‘गूंजा-सा है कोई एकतारा…’ सिर्फ एक शब्द नहीं, सूखी लौकी से बने इस वाद्ययंत्र की दिलचस्प है कहानी
एकतारा, एक तार वाला प्राचीन भारतीय वाद्य यंत्र है, जिसका इस्तेमाल लोक संगीत, भजन और सूफी गायन में होता है।

क्या है इकतारा का इतिहास? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। रणबीर कपूर का गाना ‘गूंजा-सा है कोई एकतारा, एकतारा…’ आपने जरूर सुना होगा। ये गाना सुनकर दिल खुश हो जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं इसमें इस्तेमाल होने वाला एकतारा क्या है?
दरअसल, इस गाने में जिस इकतारे की बात हो रही है, वो भारत के सबसे पुराने वाद्य यंत्रों में से एक है। आइए जानें इसका इतिहास क्या है।
क्या है एकतारा का इतिहास?
एकतारा शब्द एक और तार से मिलकर बना है। इसका मतलब होता है एक तार वाला यंत्र। माना जाता है कि एकतारा बजाने की शुरुआत भारत के लोक संगीत और घुमंतू भिक्षुओं ने की थी। प्राचीन काल में घुमंतू गायक, ऋषि-मुनि और संतों को एक ऐसी चीज की जरूरत थी, जिसका वजन हल्का हो और यात्रा के दौरान आसानी से साथ लेकर जाया जा सके। इसी तरह एकतारा का आविष्कार हुआ और संगीत की दुनिया में इसने अपनी जगह बनाई।
कुछ लोग मानते हैं कि इस वाद्य यंत्र की शुरुआत 12वीं सदी में हुई थी, लेकिन कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि ये इससे पहले भी पाया जाता था। मीराबाई, कबीरदास और बंगाल के बाउल गायकों ने अपने भजनों और सूफी गीतों में एकतारा का खूब इस्तेमाल किया। इसलिए इसे भगवान से जुड़ने और आध्यात्मिक लय बनाए रखने का एक जरिया माना जाने लगा।
एकतारा का इस्तेमाल
एकतारा में सिर्फ एक ही तार का इस्तेमाल किया जाता है, जो गायक को सुर देने के लिए बजाया जाता है। इसकी तार को उंगली या नाखुन से छेड़ा जाता है, जिससे लगातार एक गूंजती हुई आवाज पैदा होती है।
एकतारा का इस्तेमाल उत्तर भारत, बंगाल और पंजाब के लोक संगीत में खूब होता है। साथ ही, सूफी गायन, कव्वाली और भजनों में भी एकतारा बजाया जाता है। एकतारा का इस्तेमाल सिर्फ प्राचीन भारत में नहीं होता था। आज के म्यूजिक में भी आपको एकतारा की धुन सुनने को मिल जाएगी।
कैसे बनाया जाता है एकतारा?
एकतारा घुमंतू साधुओं का वाद्य यंत्र था। इसलिए इसे बहुत ही कम खर्च में आसानी से बनाया जा सकता है। इसका निचला हिस्सा, जिसे रेजोनेटर कहते हैं, सूखी लौकी या उसके जैसे किसी दूसरे मटीरियल से बनाया जाता है। इसके ऊपर बकरे या जानवर की चमड़ी मढ़ी जाती है, जिससे इसका आवाज और उभर कर आती है।
इसका ऊपरी हिस्सा बांस की लकड़ी से बना होता है। एक बास को बीच से काटा जाता है, जो एकतारा की गर्दन का काम करता है। इसके बीच में लोहे या पितल की एक तार लगी होती है, जिसका एक हिस्सा नीचे की चमड़ी से जुड़ा होता है और ऊपरी हिस्सा बांस की लकड़ी से लगी एक खूंटी से। इस खूंटी को घुमाकर तार को बढ़ाया या घटाया जाता है, ताकि सही सुर मिल सके।
