और अंग्रेजी में संबंधित प्रसंग की जानकारी भी प्रदर्शित की गई है।
पांच-पांच टन के प्राचीन स्तंभों का भी संरक्षण
एएसआई ने केवल शिलाफलकों ही नहीं, बल्कि एरण में मिले करीब पांच-पांच टन वजनी प्राचीन स्तंभों को भी बाहर निकालकर उनका संरक्षण किया है। इनकी सफाई और वैज्ञानिक उपचार के बाद इन्हें भी संरक्षित किया गया है।
एएसआई ने वर्ष 2025 में इन शिलाफलकों को बाहर निकालने और उनके संरक्षण का काम शुरू किया था। अब यह प्राचीन कला और इतिहास एक व्यवस्थित रूप में लोगों के सामने आ सकेगा।
ताम्रपाषाण काल से मध्यकाल तक के प्रमाण समेटे है एरण
एरण केवल गुप्तकालीन कला के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यहां मानव सभ्यता के विकास के विभिन्न चरणों के प्रमाण भी मिले हैं। यहां सबसे पहले 1960 से 1965 के बीच सागर विश्वविद्यालय ने उत्खनन कराया था। इसके बाद भी कई चरणों में खुदाई और अन्वेषण किया गया।
एएसआई की नागपुर उत्खनन शाखा ने वर्ष 2020 से 2022 के बीच यहां व्यापक उत्खनन और अन्वेषण किया। इस दौरान पकी मिट्टी की वस्तुएं, भवनों के अवशेष, मकानों के फर्श, अग्निकुंड और आभूषण समेत कई महत्वपूर्ण पुरावशेष मिले।
एरण की सांस्कृतिक परतों में ताम्रपाषाण काल यानी लगभग 1800 से 700 ईसा पूर्व से लेकर 16वीं से 18वीं शताब्दी के उत्तर मध्यकालीन दौर तक मानव गतिविधियों और विभिन्न संस्कृतियों के प्रमाण मिलते हैं। ऐसे में एरण अब केवल पुरातात्विक स्थल ही नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के हजारों वर्षों पुराने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सफर की एक जीवंत धरोहर के रूप में भी सामने आया है।
जबलपुर मंडल में कार्यरत रहने के दौरान देश के सबसे प्राचीनतम कृष्ण लीला फलकों को संरक्षित करने का अवसर मिला , जो आने वाली पीढ़ी के लिए अति महत्वपूर्ण है। केंद्र सरकार ने इसे 'देश' योजना में सम्मिलित किया है, जिससे आगामी वर्षों में इस स्थल को पर्यटन की दृष्टि से और विकसित किए जाने की संभावना है।
- शिवाकांत वाजपेयी, अधीक्षण पुरातत्वविद, भोपाल मंडल, एएसआई
